कुणिन्द के सिक्के: हिमाचल की प्राचीन मुद्रा विरासत

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डॉ. कमल के.प्यासा –  मण्डी

कुनिंद उत्तरी भारत की एक प्रभावशाली कबायाली जनजाति बताई जाती है, जिसने दूसरी शताब्दी ई. पूर्व से तीसरी शताब्दी ई. तक अपने मजबूत आधारों से एक कबीले से संगठित होकर राजवंश का रूप ले लिया था। फिर इधर के (पहाड़ी क्षेत्रों हिमाचल प्रदेश व उत्तराखंड) व्यास, सतलुज, गंगा व यमुना नदियों के क्षेत्रों से लेकर आगे उत्तरी पंजाब तक अपना साम्राज्य विस्तार कर लिया था। इनका उल्लेख महाभारत, रामायण व पुराणों में भी देखा जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्र के कनैत राजपूत इन्हीं के वंशज बताए जाते हैं।

दूसरी शताब्दी ई. पूर्व के कुनिंद वंश के प्रसिद्ध शासक अमोघभूति के नाम से जाने जाते हैं, जिन्होंने चाँदी व ताँबे के इंडो-ग्रीक शैली वाले सिक्के चलाए थे। अमोघभूति के सिक्कों पर ब्राह्मी व खरोष्ठी लिपि के साथ-साथ बौद्ध व हिन्दू धर्म के प्रतीक भी देखे जा सकते हैं, जिनकी पुष्टि सम्राट अशोक के कालसी, बारहूत व मथुरा जैसे अभिलेखों से भी हो जाती है। कुनिंद शासकों की शासन प्रणाली राजतंत्रात्मक होते हुए भी गणतंत्रात्मक व लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित थी। लेकिन तीसरी शताब्दी में शैव मत के प्रवेश से कुनिंद सत्ता का प्रभाव कम होना शुरू हो गया था।

कुनिंद शासकों के बहुत से सिक्के कांशीपुर, अल्मोड़ा, शिमला, मंडी व कांगड़ा आदि स्थानों से प्राप्त हो चुके हैं, जिससे उनके प्रभाव क्षेत्रों की जानकारी हो जाती है। अमोघभूति के चाँदी के सिक्कों के एक ओर प्राकृत ब्राह्मी में “राजन कुनिणँदसा अमोघभूति महाराजसा” (कुनिंदा के महान राजा अमोघभूति) अभिलेख के साथ दायीं ओर एक हिरन, दो साँप व कमल के फूल के साथ देवी लक्ष्मी को दिखाया गया है। इसी सिक्के के दूसरी ओर खरोष्ठी लिपि में “राणा कुनिंदासा अमोघभूतिसा महाराजसा” (कुनिंदा के महान राजा अमोघभूति) अंकित है। उकेरे गए चित्रों में इसी ओर बौद्ध स्तूप के ऊपर त्रिरत्न, स्वास्तिक प्रतीक, Y चिन्ह, रेलिंग-वृक्ष तथा नीचे नदी का प्रतीक देखा जा सकता है।

प्राप्त कुनिंद सिक्कों की विस्तार से जानकारी :

इन सिक्कों की जानकारी के अंतर्गत निम्नलिखित बातें रहेंगी, जिनमें सिक्के से संबंधित धातु, आकार, व्यास, मोटाई, भार, काल, लिपि, पंजीकरण संख्या, प्राप्ति-स्थान, संग्रहकर्ता तथा अंत में सिक्के का विवरण आदि शामिल हैं।

कुनिंद या कुणिन्द सिक्के :

  1. सिक्के की धातु = ताम्बा।
    आकार = गोलाकार।
    व्यास = 1.5 सैं. मि.।
    मोटाई = 0.05 सै. मि.।
    भार = 1.995 ग्राम।
    काल = प्रथम श. ई. पूर्व।
    लिपि = खरोष्ठी व ब्राह्मी।
    प्राप्ति स्थान = चक्कर, मंडी।
    संग्रहकर्ता = स्व. चन्द्रमणि कश्यप, मंडी।

सिक्के का विवरण :
प्राप्त कुणिन्द सिक्के चक्कर मिल्क प्लांट के निर्माण के समय खुदाई में ढेर सारे अन्य सिक्कों के साथ प्राप्त हुए थे। इनके एक ओर हिरन के साथ एक नारी को खड़े दिखाया गया है और खरोष्ठी लिपि में “राजनह कुणीन्दसा अमोघभूति महाराजस्या” लिखा मिलता है। इसी सिक्के के दूसरी ओर एक छः चापों वाली पहाड़ी पर छतरी जैसी आकृति, स्वास्तिक, त्रिभुज व वृक्ष देखा गया है और चारों ओर वैसे ही ब्राह्मी लिपि में लेख देखा जा सकता है।

  1. सिक्के की धातु = ताम्बा।
    आकार = गोलाकार।
    व्यास = 1.7 सै. मि.।
    मोटाई = 0.10 सै. मि.।
    भार = 1.995 ग्राम।
    काल = प्रथम शत. ई. पूर्व।
    लिपि = खरोष्ठी व ब्राह्मी।
    प्राप्ति स्थान = चक्कर, मंडी।
    संग्रहकर्ता = स्व. चन्द्रमणि कश्यप, मंडी।

सिक्के का विवरण :
इसमें भी सिक्का क्रम 1 की तरह ही सभी कुछ, अर्थात् दोनों ओर की आकृतियाँ एवं लिपियाँ एक जैसी ही हैं। केवल सिक्के के व्यास, भार व मोटाई में ही अंतर देखा गया है।

  1. सिक्के की धातु = ताम्बा।
    आकार = गोलाकार।
    व्यास = 1.5 सै. मि.।
    मोटाई = 0.5 सै. मि.।
    भार = 1.00 ग्राम।
    काल = प्रथम शत. ई. पूर्व।
    लिपि = खरोष्ठी व ब्राह्मी।
    प्राप्ति स्थान = चक्कर, मंडी।
    संग्रहकर्ता = स्व. चंद्रमणि कश्यप, मंडी।

सिक्के का विवरण :
इस सिक्के में हिरन के साथ खड़ी नारी का चित्रण अपूर्ण ही है। शेष वैसे ही खरोष्ठी लेख व चित्रण है। सिक्के के दूसरी ओर पूर्व सिक्के की तरह ही छः चापों वाली पहाड़ी पर वैसे ही छतरी जैसी बनावट दिखाई गई है, लेकिन इस सिक्के में पहाड़ी के नीचे वक्र रेखा के रूप में नदी को दिखाया गया है। शेष चिन्ह व ब्राह्मी लिपि में वही सब कुछ है। दूसरे अंतर भी व्यास, मोटाई, भार आदि के देखे गए हैं।

  1. सिक्के की धातु = ताम्बा।
    आकार = गोलाकार।
    व्यास = 1.8 सै. मि.।
    मोटाई = 0.05 से 0.10 सै. मि.।
    भार = 3.00 ग्राम।
    काल = प्रथम शत. ई. पूर्व।
    लिपि = खरोष्ठी व ब्राह्मी।
    प्राप्ति स्थान = चक्कर, मंडी।
    संग्रहकर्ता = स्व. चन्द्रमणि कश्यप, मंडी।

सिक्के का विवरण :
कुणिन्दों के इस सिक्के में भी एक ओर की आकृतियाँ व खरोष्ठी लिपि में लिखा अभिलेख ऊपर वर्णित सिक्कों जैसा ही है। दूसरी ओर वही छः चापों वाली पहाड़ी के नीचे वक्र रेखा जैसी नदी नहीं मिलती, लेकिन इसमें एक अन्य आकृति अर्धवृत्ताकार चाप दिखाई गई है। शेष सभी कुछ पूर्व सिक्कों जैसा ही ब्राह्मी लिपि में लिखा मिलता है।

  1. सिक्के की धातु = ताम्बा।
    आकार = गोलाकार।
    व्यास = 2.00 सै. मि.।
    मोटाई = 0.05 से 0.10 सै. मि.।
    भार = 3.500 ग्राम।
    काल = प्रथम शत. ई. पूर्व।
    लिपि = खरोष्ठी व ब्राह्मी।
    प्राप्ति स्थान = चक्कर, मंडी।
    संग्रहकर्ता = स्व. चंद्रमणि कश्यप, मंडी।

सिक्के का विवरण :
इस सिक्के में केवल व्यास, भार व मोटाई आदि को छोड़कर शेष सभी लिपि, अभिलेख व चित्रण पहले सिक्कों जैसा ही है, लेकिन इसमें वक्र रेखा वाली नदी देखने को मिलती है।

  1. कुणिन्द चाँदी के सिक्के

सिक्कों की धातु = चाँदी।
आकार = गोलाकार।
व्यास = 1.6 सै. मि. से 1.9 सै. मि. तक।
मोटाई = लगभग 0.1 सै. मि. तक।
भार = 2.00 ग्राम से 2.40 ग्राम तक (कम से कम 1.6 ग्राम भार के भी देखे गए हैं)।
काल = दूसरी शत. ई. पूर्व से प्रथम शत. ई. पूर्व तक।
प्राप्ति स्थान = हिमाचल, उत्तराखंड, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि।

सिक्कों का विवरण :
चाँदी के कुणिन्द सिक्के, जिनका प्रचलन दूसरी शत. ई. पूर्व से प्रथम शत. ई. पूर्व तक रहा, उनकी शुरुआत महान शासक अमोघभूति द्वारा की गई थी। ये सिक्के इंडो-ग्रीक शैली से प्रभावित देखे गए हैं। इनका वजन दो ग्राम से लेकर 2.4 ग्राम तक का होता था। इन चाँदी के सिक्कों के एक ओर सुंदर हिरन की आकृति के ऊपर दो साँपों को छत्र की भाँति देखा जा सकता है और साथ में देवी लक्ष्मी को कमल का फूल दिखाया गया होता है। इनके साथ ही सिक्के के चारों ओर ब्राह्मी लिपि में प्राकृत भाषा के शब्द “राजन : कुनिंदस अमोगभूति महाराजस” लिखे देखे जा सकते हैं। इसी सिक्के की दूसरी ओर बौद्ध धर्म-प्रतीक स्तूप (त्रिरत्न), स्वास्तिक, नंदी पद, रेलिंग-पेड़ व खरोष्ठी लेख आदि देखे जा सकते हैं। कुणिन्द की चाँदी वाली यह मुद्रा प्राचीन हिमालयी क्षेत्र में चलने वाली पहली मुद्रा कही जाती है।

  1. कुणिन्द सोने के सिक्के

सिक्कों की धातु = सोना।
आकार = गोलाकार।
व्यास = 1.7 सै. मि. से 1.9 सै. मि.।
मोटाई = 1.5 मि. मि. से 2.0 मि. मि.।
भार = 2.0 ग्राम से 2.3 ग्राम तक।
काल = दूसरी शत. ई. पूर्व से तीसरी शत. ई. तक।
प्राप्ति स्थान = हिमाचल, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, पंजाब व हरियाणा आदि।

सिक्कों का विवरण :
कुणिन्द सोने के सिक्के बहुमूल्य होने के कारण बहुत ही कम मिलते हैं। इसी कारण ये छोटे आकार के हुआ करते थे और ज्यादातर इनका उपयोग बड़े लेन-देन में किया जाता था। ये शाही ख़ज़ाने की शोभा हुआ करते थे। इन सिक्कों पर बहुत ही बारीकी से शाही प्रतीक व राजघराने के चिन्ह बने होते थे। 2 से 2.3 ग्राम के ये सिक्के मानक (प्राचीन भारतीय द्राम) रूप में भी प्रयोग में लाए जाते थे। सोने के इन सिक्कों पर भी अन्य कुणिन्द सिक्कों की तरह ही एक ओर हिरन या बारहसिंगा, देवी लक्ष्मी व बौद्ध धर्म के प्रतीक बने होते थे। सिक्के के दूसरी ओर नंदी पद, स्वास्तिक प्रतीक, नदी, पहाड़ या चैत्य आदि की आकृति बनी होती थी। सिक्के के एक ओर प्राकृत भाषा के ब्राह्मी अभिलेख तथा दूसरी ओर खरोष्ठी में शासक का नाम व उपाधियाँ अंकित होती थीं।

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