डॉ. कमल के. प्यासा – जीरकपुर (मोहाली)
रामभक्त, महान संत, चिंतक और कवि तुलसीदास का जन्म 16वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश के कासगंज स्थित सोरों (शूकर क्षेत्र) में माना जाता है (कुछ विद्वान राजापुर गाँव को भी इनका जन्मस्थान बताते हैं)। संवत् 1554 विक्रमी (11 अगस्त, 1497 ई.) को श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि (शुक्रवार) को माता हुलसी एवं पिता आत्माराम दुबे (शांडिल्य/भारद्वाज गोत्र) के घर इनका जन्म हुआ था।
बालक तुलसी के विषय में कहा जाता है कि जन्म के समय उनमें कई असाधारण लक्षण देखे गए थे। जन्म लेते ही उनके मुँह में पूरे दाँत थे और उनकी शारीरिक बनावट 5 वर्ष के बालक जैसी थी। सामान्य शिशुओं की तरह जन्म के समय वे रोए नहीं, बल्कि उनके मुख से ‘राम’ शब्द का उच्चारण हुआ। इसी कारण बचपन में उन्हें ‘रामबोला’ नाम दिया गया।
अभुक्त मूल नक्षत्र में जन्म होने तथा इन अनोखे लक्षणों के कारण ज्योतिषियों ने बालक को पिता के लिए कष्टकारी बताया। इस आशंका के चलते माता-पिता ने बालक के पालन-पोषण का दायित्व अपनी विश्वासी दासी चुनिया को सौंप दिया (जन्म की चौथी रात को ही), जो बालक को अपने गाँव हरिपुर ले गई। इसके कुछ ही समय बाद माता हुलसी का निधन हो गया। जब रामबोला साढ़े पाँच वर्ष के हुए, तब उनकी पालक माता चुनिया भी चल बसीं और बालक पूरी तरह अनाथ हो गया।
कहा जाता है कि अनाथ होने के बाद भगवान शिव और माता पार्वती ने स्वयं बालक की देख-रेख की और किसी न किसी रूप में उनके भोजन की व्यवस्था करते रहे। कालंतर में, गुरु अनंताचार्य ने बालक को विरक्त दीक्षा देकर ‘रामबोला’ से उनका नाम ‘तुलसीदास’ रखा। सात वर्ष की आयु में अयोध्या में गुरु नरहरिदास ने इनका यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न कराया। इसके पश्चात इनकी शिक्षा-दीक्षा प्रारंभ हुई और इन्हें रामायण की कथाएँ सुनाई जाने लगीं।
इसके बाद तुलसीदास जी वाराणसी आ गए। यहाँ अपने 15-16 वर्षों के प्रवास के दौरान उन्होंने संस्कृत, व्याकरण, वेद, वेदांग, ज्योतिष और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया।
संवत् 1604 (1561 ई.) में कार्तिक शुक्ल एकादशी को गोंडा के नारायणपुर गाँव के पंडित दीनबंधु पाठक की पुत्री रत्नावली के साथ उनका विवाह हुआ। तुलसीदास जी अपनी पत्नी रत्नावली से अगाध प्रेम करते थे।
एक बार तुलसीदास जी किसी मंदिर गए हुए थे। उनकी अनुपस्थिति में रत्नावली अपने भाई के साथ मायके चली गईं। घर लौटने पर तुलसीदास जी पत्नी के वियोग में व्याकुल हो उठे और रात में ही उनसे मिलने ससुराल के लिए निकल पड़े। उफनती नदी को पार करने के लिए उन्होंने एक बहते हुए शव को लकड़ी का लट्ठा समझकर पकड़ लिया और नदी पार कर गए। ससुराल पहुँचकर घर के भीतर जाने के लिए उन्होंने दीवार से लटकते हुए एक सर्प को रस्सी समझकर पकड़ लिया और ऊपर चढ़ गए।
जब रत्नावली ने तुलसीदास का ऐसा अतिशय मोह देखा, तो उन्होंने उन्हें फटकारते हुए कहा:
“अस्थि चर्म मय देह यह, तासों जैसी प्रीति।
नेकू जो होती राम महँ, तो भवभीति नशाति॥”
(अर्थात्: हड्डी और चमड़े के इस शरीर से जितना प्रेम तुम्हें है, यदि उसका आधा प्रेम भी श्रीराम से होता, तो तुम्हारा भवबंधन कट जाता।)
पत्नी की इस सीख और फटकार ने तुलसीदास जी के जीवन की दिशा बदल दी। वे तुरंत वहाँ से निकल पड़े और गृहस्थ जीवन त्यागकर संन्यासी के रूप में प्रयाग पहुँच गए। अपनी समस्त इंद्रियों और सांसारिक इच्छाओं का त्याग कर वे ‘गोस्वामी तुलसीदास’ बन गए।
कुछ समय राजापुर में बिताने के बाद वे वाराणसी लौट आए और श्रीराम कथा करने लगे। मान्यता है कि वाराणसी में उन्हें एक प्रेत के माध्यम से हनुमान जी के दर्शन का मार्ग मिला। हनुमान जी के निर्देश पर तुलसीदास जी चित्रकूट चले गए, जहाँ उन्हें भगवान राम के दर्शन तो हुए, किंतु वे उन्हें पहचान नहीं सके।
तदनंतर, भगवान राम पुनः बालक रूप में तुलसीदास जी के पास आए। जब वे चंदन घिस रहे थे, तब भी प्रभु को पहचान न सके। उस समय हनुमान जी ने तोते का रूप धारण कर यह प्रसिद्ध दोहा पढ़ा:
“चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर।
तुलसीदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥”
इस प्रकार तुलसीदास जी को भगवान श्रीराम के प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त हुए।
चित्रकूट से तुलसीदास जी संवत् 1628 में अयोध्या लौट आए। संवत् 1631 में रामनवमी के दिन उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना प्रारंभ की। दो वर्ष, सात माह और छः दिन के कठिन परिश्रम के पश्चात संवत् 1633 के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में इसके सातों काण्ड पूर्ण हुए।
इसके बाद तुलसीदास जी पुनः वाराणसी आ गए। जनश्रुति के अनुसार, उन्होंने अपनी यह कृति काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव और माता अन्नपूर्णा के समक्ष रखी। अगले दिन प्रातःकाल ग्रंथ पर ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ अंकित मिला, जिससे वहाँ के पंडित आश्चर्यचकित रह गए।
तुलसीदास जी द्वारा रचित साहित्य में रामचरितमानस के अतिरिक्त विनय पत्रिका, हनुमान चालीसा, कवितावली, दोहावली, वैराग्य संदीपनी, जानकी मंगल, पार्वती मंगल जैसी कई कालजयी रचनाएँ शामिल हैं, जो ब्रज और अवधी दोनों भाषाओं में उपलब्ध हैं। इन कृतियों ने भारतीय संस्कृति, साहित्य और सामाजिक चेतना पर गहरा प्रभाव डाला।
तुलसीदास जी के समकालीन अद्वैत वेदांत के महान दार्शनिक मधुसूदन सरस्वती ने भी उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। भक्तिकाल के महान कवि सूरदास जी ने उन्हें ‘संत शिरोमणि’ कहकर सम्मानित किया। वहीं मुगल सम्राट अकबर के दरबारी विद्वान अब्दुल रहीम खान-खाना ने रामचरितमानस की महत्ता को अद्भुत रूप में स्वीकार किया।
महान संत, चिंतक और कवि गोस्वामी तुलसीदास जी का निधन संवत् 1680 (1623 ई.) में श्रावण शुक्ल सप्तमी के दिन असी घाट (वाराणसी) पर हुआ। माना जाता है कि उन्होंने ‘राम-राम’ का जाप करते हुए अपने प्राण त्यागे थे।



