डॉ. कमल के. प्यासा – मण्डी
राजनीति में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे बहुमुखी व्यक्तित्व (विद्वान, शिक्षाविद, महान दार्शनिक और सर्वधर्म विचारक) बहुत कम देखने को मिलते हैं। विश्व इतिहास में ऐसा विरला ही कोई उदाहरण मिलता है।
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म 5 सितंबर 1888 को एक तेलुगु भाषी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम सीताम्मा और पिता का नाम सर्वपल्ली वीरास्वामी था। उनका जन्म तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के तिरुत्तणी गांव में हुआ था (जो वर्तमान में तमिलनाडु में स्थित है और पूर्व में आंध्र प्रदेश की सीमा से सटा हुआ था)। डॉ. राधाकृष्णन के चार भाई और एक बहन थी। उनके नाम के आगे ‘सर्वपल्ली’ इसलिए लगाया जाता है क्योंकि उनके पूर्वज सर्वपल्ली गांव से संबंध रखते थे।
उनकी प्रारंभिक शिक्षा 1896 से 1900 तक तिरुत्तणी के लूथरन मिशन स्कूल और तिरुपति में हुई। इसके पश्चात 1900 से 1904 के बीच वेल्लूर से पढ़ाई पूरी करने के बाद वे उच्च शिक्षा के लिए मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज चले गए। 1902 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्कृष्ट अंकों और छात्रवृत्ति के साथ उत्तीर्ण की। वर्ष 1903 में, जब उनकी आयु मात्र 16 वर्ष थी, उनका विवाह सिवाकामू से कर दिया गया। उस दौर में बाल विवाह की परंपरा प्रचलित थी।
वर्ष 1907 में उन्होंने दर्शनशास्त्र में स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और मनोविज्ञान, इतिहास तथा गणित विषयों में विशेष योग्यता प्राप्त की। 1908 में उनके घर पुत्री का जन्म हुआ, जिनका नाम सुमित्रा रखा गया। 1909 में दर्शनशास्त्र में एम.ए. करने के बाद उन्होंने उच्च अध्ययन जारी रखने के लिए कुछ समय ट्यूशन पढ़ाया। इसके बाद वर्ष 1918 में वे मैसूर विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर नियुक्त हुए और बाद में वहीं प्रोफेसर बने। इस दौरान अपने ओजस्वी भाषणों और लेखों के माध्यम से वे भारतीय दर्शन का प्रचार-प्रसार करने लगे। उन्होंने वेदों और उपनिषदों का गहन अध्ययन कर भारतीय संस्कृति के गौरव को वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत किया।
डॉ. राधाकृष्णन वर्ष 1931 से 1936 तक आंध्र विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। इसके बाद 1939 से 1948 तक उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के कुलपति का कार्यभार संभाला। साथ ही 1936 से 1952 तक वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्राध्यापक भी रहे। वर्ष 1946 में वे यूनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि नियुक्त हुए। 1947 से 1949 तक वे संविधान सभा के सदस्य रहे। इसके पश्चात 1949 से 1952 तक उन्होंने सोवियत संघ (मास्को) में भारत के राजदूत के रूप में सेवाएं दीं।
वर्ष 1952 में वे भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति बने और 1962 तक इस पद पर रहे। इसके बाद 1962 से 1967 तक उन्होंने देश के दूसरे राष्ट्रपति के रूप में राष्ट्र की निस्वार्थ सेवा की। इस दौरान 1953 से 1962 तक वे दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलाधिपति भी रहे।
डॉ. राधाकृष्णन को वर्ष 1954 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया। मात्र 12 वर्ष की आयु में जब उन्होंने बाइबल के महत्वपूर्ण अंशों को कंठस्थ कर लिया था, तब से ही उनकी मेधा की सराहना होने लगी थी। बाद में उन्हें विश्व के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों से मानद उपाधियां मिलीं। ब्रिटेन के मैनचेस्टर और लंदन में उन्हें भारतीय दर्शन और संस्कृति पर विशेष व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया।
जब उनके छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की इच्छा व्यक्त की, तो उन्होंने कहा, “मेराजन्मदिन अलग से मनाने के बजाय यदि इस दिन को ‘शिक्षक दिवस’ के रूप में मनाया जाए, तो मुझे अधिक गर्वहोगा।“ तभी से 5 सितंबर को पूरे देश में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। डॉ. राधाकृष्णन ने लगभग 40 वर्षों तक एक शिक्षक के रूप में विभिन्न शिक्षण संस्थानों में सेवाएं दीं और अनगिनत छात्रों का मार्गदर्शन किया।
उनका स्पष्ट मानना था कि शिक्षा के केंद्र में विद्यार्थी ही होता है, इसलिए विद्यार्थियों में नैतिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक मूल्यों का समावेश होना आवश्यक है। उनका विचार था कि जीवन में सुख-दुख साथ चलते हैं और मृत्यु ही परम सत्य है। इसलिए इंसान को सादगी, संतोष और सभी धर्मों का आदर करते हुए जीवन बिताना चाहिए।
शिक्षक दिवस के पावन अवसर पर डॉ. राधाकृष्णन के विचारों का स्मरण किया जाता है और उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को सम्मानित किया जाता है। विश्व भर में अलग-अलग तिथियों पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है—जैसे चीन में 10 सितंबर, भारत में 5 सितंबर और यूनेस्को द्वारा घोषित ‘विश्व शिक्षक दिवस’ 5 अक्टूबर को मनाया जाता है।
17 अप्रैल 1975 को लंबी बीमारी के बाद यह महान विभूति इस संसार से विदा हो गई। किंतु उनके विचार और योगदान आज भी प्रासंगिक हैं। राष्ट्र निर्माता वस्तुतः एक शिक्षक ही होता है, जो अथक परिश्रम से देश के नागरिकों को गढ़ता है। शिक्षक दिवस पर सभी गुरुजनों को शत-शत नमन।




