बेचारा हीरू: डॉo कमल केo प्यासा

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डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

बादल फटने के साथ आई बाढ़ भारी मलबे व भूस्खलन ने बेचारे हीरू के घर परिवार का नमो निशान ही मिटा दिया था। परिवार में हीरू की मां,पत्नी व बेटा बेटी के साथ ही साथ उसका छोटा सा घर भी नहीं रहा था। हीरू उस दिन दूसरे गांव किसी के यहां शौक प्रकट करने गया हुआ था इस लिए वह बच गया था। लेकिन वापिस पहुंचने पर कुछ भी तो नहीं रहा था (न सिर ढांपने की जगह रही थी और न ही कुछ खाने पीने को ही था) हीरू पागलों की तरह इधर उधर घूमते घूमते नजदीकी शहर जा पहुंचा। पेट के के लिए इधर उधर लोगों का काम या सामान उठा कर  किसी तरह कुछ जुगाड़ कर लेता लेकिन काम न मिलने पर बेचारा भूखे ही भटकता रहता।

एक दिन उसे शहर के विश्राम गृह का चौकीदार मियां राम (जो की उसी के गांव के नजदीक का था) मिल गया और बातों ही बातों में जब उसे हीरू की दर्दनाक हादसे की जानकारी मिली तो वह उसे(हीरू को) अपने साथ विश्राम गृह तक ले आया और विश्राम गृह के जे,ई को उसकी दुखभरी कहानी सुनाकर उसके रहने का प्रबंध स्टोर के बाहर बरामदे में कर दिया व सर्दी से बचाव के लिए उसे एक कंबल भी दे दिया। कुछ कपड़े जे,ई ने भी दे दिए थे। हीरू अब मियां राम चौकीदार व जे,ई के छोटे मोटे काम के साथ ही साथ विश्राम गृह में आने जाने वाले सैलानियों व मेहमानों का भी समान इधर उधर पहुंचने लगा था और अब उसके पेट का जुगाड़  ठीक से चल पड़ा था।

उस दिन बहुत ठंड थी हीरू ने इधर उधर से कुछ घास फूस और सूखी लकड़ियां इकठी करके उन्हें तसले में जला कर आग सेकने लगा था। बर्फ पड़नी शुरू हो गई थी। विश्राम गृह के एक कमरे में जे,ई व उसके साथी ठंड का जुगाड़ छोटी सी पार्टी के रूप में कर रहे थे। मेज के एक आेर बोतल खुली थी साथ ही चिकन की भरी हुई प्लेट भी सजी थी और बीच में ताश के पत्ते चल रहे थे।देखते ही देखते बोतल खाली हो गई।तभी एक दोस्त जे,ई,से कहने लगा शर्मा जी मजा नहीं आया ।

इतने में दूसरे ने चिकन की प्लेट उठाते हुवे कहा ये भी साला ठंडा हो गया है हीरू खा लेगा। फिर उसने 500 रुपए का नोट निकाला और हीरू को आवाज लगा कर कर  चिकन की प्लेट व 500 रुपए का  नोट देते हुवे कहा हीरू ये खाकर जल्दी से कुछ नमकीन एक पैकेट फोर सिक्योर व एक बोतल सोलन नंबर वन की ले आ जल्दी जाना। जी साहब जी अभी जाता हूं। हीरू ने पलेट वैसे ही वहीं रख दी और चल पड़ा बाजार की ओर।

नजदीक की दुकान से उसने नमकीन के पैकेट व फोर सिक्योर की डिब्बी पकड़ कर कोट की जेब में डाल ली और फिर आगे ठेके से  बोतल ले कर उसे एक हाथ में पकड़ लिया तथा दूसरे हाथ की मुट्ठी  में पैसे पकड़ कर फिर विश्राम गृह की ओर भागने लगा लेकिन भागते भागते उसका पैर एकदम गिरी बर्फ से फिसल गया और हीरू बोतल को बचाते बचाते खुद ही रास्ते में लगे लोहे के ग्रिल से टकरा कर धड़ाम से वहीं गिर गया और उसे माथे पर गहरी चोट लग गई ।

उसे अबअपनी कोई भी सुध बुध नहीं रही थी। अचेत अवस्था में ही न जाने वह कहां से कहां पहुंच गया था लेकिन उसकी बोतल व पैसों की पकड़ अभी भी वैसे है पक्की बनी थी। बर्फ अभी भी गिर रही थी। आने जाने वाला जो भी उसे देखता अपनी अपनी फबती देता कोई कहता देखो तो जमाने के हालात दिन भर करनी मजदूरी और फिर पीनी शराबे ।

ओ क्या जमाना आ  गया है खाने को मिले न मिले, शराब जरूर पिएं गे। शाम ढल चुकी थी और अंधेरा होने लगा था। उधर जे,ई व उसके दोस्त बेसब्री से हीरू का इंतजार कर रहे थे।जब हीरू नहीं पहुंचा तो तीनों दोस्त एक दूसरे को बुरा भला कहने लगे न जन न पहचान और वर्मा जी ने भी उसे पकड़ा दिया 500 का नोट अब देखते रहो और इधर देखो शर्मा जी को अपना नया कोट ही उसे दे दिया शर्मा जी आगे से सोच समझ के करना जन सेवा। सारी रात बर्फ पड़ती रही और न मालूम कब बेचारे हीरू की आत्मा उसके शरीर को छोड़ कर चली गई!

सूर्य की किरणे चारो ओर फैला चुकी थीं। सभीओर शांत वातावरण था। हीरू का शरीर सफेद बर्फ की चादर से ढका हुआ था। इतने में ही एंबुलेंस आ गई और कमेटी के कामगार घसीटते हुवे लाश को अंबुलेस में रखने लगते हैं। आने जाने वाले आपस में फुसफुसाते हुवे एक दूजे से कहते हुवे सुने जाते हैं शायद कोई लावारिस था! शायद कोई ठंड से मर गया! शायद कोई शराबी था। हर कोई अपने मत व्यक्त कर रहा था। छतों से बर्फ पिगल कर पानी की बूंदों में टपक रही थी और देखते ही देखते एंबुलेंस आंखों से ओझल हो जाती है।

बेचारा हीरू: डॉo कमल केo प्यासा

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