January 28, 2026

उल्कापात कमांए: एक कविता

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डॉ. जय महलवाल (अनजान)

डॉ. जय महलवाल (अनजान),
राजकीय महाविद्यालय, बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश

बड्डिया मेहनता ने डाल बूटे लगाए,
फेरी किस मांहनूए रिए सोचे से जलाए,
मारी ते जले पंछी पेखेरू,
तिना रे  जे अजे फंग बी नी थे आए।

क्या बीती हूंगी तिना रे दिलां पर,
इने कसूते मांहनूएं तिना रे टब्बरां रे टब्बर मुकाए,
फुकी ते जंगला रे जंगल,
फेरी बोलांए आवा पर्यावरणा जो शुद्ध बनाएं।

अपने लालचा खातर करी देयें एडा नुकसान,
माल माहनू  पंछी पखेरु लगीरे हूने परेशान,
जंगलां च अग लाईने,
 अपने कालजे जो केड़ी ठंड पाएँ l

मूए तुहां रे बी ए बच्चे,
कंआ तिना जो दोष लगवां ए,
कोई सीधा कम्म करी करा एड पड़ोसा च,
कजो एड़ा उल्कापात कमांए।

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