लाइफ सर्टिफिकेट (लघु कथा) — रविंदर कुमार शर्मा

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रविंदर कुमार शर्मा, घुमारवीं, जिला बिलासपुर
घर के अंदर से राजो के कराहने की आवाज आ रही थी जो पिछले काफी समय से बीमार चल रही थी तथा पी जी आई में उपचाराधीन थी ।रामु के पापा मेरी दवाई तो दे दो समय हो गया है दवाई का ।रामु उनका छोटा बेटा था जो घर से बाहर दिहाड़ी मज़दूरी करने गया था ।घर पर दोनों राजो व उसका पति विशम्भर थे ।बस थोड़ा सा रुको मैं घर का काम निपटा लूं फिर दवाई देता हूँ विशम्भर ने जल्दी जल्दी भैस को घास डालते हुए कहा । बिशम्भर लोक निर्माण विभाग से माली के पद से सेवानिवृत हुआ था !
बिशम्भर कई दिनों से अपनी पत्नी की बीमारी से अंदर ही अंदर बहुत परेशान था।उसके दो बेटे थे । बड़े बेटे को बहुत मेहनत से एम बी ए करवाया था ।उसकी शादी उसकी पसंद की ही लड़की से हुई थी जो अमीर परिवार से थी।शादी के बाद बेटे को केनेडा में अच्छी नौकरी मिल गई तथा वो अब अपने परिवार के साथ कैनेडा में रहता था तथा घर को लगभग भूल ही गया था ।जिस बेटे को इतने प्यार से पाल पोस कर बड़ा किया,पढ़ाया लिखाया आज वही पराया हो गया था।कभी कभार थोड़े पैसे भेज देता था ! विशंभर को उससे अब कोई उम्मीद भी नहीं थी ! छोटे बेटे का नाम राम था जिसे प्यार से रामु कहते थे। रामु ने भी अच्छे नम्बरों में बी एस सी की परीक्षा पास की थी लेकिन कहीं नौकरी ना मिल पाने के कारण मेहनत मजदूरी करके अपने पिता का हाथ बंटा रहा था साथ ही प्राइवेट आगे भी पढ़ाई कर रहा था ।
घर की माली हालत  उससे छुपी नही थी अत: पिता की सहायता करने में उसे गर्व महसूस होता था ! पिता की जो भी पेंशन मिलती थी मां के इलाज़ पर ही खर्च हो रही थी । डॉक्टरों ने बता दिया था कि राजो कुछ महीनों की ही मेहमान है अतः इसे घर पर ही रखो और इसकी सेवा करो । बस पिता और पुत्र दोनो उसकी दिन रात उसकी सेवा में लगे रहते थे। बाहर का काम निपटा कर विशम्भर जल्दी जल्दी हाथ पोंछता हुआ अंदर कमरे में पहुंचा तो राजो की आंख लग गई थी। राजो उठो ,लो दवाई खा लो ! राजो नींद से जैसे ही जागी उसने दवाई राजो के हाथ में थमा दी ।राजो ने पानी का गिलास उसके हाथ से लिया और दवाई खा ली ।राजो ने विशम्भर को अपने पास बिठाया और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर कहा रामु के पापा बहुत काम करते हो, कभी आराम भी कर लिया करो। मैं भी काम करना चाहती हूं पर यह कमबख्त बीमारी उठने ही नही देती है। भगवान करे अब जल्दी मौत आ जाये। विशम्भर ने बड़े प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, राजो तुम जल्दी ठीक हो जाओगी !  ज़्यादा बोलने के लिए डॉक्टर ने मना किया है इसलिए तुम दवाई खाओ और सो जाओ। यह कहते हुए विशम्भर ने उसे लिटा दिया।
विशम्भर जानता था कि राजो चंद दिनों की मेहमान है । विशम्भर ने उसकी दवाई पर नज़र डाली केवल चार दिन की दवाई बची है। मन ही मन में सोचने लगा कि अभी पेंशन मिलने में तो पांच दिन का समय है!मन ही मन सोच रहा था कि घर मेँ पैसे भी नहीं बचे हैं दवाई कहाँ से आएगी ! महीने के आखिरी दिन हैं चलो पेंशन मिलने पर दवाई भी लेता आऊंगा । हालांकि बिशम्भर कि पेंशन भी बहुत कम थी लेकिन कुल मिलकर घर का खर्चा किसी तरह चल रहा था !
पहली तारीख को विशम्भर अपनी पेंशन लेने बैंक में समय पर पहुंच गया था क्यूंकी उसे राजो की दवाई लेनी थी । बैंक मेँ बहुत लंबी लाइन लगी थी ! पैसे निकालने का फार्म भर कर वह अपनी बारी का ईंतज़ार करने लगा ।थोड़ी देर के बाद केशियर ने आवाज लगाई और उसकी पास बुक यह कहते हुए वापिस कर दी कि आपके खाते में पेंशन नहीं आई है । विशम्भर पर मानो घड़ों पानी गिर गया हो । उसकी हालत देखने लायक थी ! उसे पैसों कि बहुत जरूरत थी , अब राजो की दवाई कैसे खरीद पाऊंगा । वह बेंच के ऊपर बैठ गया ! उसे बेंच भी घूमता हुआ महसूस हो रहा था ! उसने जड़वत से होकर पासबुक पकड़ ली।थोड़ी देर के बाद वह प्रबंधक के पास गया तथा पेंशन ना आने का कारण पूछा । प्रबंधक ने कहा कि आपने पिछले महीने आपना लाइफ सर्टिफिकेट कोषागार मेँ नहीं दिया होगा, अतः पेंशन नहीं आई है। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ क्योंकि हर वर्ष वह अपना लाइफ सर्टिफीकेट समय पर जमा करवा देता था लेकिन राजो की बीमारी की परेशानी के कारण इस बार चूक हो गई । उसे अपने ऊपर बहुत गुस्सा आ रहा था लेकिन क्या किया जा सकता था ।उसने प्रबंधक से अपनी पत्नी की दवाई का वास्ता देकर पैसे लेने चाहे लेकिन उसे पैसे नहीं मिले ।
उसने प्रबंधक से यह भी कहा कि साहब में जिंदा जागता इंसान आपके सामने खड़ा हूँ में जिंदा हूँ मुझे पेंशन दीजिये, लेकिंन प्रबंधक पर उसकी किसी बात का असर नहीं हुआ । विशम्भर मन ही मन परेशान था आखिर राजो की दवाई कहाँ से आएगी।। ऐसा सोचता हुआ विशम्भर खाली हाथ घर की ओर लौट चला। घर पहुंचते ही राजो ने पूछा रामु के पापा क्या हुआ आपका चेहरा क्यों उतरा हुआ है, आप क्यों परेशान नज़र आ रहे हैं।विशम्भर ने उसे बताया कि उसे आज पेंसन नहीं मिली क्योंकि वह जिंदा नहीं है अगर ज़िंदा होता तो क्या पेंशन नहीं मिलती? आप ज़िंदा नहीं है यह क्या बोले जा रहे हैं । राजो की सांसें फूल रही थी ।विशम्भर एक दम से राजो की ओर लपका ।राजो की सांसें बहुत तेजी से चल रही थी। विशम्भर ने उसे  एक गिलास पानी दिया लेकिन पानी भी अंदर जाने का नाम नहीं ले रहा था । विशम्भर ने राजो का सिर अपनी गोद मे रखा और धीरे धीरे उसका माथा सहलाने लगा। राजो ने एक नज़र विशम्भर के चेहरे पर डाली और कहा रामु के पापा अब आपको मेरे लिए दवाई लाने की आवश्यकता नहीं पडेगी शायद मेरा अंतिम समय आ गया है । रामु और अपना ख्याल रखना। बड़े बेटे को कहना तेरी मां तुझे बहुत याद करती थी। रामु की शादी गांव की लड़की से करना जो तुम दोनों का ख्याल रख सके। इतना कहते ही राजो को एक ज़ोर की उल्टी हुई और उसने प्राण त्याग दिए । विशम्भर राजो से इतना भी नहीं कह सके कि  बैंक वालों को लाइफ सर्टिफिकेट चाहिए था जो गलती से मैं समय पर जमा नहीं  करवा सका था । इसी कारण से बैंक वालों ने इस महीने पेंशन नहीं दी । विशम्भर बड़बड़ा रहा था क्या एक ज़िंदा इंसान को भी अपने ज़िंदा होने का सबूत देने के लिए लाइफ सर्टिफिकेट देना पड़ेगा ।अब भी विशम्भर कभी हाथ में पकडी पास बुक को देख रहा था तो कभी राजो के चेहरे को देख रहा था जो अब इस दुनिया में नहीं थी ।
***
(रवींद्र कुमार शर्मा का जन्म 20 सितंबर 1956 को हुआ। उन्होंने स्नातक शिक्षा प्राप्त की है और सिविल ड्राफ्ट्समैन में डिप्लोमा किया है। उनके 36 वर्षों का बैंकिंग अनुभव है और वे यूको ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान के निदेशक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। रवींद्र जी की रचनाएँ विभिन्न राष्ट्रीय पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रही हैं। उनकी दो काव्य संग्रह प्रकाशित हैं, “गुलदस्ते रे फुल्ल” (हिमाचली) और “कुसुमांजलि” (हिंदी)। वे कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित हो चुके हैं और वर्तमान में बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश में निवास करते हैं।)

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