उन दिनों मैं आर्य समाज पाठशाला में शायद दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ता था। तब यही मुकुंद राम जी ऐसे ही कुर्ता-पायजामा और वास्केट पहने होते थे, बिलकुल आज जैसे ही। उस समय ये पाठशाला में चपरासी हुआ करते थे। समय का कुछ पता नहीं चलता, कैसे निकल जाता है।
मुकुंद मंडी के एक जाने-माने प्रसिद्ध बोटी ही तो हैं। आज से 8–10 वर्ष पूर्व तक इन्हीं की तो तूती बोलती थी। कोई भी ब्याह-शादी या पारिवारिक तीज-त्योहार की धाम मुकुंद बोटी के बिना अधूरी ही समझी जाती थी। घर-घर की पहचान और नाम बस मुकुंद बोटी तक ही सीमित रहता था। लेकिन अब उम्रदराज हो जाने के कारण बोटी का काम नहीं करते। अरे, 94–95 के हो गए हैं। अब तो इनके बेटे और पौत्रों ने इनकी यह बोटी गिरी संभाल ली है। हाँ, सभा-सम्मेलनों और बाजार में अक्सर कहीं न कहीं मिल ही जाते हैं।
उस दिन भी तो अचानक कवि सम्मेलन के सभागार में मुकुंद बोटी ही तो पहुंचे थे। उनके हाथ में एक देवी माता का कैलेंडर और बूंदी के लड्डुओं का लिफाफा था। कवि सम्मेलन में जब मुकुंद बोटी का परिचय सम्मानपूर्वक करवाया गया, तो उन्होंने खुशी में बूंदी के लड्डुओं का लिफाफा वहीं सभी कवियों में बाँट दिया था।
अब भी कभी-कभी बाजार में अपने उसी लिबास (वास्केट, कुर्ता-पायजामा) में, हाथ में छाता लिए, धीरे-धीरे चलते मुस्कुराते मिल जाते हैं।
उस दिन मैं महाजन बाजार से होकर घर लौट रहा था। वह बाजार जा रहे थे और मुस्कुराते हुए कहने लगे, “कुछ दे दो न…!”
मैंने जेब टटोली, 500-500 के नोट थे। पीछे की जेब में हाथ डाला तो एक 10 रुपये का सिक्का मिला, जो मैंने उन्हें पकड़ा दिया। उन्होंने उसे माथे से लगाकर जेब में डाल लिया और दुआएं देते हुए चल दिए।
मैं मन ही मन सोचने लगा, “कैसे इंसान इतना मजबूर हो जाता है… मैंने उन्हें क्यों 10 रुपये देकर निपटारा कर लिया? कुछ ज्यादा, 50–60 क्यों नहीं दे दिए? क्या पता उन्हें कैसी और कितनी जरूरत थी?” मैं भी तो मजबूर था, छुट्टा भी तो नहीं था मेरे पास।
इन्हीं विचारों में खोया न जाने कब मैं घर पहुँच गया। रात को भी नींद नहीं आ रही थी। बस मुकुंद बोटी के बारे में ही बार-बार सोचता रहा—“न जाने उसके घर के हालात कैसे होंगे, कोई ऐसे ही थोड़े मांगता है?”
अभी कुछ दिन पूर्व ही रविवार के दिन मैं बाजार जा रहा था। चौहाटा बाजार में आगे से आते मुकुंद जी मिल गए। मैंने कुछ राहत सी महसूस की और झिझकते हुए अभिवादन के साथ कहने लगा,
“क्षमा करना मुकुंद जी, मैं उस दिन आपको कुछ दे नहीं पाया था… छुट्टा नहीं था न।”
“कोई बात नहीं जी… सर, अब मिल गए, अब दे दो।”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला। बड़े नोटों के साथ छोटे भी थे। मैंने उनमें से उन्हें 50 रुपये का नोट पकड़ाना चाहा, तो वह कहने लगे,
“दे दो सर, 100–200 वाला ही दे दो न…”
मुझे अपनी पिछली बार की शर्मिंदगी खाये जा रही थी, इसलिए मैंने उन्हें खुशी-खुशी 200 रुपये का नोट पकड़ाया। उन्होंने पहले उसे चूमा, फिर माथे से लगाया और वास्केट की जेब में डाल लिया तथा खुशी-खुशी आशीष देते हुए चल दिए।
इतने दिनों से मैं जो बोझ अनुभव कर रहा था, अब उसके स्थान पर अपने आपको कुछ हल्का महसूस करने लगा था। उस रात मैंने बहुत ही मीठी और गहरी नींद का आनंद लिया




