तमाशा – कविता

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डॉ.  कमल के.प्यासा – मण्डी

पेट करवाता दंगल, नचवाता भालू-बंदर।

ढोल पिटवा-पिटवा,

दिखाता भांति-भांति के करतब,

जिन्हें कहते “तमाशा” हैं!

बीन बजा के, सांप दिखा के,

“गीली-गीली” कह, फूल-पत्ते दिखा,

कुछ सफाई से छिपा, करते मनोरंजन,

वह भी तमाशा है!

प्राकृतिक आपदाओं, विपदाओं, घटनाओं, दुर्घटनाओं,

बाढ़, तूफानों और जलजलों में छिपे खौफ,

बन जाते तमाशा हैं!

तोड़-फोड़, मार-धाड़,

रोने-चिल्लाने, हंसने-हंसाने,

आगजनी, धमाकों, निर्माण-विनाशों को भी,

कहते तमाशा हैं!

मनोरंजन करवाता, सोच जगाता,

मनन-चिंतन, जिज्ञासा, इच्छाएं,

बढ़ाता चाहत दिल की,

वह आशाएं तमाशा हैं!

फेहरिस्त लंबी है: तमाशाई हैं,

तमाशबीन हैं, नज़रें जुदा-जुदा हैं,

हर शय जो देखता है,

वही बन जाती तमाशा है!

जांबाज़ तलाशता है— तमाशबीन के तमाशों से,

रोने-चिल्लाने की दर्दभरी आवाज़ों से,

रख जान हथेली पे,

बचाता डूबते-मरते लोगों को अनहोनी के खेलों से…

और खुद बनता तमाशबीनों का नया ही तमाशा है!

ईस्ट इंडिया कंपनी व जारी सिक्के

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