पेट करवाता दंगल, नचवाता भालू-बंदर।
ढोल पिटवा-पिटवा,
दिखाता भांति-भांति के करतब,
जिन्हें कहते “तमाशा” हैं!
बीन बजा के, सांप दिखा के,
“गीली-गीली” कह, फूल-पत्ते दिखा,
कुछ सफाई से छिपा, करते मनोरंजन,
वह भी तमाशा है!
प्राकृतिक आपदाओं, विपदाओं, घटनाओं, दुर्घटनाओं,
बाढ़, तूफानों और जलजलों में छिपे खौफ,
बन जाते तमाशा हैं!
तोड़-फोड़, मार-धाड़,
रोने-चिल्लाने, हंसने-हंसाने,
आगजनी, धमाकों, निर्माण-विनाशों को भी,
कहते तमाशा हैं!
मनोरंजन करवाता, सोच जगाता,
मनन-चिंतन, जिज्ञासा, इच्छाएं,
बढ़ाता चाहत दिल की,
वह आशाएं तमाशा हैं!
फेहरिस्त लंबी है: तमाशाई हैं,
तमाशबीन हैं, नज़रें जुदा-जुदा हैं,
हर शय जो देखता है,
वही बन जाती तमाशा है!
जांबाज़ तलाशता है— तमाशबीन के तमाशों से,
रोने-चिल्लाने की दर्दभरी आवाज़ों से,
रख जान हथेली पे,
बचाता डूबते-मरते लोगों को अनहोनी के खेलों से…
और खुद बनता तमाशबीनों का नया ही तमाशा है!




