दस्वंध : साधूता में छुपा सच

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रणजोध सिंह

अनंत का आज चालीसवा जन्मदिवस था | अधिकतर वह अपना जन्मदिवस परिवार के सदस्यों संग किसी नामी – गिरामी रेस्तरा में मनाता था लेकिन सर्वप्रथम ईश्वर का धन्यवाद करने मंदिर अवश्य जाता था | परन्तु इस बार कोरोना के कारण मंदिर के कपाट बंद थे अतः वह मंदिर की दहलीज़ से ही शीश नवा कर घर वापिस हो गया | रास्ते में उसे एक फल बेचने वाले सरदारजी मिले जिन्होंने उतम क्वालिटी के फल बड़े ही सुंदर ढंग से अपनी छोटी सी रेहड़ी पर सज़ा रखे थे |

अनंत आमतौर पर रेहड़ी वालों से कुछ नहीं खरीदता था लेकिन वह फलों की सजावट तथा क्वालिटी से इतना प्रभावित हुआ कि उसने न चाहते भी साठ रुपए प्रति दर्जन के हिसाब से एक दर्जन केले ले लिए | तभी वहां एक अधेड़ उम्र की महिला आई, रेहड़ी वाले ने वही केले उसे तीस रुपए प्रति दर्जन के हिसाब से दे दिए | अनंत को बहुत आश्चर्य हुआ | उसने पूछ ही लिया – सरदार जी आपने मुझे यह केले साठ रुपए और उस महिला को तीस रुपए दर्जन दिए, माजरा क्या है? फलवाला हाथ जोड़कर मंद-मंद मुस्कुराते हुए बोला – साहिब जी यह औरत विधवा है, पर बड़ी ग़ैरतमंद है, न किसी से कुछ मांगती है न उधार लेती है, न खराब वस्तु लेती है और न ही किसी वस्तु के लिए सोदेवाजी करती है |

कुछ रुक कर वह आगे बोला – साहिब जी, गुरूजी कहते है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आय का दसवा हिस्सा यानि दस्वंध परमात्मा के कामों लिए खर्च करना चाहिए | मंदिर, मस्जिद और गुरूद्वारों में तो लाखों लोग अपना दस्बंध भेट करते हैं | परन्तु मैं इस महिला जैसे ख़ुद्दार लोगों को कम दाम पर फल बेच कर अप्रत्यक्ष रूप से भगवान के वन्दों की कुछ सहयता कर देता हूँ | अनंत ने तुरंत उसे दस दर्जन केले और दस किलों संतरे लिए और पास वाली झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों में बाँट दिए | उन बच्चों के चेहरे की चमक में उसे दस्वंध का एक नया अर्थ मिल चुका था |

Gender Equality Challenges: Governor Shukla Calls For A Shift In Societal Mindsets

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