देव मिलन उत्सुकता व लोगों की प्रतीक्षा का पर्व : महाशिवरात्रि – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – मण्डी

शिवरात्रि का यदि शाब्दिक अर्थ देखा जाए तो वह होता है, भगवान शिव से संबंधित रात्रि या भगवान शिव को समर्पित रात्रि, अर्थात शिव की रात्रि जो कि आनंद प्रिदायिनी होती है।

वैसे तो हर मास यानी वर्ष में 12 शिवरात्रियां होती हैं। हर शिवरात्रि कृष्ण पक्ष के चतुर्दशी को आती है। लेकिन फाल्गुन मास के कृष्णपक्ष में पड़ने वाली शिवरात्रि महा शिवरात्रि कहलाती है और यह वर्ष में केवल एक ही बार आती है। महा शिवरात्रि सबसे महत्वपूर्ण शिवरात्रि होती है। इसमें भगवान शिव पार्वती की पूजा, अर्चना, व्रत – उपवास व जागरण आदि किया जाता है।

महा शिवरात्रि के संबंध में कई इसके पौराणिक कथाएं सुनने को मिलती हैं, जो कि कुछ इस प्रकार से अपने अपने ढंग से सुनी- सुनाई जाती हैं।

1.भगवान शिव अवतरण सम्बंधित :

इस धरना के अनुसार इस दिन भगवान शिव महानिशा में अग्नि से ज्योतिर्लिंग (निराकार) के रूप में प्रकट हुए थे। जिस पर सबसे पहले इनका पूजन देव ब्रह्मा व भगवान विष्णु द्वारा किया गया था।

2.शिव विवाह दिवस सम्बंधित :

इसके अनुसार इस दिन को भगवान शिव व देवी पार्वती के विवाह के रूप में भी मनाया जाता है। क्योंकि इसी दिन भगवान शिव वैराग्य को त्याग कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश हुए थे। इसी लिए इस दिन शिव विवाह व बारात आदि की झांकियां भी निकाली जाती हैं ।

3.समुद्र मंथन और विषपान सम्बंधित :

इसमें देवों व असुरों द्वारा समुद्र मंथन से जब विष निकला था तो सभी घबरा गए थे। उस समय विष से होने वाले दुष्परिणाम के कष्ट से मुक्ति भी भगवान शिव द्वारा उस विष का पान करके दिलाई गई थी। जिससे उस विष को कंठ में रखने पर उनका कंठ नीला हो गया था, तभी से भगवान शिव नील कंठ कहलाए थे।

4.महा शिवरात्रि और तांडव सम्बंधित :

कहते है कि इसी दिन भगवान शिव क्रोधित व विनाशकारी रूप में आकर जोश से तांडव नृत्य में लीन हो गए थे। तभी से इस दिन को शिवरात्रि के रूप में देखा देख व मनाया जाने लगा ।

महा शिवरात्रि के दिन भगवान शिव व शक्ति की आराधना के साथ शिवलिंग पंचाभिषेक पूजन में जल, दूध,बेलपत्र आदि का विशेष महत्व बताया गया है।

पूजन के लिए सबसे पहले तो ब्रह्म मूहर्त में स्नान करना चाहिए। सूर्य के उदय होने पर उसे जल अर्पित करने के पश्चात भगवान शिव व देवी माता पार्वती की मूर्तियां चित्र को उचित ढंग से स्थापित करके शिव लिंग पर जल, दूध और गंगा जल से अभिषेक करें तथा साथ में फूल, बेलपत्र व बेर चढ़ा कर घी का दीपक जलाएं और शिव चालीसा का पाठ करें व ॐ नम:शिवा:का जाप करें। अंत में भोग लगा कर सभी में प्रसाद को बांटें। इस तरह शिव पार्वती के पूजन से मनवांछित फल प्राप्त होता है, विवाह जल्दी व मन पसंद का होता व गृहस्थी जीवन सुखी और फूलता फलता है।

महा शिवरात्रि के पूजा पाठ व व्रत की महिमा तो एक पौराणिक कथा से भी हो जाती है, कथा के अनुसार द्वापर युग में एक चित्रभानू नाम का शिकारी अपने परिवार के लालन पालन के लिए जानवरों का शिकार किया करता था। एक दिन वह शिकार की खोज में जब जंगल की ओर निकल गया और चलते चलते दूर एक तालाब के किनारे पहुंच गया, वही जब अंधेरा होने लगा तो वह एक बिल के पेड़ पर चढ़ कर शिकार का इंतजार करते हुए सोचने लगा कि पानी पीने को कोई न कोई जानवर तो आएगा ही। वह भूखा प्यासा इंतजार में बैठे उधर देखता रहता है। कुछ समय के पश्चात उधर पानी पीने के लिए एक एक करके, तीन मादा हिरन बारी बारी से पहुंचते हैं। पहला मादा हिरन गर्भधारण किए थी, जब वह पानी पीने लगती है तो शिकारी उसे मरने के लिए तीर कमान में लगा लेता है, जिस पर वह मादा हिरन अपनी गर्भ की मजबूरी बता कर, प्रसव होने के बाद आने का वादा करके चली जाती है। थोड़ी ही देर के पश्चात दूसरी मादा हिरन पहुंचती है, जो कि कुछ देर पूर्व ही ऋतु से निवृत हुई होती है। शिकारी चित्र भानू जब उसे भी मारने को तीर कमान पर चढ़ाता है तो वह मादा हिरन भी अपनी मजबूरी बताते हुए (अपने पति के इंतजार का हवाला दे कर), पति से मिल कर आने का वादा करके, शिकारी का आभार प्रकट करते हुए चली जाती है। अब शिकारी मन ही मन चिंतित होने लगता है, कि खुद तो वह भूखा प्यासा है ही, उधर घर पर भी, सभी भूखे प्यासे उसका इंतजार कर रहे होंगे, वह सोच ही रहा था कि उसी समय एक अन्य मादा हिरन अपने बच्चों के साथ उधर पानी पीने पहुंच गई, शिकारी चित्र भानू उसी तरह, उसे मरने को ज्यों ही तैयार हुआ तो वह मादा हिरन रोते हए कहने लगी, “मुझे मत मारना शिकारी, देखो मेरे छोटे छोटे बच्चे अनाथ हो जाएंगे, मैं वादा करती हूं कि मैं अपने इन बच्चों को इनके पिता के हवाले करके शीघ्र ही तुम्हारे पास लौट आऊंगी, तब तुम मुझे मार लेना।”

इस तरह वह मादा हिरन भी उससे किसी तरह छूट कर निकल जाती है। अंधेरा छटने लगा तो शिकारी मित्र भानू इधर उधर अंगड़ाई लेने लगा, जिससे कुछ बिल पत्र नीचे गिर गए, उन्हीं बिल पत्रों में से कुछ बिल पत्र वृक्ष के समीप नीचे स्थापित शिवलिंग पर गिर कर उसे अभिषेक करते रहे, जिनसे कि चित्र भानू (शिकारी) बिल्कुल बेखबर था। तभी एक नर हिरन उधर पहुंच गया, जिससे शिकारी चित्र भानू के शरीर में फुर्ती आ गई और उसने वैसे ही उसे भी मारने को धनुष उठा लिया और निशाना साधने लगा, तो नर हिरन बोला, “ठहर, शिकारी भाई मुझे मत मरना, मेरा परिवार मेरा इंतजार कर रहा है, मैं उन्हें मिल कर आता हूं, तब तू मुझे मार लेना। “तब शिकारी उसे उन तीन मादा हिरन के बारे में सारी कहानी सुनते हुए कहता है कि अब मैं तुझे नहीं छोड़ सकता, बार बार मुझे ठगा जा रहा है। तब उस नर हिरन ने कहा, “जहां तुमने उन्हें छोड़ा है कृपया मुझे भी छोड़ दो, मैं वापिस आने का वादा करता हूं, अगर मैं मर गया और वापिस नहीं पहुंचा तो वो सब अपना वादा कैसे निभा पाएगी, बिना अपने पति से मिले कैसे यहां पहुंचेगी वह। मैं उन सभी के साथ तुम्हारे पास अभी पहुंचता हूं, कृपया मुझे उनके पास जाने दो! ”

शिकारी चित्र भानू का रात भर भूखा प्यासा रहने व पेड़ पर बार बार हिलने डुलने से बिलपत्र शिवलिंग पर अपने आप गिर कर अर्पित होते रहे, जिससे शिकारी की पूजा अर्चना, व्रत व जागरण सभी कुछ उस देव कृपा से अपने आप होता रहा, जिसका फल उसकी हिंसक प्रवृति के अपने आप बदल जाने के रूप में मिल गया था और उसके धनुष बाण उससे छूट कर गिर गए। अब उसे अपने पूर्व के हिंसक व्यवहार पर लज्जा आ रही थी। तभी वह समस्त हिरण परिवार सहित (अपने किए हुए वादे के अनुसार) उसके समक्ष आ कर खड़े हो गए, ताकि वह उनका शिकार कर सके! लेकिन शिकारी तो शर्म से पानी पानी हो गया । भगवान शिव की कृपा से उन सभी को मोक्ष की प्राप्ति हो गयी। इस प्रकार महा शिवरात्रि के दिन शिव पूजन व उपवास की क्या महता है, उसकी भी जानकारी हो जाती है।

महा शिवरात्रि का यह पवित्र पर्व रूपी त्योहार सभी जगह अपनी अपनी तरह से बड़ी ही धूम धाम से मनाया जाता है। इधर हिमाचल प्रदेश में (देव भूमि होने के कारण) तो शिवरात्रि को मेलों के रूप में जगह जगह मनाते हुए देखा जा सकता है। प्रदेश के जिला मंडी में तो अंतरराष्ट्रीय मेला के रूप में इस त्योहार को 7 दिनों के लिए (उत्सव रूप में मंडी शहर के पड्डल मैदान में) मेलों के रूप में सुन्दर आयोजन प्रशासन द्वारा किया जाता है। जिसमें दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़ आदि प्रदेशों के व्यापारी पहुंच कर व्यापार के साथ ही साथ सांस्कृतिक आदान प्रदान भी करते हैं। पडडल के विशाल मैदान में विभिन्न विभागों व व्यापारिक संस्थानों द्वारा अपने अपने पंडालों में प्रदर्शनियों के आयोजन के साथ ही साथ झूलों, बाहर से आए व्यापारियों द्वारा, खाने पीने व अन्य सभी तरह के सामन की बिक्री का भी आयोजन रहता है। इसी मैदान में 7 दिनों तक लगातार छोटे बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन, स्कूली छात्र छात्राओं, पुलिस, होम गार्ड अन्य विभागों द्वारा खेलों का प्रदर्शन भी किया जाता है।

मेलों में विशेष रूप से जिले भर के स्थानीय देवी देवताओं को (उनके देवलूओं सहित) प्रशासन द्वारा विशेष आमंत्रण द्वारा बुलाया जाता है। इस तरह से लगभग 220 से 225 तक देवी देवता अपने अपने देवलूओं के साथ इन मेलों में शामिल होते हैं। सभी देवी देवता सबसे पहले देव माधो राव के मंदिर दमदमा, में पहुंच कर अभिवादन करके अपनी हाजरी भरते हैं। पहले दिन भूत नाथ मंदिर में मुख्य अतिथि या फिर प्रशासनिक अधिकारी द्वारा पूजा अर्चना की जाती है। रियासत काल में यह कार्य रियासत के राजा द्वारा किया जाता था। प्रशासन द्वारा मेले की शुरुआत अर्थात पहले दिन, देव माधव राव की पालकी (शोभा यात्रा जिसे जलेब भी कहते हैं) निकाली जाती है, जिसमें मुख्य अतिथि, प्रशासनिक अधिकारी, विशिष्ठ व आम जनता आदि के साथ ही साथ बाहर से आए सभी देवी देवता आदि अपने गाजे बाजे के साथ शामिल होते हैं। यह शोभायात्रा शहर से होती हुई पडडल पहुंचती है, जहां मुख्य अतिथि द्वारा प्रदर्शनियों के अवलोकन के पश्चात मेला शुरू किया जाता है। रात्रि को सेरी मंच पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन रहता है, जिसमें प्रदेश व बाहर से आए कलाकारों द्वारा अपनी कला का प्रदर्शन किया जाता है।

मेलों में शोभा यात्रा का आयोजन 3 बार किया जाता है, सर्वप्रथम पहले दिन, फिर बीच और फिर आखिर में। आखिर का मेला चौहट्टा बाजार में लगता है और इस दिन सारा बाजार देवी देवताओं व श्रदालुओं से भर जाता है, इस लिए सारी ट्रैफिक चौहट्टा बाजार की बंद कर दी जाती है।

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