एक देश, एक चुनाव समय की मांग: जयराम

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नेता प्रतिपक्ष जयराम ठाकुर ने “एक देश, एक चुनाव” को देश की जरूरत बताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इसके लिए आभार जताया। उन्होंने यह विचार 129वें संविधान संशोधन से संबंधित संयुक्त संसदीय समिति की बैठक में रखे, जिसकी अध्यक्षता लोकसभा सांसद पी.पी. चौधरी ने की।

जयराम ठाकुर ने कहा कि बार-बार चुनाव होने से न केवल धन और संसाधनों की बर्बादी होती है, बल्कि विकास कार्य भी प्रभावित होते हैं। उन्होंने बताया कि 1951 से 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते रहे थे और हिमाचल में यह व्यवस्था 1977 तक चली। बार-बार आचार संहिता लागू होने से नीति निर्माण और योजनाओं के कार्यान्वयन में बाधा आती है।

उन्होंने माना कि “एक देश-एक चुनाव” लागू करने से कुछ राज्यों के कार्यकाल में कटौती हो सकती है, लेकिन इसके दीर्घकालिक लाभ देशहित में हैं। इस कठिन कार्य की पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही कर सकते हैं, क्योंकि उनका रिकॉर्ड चुनौतीपूर्ण निर्णयों का रहा है।

जयराम ठाकुर ने समिति के समक्ष यह भी सुझाव रखा कि जैसे “एक देश-एक चुनाव” की योजना लाई जा रही है, वैसे ही देशभर में विधान परिषद की व्यवस्था को भी एक समान बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि कुछ राज्यों में यह व्यवस्था है और कुछ में नहीं, जिससे असमानता पैदा होती है। समिति ने उनके सुझाव की सराहना की और इसे उचित मंच पर रखने का आश्वासन दिया।

प्रदेश की मौजूदा कांग्रेस सरकार पर निशाना साधते हुए जयराम ठाकुर ने कहा कि मुख्यमंत्री विपक्ष पर तो आरोप लगाते हैं, लेकिन सरकार की बिगड़ती स्थिति के लिए स्वयं जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि ढाई साल में सरकार ने न केवल जनता, बल्कि अपने ही मंत्रियों और विधायकों का विश्वास भी खो दिया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के युवा और बुजुर्ग मंत्री तक कई बार इस्तीफा देने की बात कह चुके हैं। भले ही उन्होंने राजनीतिक विवशताओं में अपने बयान वापस लिए हों, लेकिन यह सरकार की आंतरिक कमजोरी को उजागर करता है। यहां तक कि मंत्रियों के परिजन भी सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं।

जयराम ठाकुर ने बताया कि अब तक छह कांग्रेस विधायक और तीन निर्दलीय सरकार से अलग हो चुके हैं। राज्यसभा चुनाव में हार का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि सरकार का नेतृत्व कमजोर है और कांग्रेस खुद अंदरूनी गुटबाजी की शिकार है। उन्होंने दावा किया कि मुख्यमंत्री की लोकप्रियता अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच चुकी है।

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