हिमाचल से प्राप्त गाधिया सिक्के व ऐतिहासिक परिचय

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डॉ. कमल के. प्यासा –  मण्डी

गाधिया शब्द की उत्पत्ति “गर्दभिय” या “गर्दभ” या “गर्दभिला” से बताई जाती है। गर्दभ व गर्दभिला का अर्थ गधा होता है। यही बात गाधिया सिक्कों पर लागू की गई है, क्योंकि इन सिक्कों के विकृत व अस्पष्ट रंग-रूप को देखते हुए ही इनकी उत्पत्ति गधा वंश से बताई जाती है। इन सिक्कों का चलन छठी से तेरहवीं शताब्दी के मध्य, पश्चिम व मध्य भारत के राजस्थान, गुजरात व मालवा में प्राचीन व मध्ययुगीन चांदी-तांबे के सिक्कों के साथ छठी शताब्दी में (गुप्त साम्राज्य के पतन के बाद) हुआ था। इन्हें सासानियन सिक्कों के नाम से भी पहचाना जाता है, क्योंकि इन सिक्कों की शैली फारस (ईरान) साम्राज्य से प्रभावित देखी गई है और इन्हें इंडो-सासानियन सिक्के भी कहा जाता है। पाँचवीं-छठी शताब्दी में ही जिस समय इधर हूणों के आक्रमण हुए थे तो सासानियन सिक्के भी उनके साथ यहाँ पहुँच गए थे और बाद में यहाँ चावड़ा, सोलंकी (चालुक्य) व बघेल जैसे वंशों ने भी इसी प्रकार के सिक्के बनाने शुरू कर दिए थे। इस तरह से इन सिक्कों का चलन तेरहवीं शताब्दी के (अलाउद्दीन के आक्रमण के समय) अंत तक मुख्य मुद्रा के रूप में चलता रहा। शुरू-शुरू में ये सिक्के कुछ पतले होते थे, लेकिन बाद में कुछ मोटे रूप में बनने लगे थे। पहले इनमें एक ओर राजा के चेहरे की आकृति बनी होती थी, बाद में सपाट रेखाएँ व पैरों के चिन्ह वाले सिक्के बनने लगे थे।

सिक्के के दूसरी ओर अग्नि वेदिका का चित्रण रहता था, जो कि बाद में रेखाओं और बिंदुओं के रूप में दिखने लगा था। इन चांदी के सिक्कों का मानक भार लगभग 4.35 ग्राम होता था। हिमाचल में गाधिया सिक्के मंडी, कांगड़ा, कुल्लू, चंबा व सिरमौर से प्राप्त हो चुके हैं।

मंडी से प्राप्त गाधिया का विस्तार से विवरण :

1. सिक्के की धातु = चांदी
आकार = गोलाकार।
व्यास = 2.1 से. मी.
मोटाई = 0.08 से. मी.
भार = 3.800 ग्राम।
काल = छठी से तेरहवीं शताब्दी।
लिपि = ब्राह्मी।
संग्रहकर्ता : कमल के. प्यासा, परुथी संग्रहालय, मंडी।
सिक्का प्राप्ति स्थान = मंडी, बाजार की खरीद।

सिक्के का विवरण = इस सिक्के के एक ओर मध्य में एक खड़ी आयत दिखाई गई है, जो कि नीचे की पड़ी आयत पर खड़ी है। आयतों के बाहर की ओर बिंदुओं वाली सीमा रेखा बनी है। बीच वाली खड़ी आयत के दोनों ओर एक-एक स्तंभ जैसी आकृति देखने को मिलती है। ऊपर वाली आयत को कोष्ठ में बंद है, जबकि नीचे वाली आयत में ऐसा कुछ नहीं है। सिक्के के दूसरी ओर एक अजीब सी प्रतीकात्मक आकृति व ब्राह्मी लिपि के कुछ अक्षर “ग” व “ह” जैसे मिलते-जुलते देखे गए हैं।

2. सिक्के की धातु = चांदी
आकार = गोलाकार।
व्यास = 2.00 से. मी.
मोटाई = 0.09 से. मी.
भार = 3.800 ग्राम।
काल = छठी से 13वीं शताब्दी।
लिपि = ब्राह्मी।
सिक्का संग्रहकर्ता = कमल के. प्यासा, परुथी संग्रहालय, मंडी।
सिक्का प्राप्ति स्थान = मंडी, बाजार की खरीद।

सिक्के का विवरण = इस सिक्के का विवरण ऊपर क्रम 1 के सिक्के जैसा ही है और इस प्रकार के और भी बहुत से सिक्के मिले हैं, जिनके केवल व्यास व भार में ही अंतर देखा गया है, शेष बनावट समान है। शेष इन चार सिक्कों का भार क्रमशः दो का 3.800 ग्राम, एक 3.00 ग्राम का व एक अन्य का 3.300 ग्राम देखा गया है।

3. सिक्के की धातु = चांदी
आकार = गोलाकार।
व्यास = 1.95 से. मी.
मोटाई = 0.09 से. मी.
भार = कुल आठ सिक्के, जिनमें 3.800 ग्राम के दो, 3.950 ग्राम के दो, 3.995 ग्राम का एक, 3.400 ग्राम का एक, 3.900 ग्राम का एक सिक्का व 3.300 ग्राम भार का भी एक ही सिक्का देखा गया है। इस तरह से ये कुल आठ बनते हैं।
काल = छठी से तेरहवीं शताब्दी।
लिपि = ब्राह्मी।
संग्रहकर्ता = कमल के. प्यासा, परुथी संग्रहालय, मंडी।
प्राप्ति स्थान = मंडी, बाजार की खरीद।

सिक्कों का विवरण = 3.800 ग्राम वाले चार सिक्कों में आयत कोष्ठों में स्पष्ट हैं, जबकि नीचे वाली आयतें स्पष्ट नहीं हैं, कटी हुई हैं। इसी प्रकार से 3.800 ग्राम के तीन सिक्कों में दोनों प्रकार की आयतें बिल्कुल स्पष्ट हैं। शेष में से चार सिक्कों की दोनों आयतें दिखती हैं और बाकी के चार सिक्कों में एक ही आयत दिखाई देती है, शेष सभी कटी हैं। सिक्कों के दूसरी ओर सब कुछ अन्य पूर्व वर्णित सिक्कों जैसा ही है।

4. सिक्के की धातु = चांदी
आकार = गोलाकार।
व्यास = 1.5 से. मी.
मोटाई = 0.09 से. मी.
भार = इन सात सिक्कों का भार इस प्रकार से है: 3 सिक्के 3.800 ग्राम के, 2 सिक्के 3.900 ग्राम के व 2 सिक्के 3.700 ग्राम के देखे गए हैं।
काल = छठी से तेरहवीं शताब्दी।
लिपि = ब्राह्मी।
संग्रहकर्ता = कमल के. प्यासा, परुथी संग्रहालय, मंडी।
प्राप्ति स्थान = मंडी, बाजार की खरीद।

सिक्कों का विवरण = प्राप्त 3.900 ग्राम वाले दो सिक्कों में केवल ऊपर की कोष्ठों वाली आयत देखने को मिलती है और नीचे वाली नहीं मिलती। एक 3.800 ग्राम वाले सिक्के में दोनों आयतें देखी जा सकती हैं, एक में केवल एक कोष्ठ वाली ही आयत मिलती है, दूसरी नहीं। शेष 3.700 ग्राम के दोनों सिक्कों में दोनों प्रकार की आयतें देखी जा सकती हैं। सिक्कों के दूसरी ओर सभी में वही पूर्व वर्णित सिक्कों जैसी ही बनावट मिलती है। प्राप्त सभी गाधिया सिक्कों की चांदी इतनी शुद्ध प्रतीत नहीं होती।

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