हिमाचल में सुरक्षित फीकल स्लज प्रबंधन की शुरुआत

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ग्रामीण विकास विभाग के प्रवक्ता ने बताया कि हिमाचल प्रदेश, खुले में शौचमुक्त (ODF) बनने के बाद अब ग्रामीण स्वच्छता के अगले चरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में फीकल स्लज (मलीय कचरे) के वैज्ञानिक एवं सुरक्षित प्रबंधन की एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की गई है। इस योजना के तहत ग्रामीण विकास विभाग और जल शक्ति विभाग संयुक्त रूप से चिन्हित सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (STPs) में फीकल स्लज के को-ट्रीटमेंट की व्यवस्था विकसित कर रहे हैं, जिससे लगभग 7,000 गांवों को लाभ प्राप्त होगा।

प्रवक्ता ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश घरों में शौचालय अपशिष्ट के लिए सेप्टिक टैंक या सिंगल पिट का उपयोग किया जाता है। समय के साथ इनमें मल एवं कीचड़ जमा होकर फीकल स्लज का रूप ले लेता है। नियमित सफाई और सुरक्षित निस्तारण के अभाव में यह अपशिष्ट अक्सर खुले में, नालों, खड्डों, नदियों या जंगलों में डाल दिया जाता है, जिससे जल स्रोत प्रदूषित होते हैं और डायरिया, हैजा एवं टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।

इस समस्या के समाधान के लिए राज्य में फीकल स्लज मैनेजमेंट को ग्रामीण स्वच्छता की अगली महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में लागू किया जा रहा है। इसका उद्देश्य सेप्टिक टैंकों से निकले अपशिष्ट का सुरक्षित संग्रह, परिवहन, उपचार और वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करना है।

उन्होंने बताया कि हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी भूगोल, सीमित भूमि उपलब्धता तथा उच्च संचालन लागत को देखते हुए अलग-अलग फीकल स्लज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करना व्यावहारिक नहीं है। इसी कारण लिक्विड वेस्ट मैनेजमेंट में तकनीकी सहयोग प्रदान कर रहे वाश इंस्टीट्यूट के सुझावों के आधार पर मौजूदा सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट्स में को-ट्रीटमेंट मॉडल अपनाया जा रहा है, जिसे एक किफायती, व्यावहारिक एवं टिकाऊ समाधान माना गया है।

इस मॉडल के तहत अलग से नए संयंत्र स्थापित करने के बजाय मौजूदा एसटीपी में आवश्यक अवसंरचना विकसित की जा रही है, जहां सेप्टिक टैंकों से निकाले गए फीकल स्लज को सीवेज के साथ मिलाकर वैज्ञानिक प्रक्रिया के तहत उपचारित किया जाएगा। इससे न केवल नई इकाइयों की आवश्यकता समाप्त होगी, बल्कि लागत में भी उल्लेखनीय कमी आएगी और मौजूदा संसाधनों का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित होगा।

प्रवक्ता ने बताया कि परियोजनाओं की तकनीकी समीक्षा एवं स्वीकृति हेतु ग्रामीण विकास विभाग के सचिव की अध्यक्षता में राज्य स्तरीय स्वीकृति समिति (SLAC) का गठन किया गया है। समिति द्वारा एसटीपी की क्षमता, फीकल स्लज की अनुमानित मात्रा, लागत एवं अन्य तकनीकी पहलुओं के मूल्यांकन के बाद अब तक प्रदेश में 30 को-ट्रीटमेंट परियोजनाओं को मंजूरी प्रदान की जा चुकी है।

इन परियोजनाओं के क्रियान्वयन के लिए ग्रामीण विकास विभाग द्वारा जल शक्ति विभाग को लगभग 15 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। इस संबंध में दोनों विभागों के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) भी हस्ताक्षरित किया गया है। स्वीकृत परियोजनाओं में पालमपुर एवं सुंदरनगर स्थित एसटीपी में को-ट्रीटमेंट कार्य प्रारंभ हो चुका है, जिससे आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों को प्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है।

प्रवक्ता ने बताया कि वर्ष 31 मार्च, 2027 तक सभी स्वीकृत एसटीपी में को-ट्रीटमेंट सुविधा स्थापित करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके पूर्ण होने पर प्रदेश के हजारों गांवों में सेप्टिक टैंकों से निकलने वाले मलीय कचरे का सुरक्षित एवं वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित होगा, जिससे जल स्रोतों की सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण, जनस्वास्थ्य में सुधार तथा ग्रामीण स्वच्छता को नई मजबूती मिलेगी।

उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश ने ओडीएफ (Open Defecation Free) का लक्ष्य प्राप्त कर एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। अब राज्य का अगला लक्ष्य ‘सुरक्षित फीकल स्लज प्रबंधन युक्त हिमाचल’ बनाना है, ताकि स्वच्छता के साथ-साथ पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की दीर्घकालिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

‘Vasudhaiva Kutumbakam’ Guides Humanity: Governor

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