काल भैरव की उत्पत्ति और काल अष्टमी का महत्व

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डॉ. कमल के. प्यासा – मण्डी

शिव पुराण एवं स्कंद पुराण में एक कथा आती है, जिसमें काल भैरव की उत्पत्ति का वर्णन मिलता है। कहा जाता है कि एक बार सृष्टि के निर्माता देव ब्रह्मा, पालक देव विष्णु और संहारक देव महेश के बीच विवाद होने लगा। तीनों स्वयं को एक-दूसरे से श्रेष्ठ सिद्ध करने लगे। जबकि शिव पुराण के अनुसार, देव सदाशिव एवं आदि शक्ति (जो सदाशिव द्वारा प्रकट की गई थीं) से ही इन तीनों देवों की उत्पत्ति हुई थी। इसी प्रकार का मिलता-जुलता विवरण ब्रह्मवैवर्त पुराण में भी मिलता है। इसके साथ ही इन तीनों देवों के अवतरण में मुख्य भूमिका भगवान श्रीकृष्ण की ही बताई गई है। भगवान विष्णु, ब्रह्मा से यह भी स्पष्ट करते हैं कि वे उनकी नाभि से ही प्रकट हुए हैं, इसलिए वही उनके जन्मदाता हैं।

इस प्रकार तीनों देवों के बीच मतभेद बढ़ता गया। अंततः इस विवाद को समाप्त करने के लिए देवलोक के सभी ऋषि-मुनि और देवता एकत्र हुए। विचार-विमर्श के बाद उन्होंने भगवान शिव को सर्वोच्च बताते हुए अपना निर्णय सुनाया। देवताओं के इस निर्णय को सभी ने स्वीकार कर लिया, लेकिन देव ब्रह्मा इससे सहमत नहीं हुए। वे भगवान शिव पर क्रोधित हो उठे और उन्हें अपशब्द कहने लगे। इस पर भगवान शिव भी रौद्र रूप धारण कर काल भैरव (जिन्हें कालेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है) के रूप में प्रकट हुए और ब्रह्मा के पाँच सिरों में से एक सिर काट दिया।

भगवान शिव के इस उग्र स्वरूप को देखकर सभी देवता एवं ऋषि-मुनि भयभीत हो गए। जिस दिन भगवान शिव ने यह रौद्र रूप धारण किया, वह मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। इसी कारण इस तिथि को कालाष्टमी कहा जाता है। आगे चलकर ब्रह्महत्या के दोष के कारण भगवान शिव को काल भैरव रूप में अनेक तीर्थों का भ्रमण करना पड़ा। बाद में देव ब्रह्मा ने अपनी भूल स्वीकार कर उनसे क्षमा माँगी। अंततः भगवान शिव अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर वाराणसी में जन-रक्षक के रूप में स्थापित हुए। आज भी काशी में काल भैरव को काशी के कोतवाल के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु काशी जाता है, वह पहले काशी विश्वनाथ के दर्शन करता है और उसके बाद काल भैरव मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना करता है।

प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालाष्टमी कहा जाता है। मान्यता है कि इसी दिन काल भैरव प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन उनका व्रत रखा जाता है तथा विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। नारद पुराण के अनुसार, काल भैरव की आराधना करने से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते हैं, पुराने से पुराने रोगों से मुक्ति मिलती है तथा सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

काल अष्टमी की पूजा के लिए प्रातः स्नान आदि करके भगवान शिव, माता पार्वती तथा काल भैरव का चित्र या प्रतिमा स्थापित की जाती है। गंगाजल का छिड़काव कर गुलाब के पुष्प एवं हार अर्पित किए जाते हैं। कुमकुम और हल्दी से तिलक लगाकर गुग्गुल की धूप जलाई जाती है तथा शिव चालीसा एवं भैरव चालीसा का पाठ किया जाता है। भोग में कच्चा दूध, कुछ स्थानों पर मदिरा, हलवा-पूरी, जलेबी अथवा पाँच प्रकार की मिठाइयाँ अर्पित की जाती हैं। पूजा के दौरान “ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः” मंत्र का जाप किया जाता है।

व्रत के पश्चात काले कुत्ते को मीठी रोटी खिलाई जाती है तथा कच्चा दूध पिलाया जाता है। अर्धरात्रि में भी काल भैरव का पूजन धूप, उड़द की दाल, काले तिल तथा सरसों के तेल से किया जाता है। इस अवसर पर दान-पुण्य तथा भजन-कीर्तन का भी विशेष महत्व माना गया है।

काल भैरव के प्रमुख मंत्र इस प्रकार हैं—

  • ॐ काल भैरवाय नमः।
  • ॐ उन्मत्त भैरवाय नमः।

दान का भी इस दिन विशेष महत्व है। इस अवसर पर कच्चा दूध, काले तिल, वस्त्र, कंबल, सरसों का तेल, घी, कांसे के बर्तन, जूते तथा तले हुए पकवान आदि का दान शुभ माना जाता है। साथ ही कुत्तों को मीठी रोटी तथा गाय को भोजन और रोटी खिलाने का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है।

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