मां शक्ति का नवरात्र पूजन (आश्विन मास के शारदीय नवरात्रे) – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – मण्डी

मां शक्ति के नवरात्र पूजन चार प्रकार के नवरात्रों के रूप में किया जाता है। इन चार प्रकार के नवरात्रों में शामिल हैं, 1 चैत्र मास के नवरात्रे जो कि नव हिंदू वर्ष के साथ शुरू होते हैं। दूसरे पर आ जाते हैं आश्विन मास के नवरात्रे जो कि शारदीय नवरात्रों के नाम से भी जाने जाते हैं और अपना विशेष महत्व रखते हैं। तीसरे क्रम पर आने वाले नवरात्रे आषाढ़ मास में आते हैं और चौथे नवरात्रों जो कि पौष मास में आते हैं, को गुप्त नवरात्रों के नाम से भी जाना जाता हैं और इनको तंत्र साधना वाले लोगों द्वारा ही विशेष रूप से साध्य किया जाता है। इस तरह से आम लोगों द्वारा पहली तरह के व शारदीय नवरात्रों को ही मनाते देखा जाता है। इन दोनों नवरात्रों में देवी के नव रूपों की विधिवत रूप से नौ दिनों (हर दिन देवी के एक विशेष रूप की) तक पूजा की जाती है।

एक पौराणिक कथा के अनुसार बताया जाता है कि महिषासुर नामक दैत्य को देवताओं से अजय होने का वरदान प्राप्त हो गया था, जिससे सभी देवी देवता उससे डर डर कर रहते थे। दैत्य महिषासुर ने देवताओं की कमजोरी व अपने वरदान का अनाधिकृत लाभ उठाते हुए, उसने अपने नर्क से प्रसार करके स्वर्ग के द्वार तक जा पहुंचा था और फिर उसने इन्द्र, सूर्य, अग्नि, वायु, चंद्रमा, यम व वरुण आदि से सब कुछ छीन कर समस्त स्वर्ग का खुद मालिक बन गया था। इस पर सभी देवता दुखी होकर पृथ्वी पर इधर उधर भटकने लगे थे। भटकते भटकते फिर सभी इस मुसीबत से छुटकारा पाने के लिए भगवान शिव व विष्णु के शरण में जा पहुंचे और अपनी व्यथा उन्हें कह सुनाई। इसके पश्चात सभी देवी देवताओं ने मिल कर मां शक्ति के रूप में देवी दुर्गा को प्रकट करके तथा उन्हें (अपने अपने सभी तरह के) अस्त्र दे कर दैत्य महिषासुर के विरुद्ध जाने की प्रार्थना की। जिस पर मां दुर्गा ने अपने शरीर के अंश से 9 देवी के रूप प्रगट करके लगातार 9 दिन तक महिषासुर दैत्य से युद्ध करती रही और दसवें दिन उसका वध करके, महिषासुर मर्दनी के नाम से जानी जाने लगी और तभी से नवरात्त्रि के 10 वें दिन को विजय दशमी के रूप में इसे खुशी से मनाया जाने लगा है।

शारदीय नवरात्रे जो कि हर वर्ष आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को शुरू होते हैं और 10 दिन तक चलते हैं और हर दिन देवी के अलग अलग रूप की विधिवत रूप से पूजा अर्चना की जाती है (9दिन तक देवी के अलग अलग रूपों को पूजा जाता है)। पहले से नौवें दिन तक पूजी जाने वाले देवी के रूपों में शामिल है निम्नलिखित देवी के नौ रूप

  1. शैलपुत्री – मां दुर्गा का अवतार व हिमालया की पुत्री, द्विभुजाधारी एक हाथ में त्रिशूल व दूजे में कमल फूल लिए अपने वाहन वृषभ पर, पीले वस्त्र धारण किए इन्हें देखा जा सकता है। इनकी पूजा में सफेद फूल तथा गाय का दूध व खीर का भोग लगता है और पीले वस्त्रों के साथ ही इनकी पूजा की जाती है। क्योंकि पीला रंग उत्साह,चमक व प्रसन्नता का प्रतीक माना जाता है।
  2. देवी ब्रह्मचारणी की पूजा अर्चना दूसरे नवरात्रे को की जाती है। इस देवी के एक हाथ में कमंडल व दूसरे हाथ में माला लिए देखा जा सकता है और इनकी पूजा हरे रंग के वस्त्र धारण करके ही करते हैं। क्योंकि हरे रंग को सद्भावना, विकास तथा ऊर्जा का प्रतीक माना गया है। इस तरह से देवी ब्रह्मचारणी की उपासना से सदाचार व संयम की प्राप्ति होती है।
  3. तीसरे नवरात्रे को देवी चंद्र घंटा की पूजा की जाती है जो कि ब्रह्मा, विष्णु व महेश की शक्ति भी कहलाती है। दस भुजाधारी इस देवी की पूजा अर्चना के लिए भूरे रंग के वस्त्रों को धारण करने को उचित समझा जाता है। इस तरह से देवी की पूजा अर्चना करने से नाकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं और देवी का आशीर्वाद प्राप्त होता है। देवी को दूध व मिठाई का भोग लगाया जाता है।

4.चौथे नवरात्रे में देवी कुष्मांडा की पूजा की जाती है। अष्ट भुजाधारी इस देवी को ब्रह्मांड की निर्माता कहा जाता है।देवी       अपने भक्तों के सभी प्रकार के दुखों का निवारण भी करती है तथा लौकिक और पारलौकिक शक्तियों को भी प्रदान        करती है। इसकी पूजा के लिए नारंगी वस्त्रों का प्रयोग उचित बताया गया है। क्योंकि नारंगी रंग प्रसन्नता को दर्शाता है।

  1. पांचवें नवरात्रे को देवी माता स्कंद की पूजा की जाती है। कमलासन पर आसीन चतुर्भुजा देवी स्कंद माता का वाहन सिंह है और इनकी पूजा सफेद वस्त्र धारण करके करने का प्रवधान है, क्योंकि सफेद रंग शांति, पवित्रता और मित्रता का प्रतीक होता है। भोग मे केले के फल को उचित बताया गया है। स्कंद माता की पूजा अर्चना से समृद्धि प्राप्त होती है।
  2. देवी कात्यायनी की पूजा छठे नवरात्रे को की जाती है। इनका जन्म (देवी कात्यायनी) ऋषि कात्यायन के यहां, (ऋषि की उपासना के फलस्वरूप) बेटी के रूप में जन्म हुआ था। चतुर्भुजा इस देवी की उपासना से आलौकिक तेज व शक्ति का वरदान प्राप्त होता है और साथ में सभी प्रकार के डर भी दूर हो जाते हैं और उत्साह की प्राप्ति होती है। देवी की पूजा लाल वस्त्र धारण करके की जाती है तथा भोग के रूप में शहद लगाया (अर्पित किया) जाता है। पूजा में लाल रंग के वस्त्र इसलिए पहने जाते हैं, क्योंकि लाल रंग क्रांति, क्रियाशीलता, उत्साह व वीरता का प्रतीक माना गया है।
  3. काल रात्रि की उपासना सातवें नवराते को की जाती है। इस देवी के शरीर का रंग नीला देखने को मिलता है। चतुर्भुजा इस देवी की पूजा करने से दुश्मनों पर विजय प्राप्त होती है, दुखों का निवारण होता है और आर्थिक स्थिति मजबूत होती है व भय दूर होता है। इसी देवी द्वारा रक्त बीज का भी संहार किया गया था। देवी की पूजा के लिए नीले वस्त्रों का प्रयोग उत्तम बताया गया है। क्योंकि नीला रंग शांति और निडरता का प्रतीक बताया गया है।
  4. देवी माह गौरी, चतुर्भुजा इस देवी की उपासना आठवें नवरात्रे को की जाती है। इस देवी का शरीर जब भगवान शिव की तपस्या करने से काला हो गया था तो उसी समय भगवान शिव ने प्रसन्न हो कर देवी को गौर वर्ण प्रदान कर दिया था। वृषभ वाहन वाली इस देवी की पूजा अर्चना के लिए गुलाबी रंग के वस्त्रों को उचित बताया गया है। क्योंकि गुलाबी रंग में सौम्यता रहती है।
  5. देवी सिद्धि दात्री की उपासना नवें नवरात्रे को की जाती है। चतुर्भुजा व कमलासन पर विराजमान इस देवी की पूजा के लिए बैगनी रंग के वस्त्रों का प्रयोग बताया गया है। बैंगनी रंग उत्साह और प्रेरणा का प्रतीक माना गया है, इसलिए देवी सिद्धिदात्री के पूजन में बैंगनी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता है ।

मां दुर्गा के कात्यायनी रूप ने ही महिषासुर का वध किया था, जिसके कारण ही देवी का नाम महिषासुर मर्दनी के नाम से प्रसिद्ध हो गया था। इस प्रकार दसवें दिन ही महिषासुर के वध के पश्चात देवी मां दुर्गा को जल में प्रवाहित करके नवरात्रों का समापन हो जाता है।

महान वास्तु व शिल्पकार: भगवान विश्वकर्मा – डॉ. कमल के. प्यासा

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