महान स्वतंत्रता सेनानी लौह पुरुष : सरदार वल्लभ भाई पटेल – डॉ. कमल के.प्यासा

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डॉ. कमल के.प्यासा – जीरकपुर, मोहाली

पटेल, गुजराती का एक उपनाम है। इस उपनाम का प्रयोग कृषकों, व्यवसायियों और व्यापारियों के लिए होता रहा है। पूर्व (मध्यकालीन भारत) में इस उपनाम का चलन ग्राम के मुखिया के लिए किया जाता था, बाद में जमींदारों के लिए भी किया जाने लगा था। पटेल गुजरात में कोली समुदाय के लोगों को भी कहा जाता है, जो कि पेशे से गांव के बड़े जमींदार होते हैं। यही कारण है कि पटेलों में हिंदुओं के साथ साथ मुस्लिम पटेल भी मिलते हैं।

कुछ भी हो सरदार वल्लभ भाई पटेल का पूरा नाम वल्लभ भाई झावेर भाई पटेल था। इनका जन्म (पाटीदरों से संबंधित मध्य गुजरात के लेवा पटेल समुदाय से) माता लाडवा बाई और पिता झावेर भाई पटेल के यहां 31 नवंबर, 1875 को वाडियाड, गुजरात में हुआ था।

सामान्य किसान परिवार में जन्म लेने के कारण ही इनकी प्रारंभिक शिक्षा नाडियाल, पेटलाड और बरसाद में ही हुई थी। वल्लभ भाई पटेल का विवाह, वर्ष 1891में झावेर बेन पटेल नामक लड़की से 16 वर्ष की आयु में करा दिया गया था। जिससे वर्ष 1903 में इनके यहां मणि पटेल नामक बेटी का जन्म हुआ और दहया पटेल नामक बेटे का जन्म वर्ष 1905 में हुआ था। मैट्रिक इनके द्वारा 22 वर्ष की उम्र में की गई। क्योंकि वल्लभ भाई पटेल को पढ़ाई में बहुत रुचि थी और वकालत करना चाहते थे। अपनी पढ़ाई में वकालत के लिए विदेश जाने के लिए बहुत ही उत्सक थे और इसी लिए बाहर जाने के लिए पैसे जोड़ने लगे थे। पढ़ाई की पुरानी पुस्तकें अपने मित्रों से ले कर, आखिर बैरिस्टरी के लिए 36 वर्ष की आयु में इंग्लैंड पहुंच ही गए और शीघ्र ही दो वर्षों में मिडल टेंपल इंग्लैंड से वकालत की पढ़ाई पूरी करके वापिस भारत लौट आए। आने के बाद अपनी वकालत अहमदाबाद में शुरू कर दी, जिसमें सरदार वल्लभ भाई पटेल खूब सफल रहे।

वर्ष 1918 में खेड़ा के किसानों की फसलों को जब भारी नुकसान पहुंचा था तो सरकार से कर मुक्ति के लिए सत्याग्रह की शुरुआत वल्लभ भाई पटेल द्वारा ही की गई। तभी इन्हें जनता व किसानों को उकसाने का इन पर इल्जाम लगा कर, गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में तीन मास के पश्चात इन्हें छोड़ा गया। वर्ष 1920 में गांधी जी के साथ असहयोग आंदोलन में अपनी वकालत को छोड़ कर पूरी तरह से विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने में लग गए।

वर्ष 1922, 1924 और 1927 में, जिस समय अहमदाबाद नगर पालिका के अध्यक्ष थे तो, इनके द्वारा पाठशालाओं में कई तरह के सुधारात्मक कार्य किए गए। पाठशाला में पढ़ाने वाले शिक्षकों की दयनीय स्थिति पर विचार किया गया, वेतनों में वृद्धि के साथ ही साथ उन्हें पूरी मान्यता भी प्रदान की गई। हिंदू मुस्लिम मुद्दों पर विचार करते हुए उनमें कई तरह के सुधार और भाई चारे को बढ़ावा दिया गया। ऐसे ही वर्ष 1923 में जिस समय महात्मा गांधी जी जेल में बंद थे और नागपुर में ध्वज फहराने पर प्रतिबंध लगा था तो उस समय सत्याग्रह के लिए सभी कार्यकर्ताओं को संगठित करके अंग्रेजों के विरुद्ध, विरोध प्रकट करने के लिए सरदार पटेल ही आगे आए थे। वर्ष 1927 में आयी बाढ़ की राहत हेतु शरणार्थी केंद्र भी पटेल द्वारा स्थापित किए गए, उनके लिए भोजन व स्वास्थ्य सेवाओं का दवाओं सहित प्रबंध किया गया। वर्ष 1939 में, गुजरात में पड़े सूखे व अकाल के समय सरकारी करों के विरोध में , व स्वयं सेवकों के साथ शिवरों में सेवा करते समय जब सरदार वल्लभ भाई पटेल को गिरफ्तार किया गया तो स्वयं सेवकों का संघर्ष ओर तेज हो गया। अगस्त माह में संघर्ष चरम सीमा पर जा पहुंचा और आखिर राष्ट्रीय कांग्रेस की जीत हुई। यहीं पर बारडोली की महिलाओं द्वारा वल्लभ भाई पटेल को सरदार के रूप में संदर्भित किया गया था।

मार्च 1930 में महात्मा गांधी की दांडी यात्रा के समय वल्लभ भाई पटेल को रास गांव से गिरफ्तार कर लिया गया। ऐसे ही बम्बई में एक जलूस के नेतृत्व में भी पटेल को, फिर गिरफ्तार कर लिया गया था। कांग्रेस के वर्ष 1931के सत्र के लिए में (गांधी इरविन समझौते के पश्चात) पटेल को 46वें अधिवेशन केअध्यक्ष पद के लिए चुन लिया गया। वर्ष 1932 में लंदन की गोल मेज कॉन्फ्रेंस की विफलता के पश्चात महात्मा गांधी व पटेल, दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। महात्मा गांधी व सरदार पटेल की इकट्ठी गिरफ्तारी से दोनों की दोस्ती गहरी हो गई और इसी बीच महात्मा जी द्वारा, सरदार पटेल को संस्कृत का ज्ञान भी दिया गया। 22 अक्टूबर, 1933 को जिस समय पटेल के बड़े भाई, विट्ठल भाई पटेल का देहांत हुआ तो, अंग्रेजों द्वारा इनको संक्षिप्त रिहाई पर जाने को कह गया, लेकिन पटेल ने अंग्रेजों के एहसान को ठुकरा दिया और जेल में ही रहे। जुलाई 1934 में पटेल जेल से रिहा हो गए। इसके पश्चात 1934 में ही दिल्ली के विधान सभा के चुनाव व 1936 में प्रांतीय चुनाव के लिए, (उम्मीदवारों के चयन  व वित्तपोषण में) पटेल जी की विशेष भूमिका रही। वर्ष 1935 में जब प्लेग महामारी फैली हुई थी तो भी पटेल जी की भूमिका सराहनीय देखी गई, इतना ही नहीं बल्कि अपने प्लेग ग्रसित एक मित्र के लिए तो खुद भी प्लेग के शिकार हो गए थे और फिर भी जन सेवा में डटे रहे।

वर्ष 1938 में जिस समय कांग्रेस अध्यक्ष सुभाष चंद्र बोस ने, गांधी जी के अहिंसक प्रतिरोध के सिद्धांतों से दूर जाने के प्रयास का, विरोध किया तो इसके लिया सरदार पटेल को ही कई एक आलोचनाओं का सामना करना पड़ गया। जब कि पटेल सब को जोड़ने के प्रयास में थे।

वर्ष 1940 में महात्मा गांधी द्वारा किए जाने वाले अवज्ञा आंदोलन में सरदार पटेल के भाग लेने पर उन्हें फिर से गिरफ्तार करके 9 माह की सजा दी गई। इसके पश्चात एक बार फिर 7अगस्त, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय बंबई के मोवालिया टैंक में लाखों की संख्या में एकत्रित लोगों को इन्होंने संबोधित्व किया, जिससे लोग बहुत प्रभावित हुए लेकिन इन्हें फिर से 9 अगस्त को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया और इन्हें अहमदाबाद किले में रखा गया, जिसमें इनके साथ पंडित जवाहर लाल व अन्य नेता भी शामिल थे। इस कैद में इन्हें सबसे अधिक 3 साल की सजा भुगतनी पड़ी थी और 15 जून, 1945 को छूट पाए थे। 15 अगस्त 1947 में विभाजन के समय भी पटेल अपनी निस्वार्थ सेवाएं पाकिस्तान से भारत पहुंचे शरणार्थियों को देते रहे और हिन्दू मुस्लिम सौहार्द में सबसे आगे रहे।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात सरदार वल्लभ भाई पटेल भारत के प्रथम उप प्रधानमंत्री बने और इनके अधीन गृहमंत्रालय, राज्यमंत्रालय व सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय थे। सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कार्यभार संभालते ही सबसे पहले समस्त 560 भारतीय रियासतों एकीकरण करने का प्रयास किया जिसमें केवल हैदराबाद व जूनागढ़ को छोड़ कर सभी एकीकृत होने के लिए सहमत हो गई। हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी रियासत बिलासपुर भी सबसे बाद में शामिल हुईं थी। खैर अंत में पटेल जी के अथक प्रयासों से हैदराबाद और जूनागढ़ भी राह पर आ गए। इन्हीं सफल प्रयासों के फलस्वरूप ही सरदार वल्लभ भाई पटेल को लौह पुरुष कहा जाने लगा था। सरदार पटेल द्वारा ही भारतीय प्रशासनिक सेवाओं व भारतीय पुलिस सेवाओं की स्थापना में विशेष भूमिका बताई जाती है। इसी तरह से गुजरात के सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्वार में भी पटेल जी की भूमिका को नाकारा नहीं जा सकता।

सरदार वल्लभ भाई पटेल के अपने विवेक, सूझ बूझ और सुलझे व्यक्तित्व के कारण ही उनका योगदान देश के स्वतंत्रता संग्राम के साथ ही साथ देश को एकीकृत करने में जो रहा, उसे नहीं भुलाया जा सकता। तभी तो वर्ष 1948 में नागपुर विश्वविद्यालय, इलाहाबाद विश्विद्यालय, बनारस विश्वविद्यालय व 1949 में उस्मानिया विश्वविद्यालय तथा पंजाब विश्वविद्यालय द्वारा इन्हें डॉक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया था। भारत सरकार द्वारा वर्ष 1991 में इन्हें भारत रत्न से सम्मानित करके इनके सम्मान में 5बार अर्थात 1965, 1975, 1997, 2008 व 2016 में डाक तार विभाग द्वारा टिकट भी जारी किए हैं।

भारत सरकार द्वारा ही वर्ष 2014 में इनके जन्म दिन, (31 नवंबर) को राष्ट्रीय एकता दिवस घोषित किया है। ऐसे ही इनकी याद को हमेशा हमेशा बनाए रखने के लिए 31 अक्टूबर, 2018 को इनकी 143 वीं जयंती के अवसर पर स्टैचू ऑफ यूनिटी प्रतिमा की स्थापना गुजरात के कावड़िया के समीप नर्मदा नदी के तट पर की गई है, सरदार वल्लभ भाई पटेल की यह प्रतिमा विश्व की सबसे ऊंची प्रतिमा है, जिसकी ऊंचाई 182 मीटर है।

स्वतंत्रता सेनानी, लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल, आखिर दिल के दौरे के कारण 15 दिसंबर, 1950 को बंबई के बिरला हाउस से हमें छोड़ कर दूर बहुत दूर चले गए।

ऐसी पुण्य व महान आत्मा को हम सभी का शत शत नमन।

महान बलिदानी धर्म रक्षक गुरु तेग बहादुर साहिब – डॉ. कमल के. प्यासा

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