March 11, 2026

नशा तस्करों के खिलाफ जिला प्रशासन की बड़ी पहल

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चिट्टा तस्करों और गंभीर अपराधों में दोषियों को समयबद्ध सजा दिलाने की दिशा में जिला प्रशासन शिमला ने एक अहम पहल करते हुए एनडीपीएस एक्ट 1985, एससी/एसटी एक्ट 1989 और पॉक्सो एक्ट 2012 पर आधारित एक दिवसीय विशेष कार्यशाला का आयोजन होटल होलीडे होम में किया। यह जिला स्तर पर अपनी तरह की पहली समावेशी कार्यशाला रही, जिसमें सभी संबंधित विभागों ने एक मंच पर मंथन किया।

इस विशेष सत्र में जिला के सभी एसडीएम, डीएसपी, जिला न्यायवादी, अभियोजन अधिकारी, सहायक न्यायवादी, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी और सभी थाना प्रभारी (एसएचओ) उपस्थित रहे। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य चिट्टा तस्करों और गंभीर अपराधों में संलिप्त आरोपियों को न्यूनतम समय में सजा दिलाने के लिए ठोस और प्रभावी रणनीति तैयार करना रहा।

उपायुक्त शिमला अनुपम कश्यप ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि लोगों को न्याय दिलवाना प्रशासन की सर्वोच्च प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि देवभूमि हिमाचल में यदि पीड़ितों को समय पर इंसाफ नहीं मिल पा रहा है, तो यह हमारी कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब मामलों में दोषमुक्ति की दर अधिक होती है, तो अपराधियों में कानून का डर खत्म हो जाता है और अपराध दोहराए जाते हैं। ऐसे में कानून का भय बनाए रखना बेहद आवश्यक है।

उपायुक्त ने जांच प्रक्रिया को मजबूत बनाने पर जोर देते हुए कहा कि जब तक मामलों की नींव मजबूत नहीं होगी, तब तक अदालत में केस टिक नहीं पाएगा। इस कार्यशाला का उद्देश्य सभी हितधारकों—पुलिस, अभियोजन, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय विभाग—को एकजुट कर सही दिशा में कार्य सुनिश्चित करना है, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक संजीव कुमार गांधी ने कहा कि एनडीपीएस, एससी/एसटी और पॉक्सो मामलों में अदालतों में दोषमुक्ति की ऊंची दर चिंता का विषय है। उन्होंने जांच अधिकारियों से निष्पक्ष, स्वतंत्र और तथ्यों पर आधारित जांच करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जांच अधिकारी को पहले से किसी निष्कर्ष पर पहुंचे बिना, तथ्यों की सच्चाई के आधार पर जांच करनी चाहिए, ताकि कोर्ट में चालान मजबूत हो और दोष सिद्ध हो सके।

जिला न्यायवादी सुधीर शर्मा ने आंकड़े प्रस्तुत करते हुए बताया कि एनडीपीएस एक्ट के तहत पिछले पांच वर्षों में दोषसिद्धि दर मात्र 26 प्रतिशत रही है, जबकि पॉक्सो एक्ट के मामलों में 2021 से 2025 तक औसतन 35 प्रतिशत दोषसिद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि आंकड़े यह दर्शाते हैं कि जांच और अभियोजन प्रक्रिया में सुधार की तत्काल आवश्यकता है।

कार्यशाला के दौरान एएसपी मेहर पंवार ने पॉक्सो एक्ट के प्रावधानों पर विशेष व्याख्यान दिया। फॉरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. विवेक सहजपाल ने डीएनए प्रोफाइलिंग की भूमिका पर प्रकाश डाला, जबकि मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. यशवंत रांटा ने एमएलसी और पोस्टमार्टम से जुड़े अहम पहलुओं की जानकारी दी। आईजीएमसी के उप चिकित्सा अधीक्षक डॉ. प्रवीण एस. भाटिया ने चिट्टा के बढ़ते दुष्प्रभावों पर चिंता जताते हुए कहा कि नशे की चपेट में युवाओं के साथ-साथ युवतियां भी तेजी से आ रही हैं, जिससे सामाजिक और नैतिक संकट गहराता जा रहा है।

कार्यशाला के अंत में सभी विभागों ने भविष्य के लिए साझा रणनीति बनाकर मिलकर कार्य करने का संकल्प लिया, ताकि नशे और गंभीर अपराधों पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सके और पीड़ितों को समय पर न्याय मिल सके।

कसुम्पटी तहसील प्रस्ताव प्रदेश सरकार को भेजा

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