पान के पत्ते से बनी पहचान: महोबा की प्रेरक कहानी

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पान के पत्तों से बने मीठे पान का स्वाद तो आपने जरूर लिया होगा, लेकिन अब पान से चॉकलेट, माउथ फ्रेशनर, गुलकंद और लड्डू जैसे अनोखे उत्पाद भी लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। ये खास उत्पाद इन दिनों पीटरहॉफ होटल में आयोजित जीआई महोत्सव में उपलब्ध हैं, जो 29 मार्च तक चल रहा है।

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के महोबा जिले के मलकपुरा गांव के मयंकिता चौरसिया और उनके भाई चित्रांश चौरसिया ने पारंपरिक पान को आधुनिक उत्पादों में बदलकर एक नई पहचान दी है। वर्ष 2023 में उन्होंने ‘अच्युत्यम ऑर्गेनिक एंड हर्बल’ कंपनी की स्थापना की और ‘बीटलाईफ’ ब्रांड के तहत महोबा देशावरी पान से कई तरह के उत्पाद तैयार करने शुरू किए।

मयंकिता ने एमए इतिहास की पढ़ाई करने के बाद यूजीसी नेट उत्तीर्ण किया और पीएचडी में प्रवेश भी लिया, लेकिन उन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़कर उद्यमिता का रास्ता चुना। उनके इस निर्णय में परिवार का पूरा सहयोग मिला और उनके भाई ने भी इस काम में साथ देने का फैसला किया। पारिवारिक रूप से वे पहले से ही पान की खेती से जुड़े रहे हैं, और उनके पिता राज कुमार चौरसिया ने महोबा पान को जीआई टैग दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

वर्ष 2021 में महोबा देशावरी पान को जीआई टैग मिलने के बाद इस क्षेत्र को नई पहचान मिली। इसी से प्रेरित होकर मयंकिता और चित्रांश ने पान से चॉकलेट, शरबत, गुलकंद, पान बीड़ा, पान डेट्स और लड्डू जैसे उत्पाद बनाना शुरू किया। धीरे-धीरे इन उत्पादों की मांग बढ़ती गई और आज उनकी कंपनी 50 से अधिक लोगों को रोजगार दे रही है।

मयंकिता का कहना है कि उत्तर प्रदेश में इस तरह के उत्पाद बनाने वाली उनकी कंपनी पहली है। उनका लक्ष्य पान की खेती को 35 प्रतिशत से बढ़ाकर 80 प्रतिशत तक पहुंचाना है, ताकि क्षेत्र के लोगों की आजीविका को मजबूत किया जा सके। वे पान से स्किन केयर उत्पाद भी विकसित कर रही हैं, जिनका पेटेंट कार्य जारी है और जल्द ही उन्हें बाजार में उतारा जाएगा।

‘Betelyfe’ ब्रांड के तहत उनके उत्पाद सोशल मीडिया, खासकर इंस्टाग्राम के माध्यम से देश-विदेश तक पहुंच रहे हैं। जहां पान का पत्ता जल्दी खराब हो जाता है, वहीं इससे बनी चॉकलेट एक साल तक सुरक्षित रहती है, जिससे इसका बाजार और भी व्यापक हो रहा है।

मयंकिता को उनके इस नवाचार के लिए ‘राज्यपाल चल वैजयंती पुरस्कार’ से सम्मानित किया जा चुका है। उनका मानना है कि अपनी संस्कृति और परंपरा को सहेजते हुए आगे बढ़ना जरूरी है, और वे इसी सोच के साथ काम कर रही हैं। अब उनके साथ क्षेत्र के कई लोग जुड़ चुके हैं और यह पहल पूरे इलाके में बदलाव ला रही है।

महोबा का देशावरी पान केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि लगभग 1000 साल पुरानी ऐतिहासिक विरासत है, जिसकी शुरुआत चंदेल काल से मानी जाती है। वर्ष 2021 में इसे भारत सरकार द्वारा जीआई टैग प्रदान किया गया, जिससे इसकी विशिष्टता को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।

यह पान अपनी कुरकुरी बनावट और बिना रेशे के लिए जाना जाता है। इसका स्वाद हल्का मीठा होता है और यह मुंह में जाते ही घुल जाता है, जिससे इसे प्रीमियम श्रेणी का पान माना जाता है। इसकी खेती भी बेहद जटिल होती है, जिसे ‘बरेजा’ नामक विशेष संरचना में किया जाता है। यह संरचना बांस और घास-फूस से ढकी होती है, जो पत्तों को तेज धूप, लू और ठंड से बचाती है और उचित आर्द्रता बनाए रखती है।

आयुर्वेद के अनुसार महोबा पान पाचन में सहायक होता है, मुंह की दुर्गंध दूर करता है और शरीर के संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है। भारतीय संस्कृति में यह पान सम्मान और आतिथ्य का प्रतीक भी माना जाता है, जो इसे केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं बल्कि परंपरा और पहचान का हिस्सा बनाता है।

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