सायर या सैर – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – मण्डी

हमारे मेले, तीज और त्योहार आदि सभी हमारी संस्कृति के ही प्रतीक हैं। इन्हीं से हमें अपनी प्राचीन मान्यताओं, परंपराओं आदि की जानकारी के साथ ही साथ सामाजिक व्यवहार व परिस्थितियों का भी पता चलता है। तभी तो हम इन्हें अपनी सांस्कृतिक धरोहर भी कहते हैं।

देव भूमि होने के कारण ही हमारे यहां वर्ष भर ये तीज, त्योहार व मेले कहीं न कहीं चले ही रहते हैं। इतना ही नहीं इधर तो हर माह की प्रथम तिथि संक्रांति को, साजे या संग्रांदी के रूप में पवित्र मानते हुए मनाते हैं और इसी तरह से हमारे ये तीज त्योहार चलते ही रहते हैं। भादों मास जो कि काले महीने के नाम से जाना जाता है, में शुभ कार्य करने ठीक नहीं समझे जाते, क्योंकि इस मास सभी देवी देवता दूर प्रस्थान करके डाकनियों से लड़ाई करने निकल पड़ते हैं और फिर आश्विन माह की प्रथम तिथि को ही लौटते हैं जब काला महीना समाप्त हो जाता है। नव विवाहित बहुवें भी मायके से अपने ससुराल सायर के शुभ दिन को ही वापिस आती हैं और खुशी खुशी सायर के इस त्योहार को मानती हैं।

इस समय वर्षा ऋतु का अंत हो जाता है और सर्दी शुरू होने लगती है। खरीफ की फसल पक्क जाती हैऔर उसकी कटाई शुरू कर दी जाती है। इस तरह से अश्विन माह की संक्रांति को नई फसल के आने की खुशी में, इसे सायर या सैर त्योहार के रूप में मनाया जाता है। जिसमें नई फसल से प्राप्त सभी प्रकार की सब्जियों, फलों आदि के साथ साथ मक्की, धान की बालियां, पेठू की बेल, कचालू के पत्ते, खीरा, खट्टे प्रजाति के फल, अमरूद, तिल के पौधे की टहनी, कोठे का पौधा व अखरोट आदि पूजा के लिए रखे जाते हैं। इन सभी चीजों को एक दिन पहले ही खरीद लिया जाता है।

अगले दिन अर्थात सायर को इन सभी चीजों को एक छोटी सी चंगेर (छंगेर) या थाली में डाल कर सबको लकड़ी के पटड़े ऊपर रखा जाता है और फिर धूप बत्ती के साथ विधिवत रूप से इनकी पूजा की जाती है। घर आंगन की साफ सफाई में आंगन को गोबर के साथ लेप लिपाई करके तथा गोलू, लोष्ठी व मकौल से सुंदर सुंदर ठाहरे बना कर सजाया जाता है। इसी दिन विशेष पकवान भी बनाए जाते हैं जो की अपने अपने जिले के अनुसार होते हैं, इन पकवानों में आ जाते हैं, बाबरु, भल्ले, कचौरी, रोडू, चिल्डू ,गुलगुल्ले, भटूरे, पतरोडू(पत्तोंड), खीर व सीडू आदि।

पूजा पाठ के पश्चात घर के बुजुर्गों का चरण स्पर्श किया जाता है फिर बने हुवे पकवान अपने पास पौड़ोस में अखरोटों व दुभा (द्रुभ) के साथ बांटे जाते हैं। बजुर्गों को दुभा व अखरोट देते हुए उनके चरण भी स्पर्श करते है, जिस पर वो आशीर्वाद देते हैं।

सायर का यह त्योहार हर जिले में अपने अपने ढंग से मनाया जाता है, लेकिन सक्रांति का दिन होने के कारण सभी के लिए पवित्र व पूजनीय हो जाता है। जैसे कुल्लू के कुछ हिस्सों में इस दिन पूजा पाठ के पश्चात हलुआ विशेष रूप से बांटा व खाया जाता है। शिमला और सोलन में सायर के त्योहार को मेले का आयोजन करके मनाया जाता है। कहते है कि पहले शिमला के मशोबरे तथा सोलन के अर्की में लगने वाले सायर मेलों में बैलों का दंगल करवाया जाता था, जो कि अब (जीव जंतु कल्याण के नियमों के विरुद्ध होने के कारण) नहीं करवाया जाता, अब केवल अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रम ही करवाए जाते हैं। शेष जिला मण्डी, बिलासपुर, हमीरपुर व कांगड़ा आदि को सायर का त्योहार लगभग एक जैसे ही मानते हुए देखा जा सकता हैं। मण्डी क्षेत्र में सायर के इस त्योहार में अखरोटों का चलन अधिक देखने को मिलता है। सायर से 8 – 10 दिन पूर्व ही अखरोटों का बाजार लग जाता है और इनकी भारी बिक्री होती है। क्योंकि बच्चे, वयस्क सभी इनसे खेलते भी हैं और आपस में बांटते भी है।

कुछ भी हो त्योहार तो त्योहार ही है, हां इसे मनाने के अपने अपने ढंग होते हैं, लेकिन त्योहार के पीछे जुड़ा संबंध तो एक ही रहता है जो कि हम सभी को एक सूत्र में बंधे रहने को प्रेरित करता है।

वीर क्रांतिकारी शहीद रामप्रसाद बिस्मिल – डॉ. कमल के. प्यासा

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