समुद्र किनारे

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अलका सिंह, दिल्ली

मैं जब छोटी थी तो गांव के पण्डित ने मेरी जन्मपत्री देखकर कहा था, “बिटिया की पीठ पर भंवर है। दो साल की होते होते ये पानी मे डूब कर मर सकती है, इसका ख्याल रखना।”

जाने क्या क्या व्रत, पूजा पाठ और जतन मेरी माँ ने किए होंगे कि वो दो साल तो बीत गए, आज मैं पचास साल की हूँ और खुद दो बच्चों की मां हूँ। पर इन सब बातों के बीच एक बात ये हुई कि मुझे कभी तैरना नही सीखने दिया गया।

मम्मी कहतीं, “कुछ हो गया तो?”

मैं कहती, “जब तैरना सीख जाऊंगी तो डूबुंगी कैसे?”

पर नहीं तो नहीं। शायद इसी वजह से मुझे नदियों, झरनों, समुद्रों से एक लगाव सा रहा है। नदी के किनारे बैठकर या बोटिंग करते हुए एक डर तो हमेशा से रहा है पर अच्छा भी लगा है। कई बार चाहा पर मैं समुद्र नहीं देख पाई। घूमने जाने का प्लान बनते बनते रह जाता था। कभी छोटे बच्चे, कभी उनकी पढ़ाई, कभी कोई बीमार हो गया तो कभी पति के आफिस का काम। कभी गर्मी, कभी सर्दी तो कभी बरसात। कारण कभी खत्म नही हुए और मेरा समुद्र देखना हो नहीं पाया।

पर आज मैं बहुत खुश हूं। आज हम चारों समुद्र के किनारे हैं। कितनी सुंदर जगह है, जैसे फिल्मों में या तस्वीरों में देखा है। मेरे बच्चे लहरों में खेल रहे थे। मैं और मेरे पति वहीं समुद्र किनारे रेत पे बैठे हुए थे। बिना बातें किये हुए में ये सुंदर दृश्य अपनी आंखों में कैद कर रही थी। लहर पैरों तक आती,और रेत पैरों के नीचे से खिसकने लगती तो गुदगुदी सी लगती।

मैंने अपने पति को धन्यवाद कहा कि उन्होंने मेरा ये सपना सच कर दिया। बच्चे भी हमारे पास आकर बैठ गए। सूरज ढल रहा रहा। आसमान में लाल, पीला और नारंगी रंग फैल गया था। मुझे ये डूबते सूरज का समय बहुत अच्छा लगता था।

मेरे पति उठे और पास रखे मटके पर से लाल रंग का कपड़ा हटाया और समुद्र के पानी मे खड़े होकर मुझे बिखेर दिया, उस पानी मे, उन हवाओं में, और डूबते सूरज की उस लालिमा में।

(अलका सिंह, एक फौजी की बेटी और पत्नी है बी.ए. और बी.एड. की शिक्षा लेने के बाद कुछ समय तक अध्यापन किया। जीवन के दूसरे चरण में लेखन शुरू किया। इनकी रचनाओं में कविता संग्रह “उद्गार मन के” और कहानी संग्रह “कुछ कहे कुछ अनकहे फ़साने” प्रकाशित हो चुके हैं। इनकी कविताएं तीन संकलनों में भी शामिल हैं। वर्तमान में दिल्ली और लखनऊ में निवास है।)

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