रवींद्र कुमार शर्मा – घुमारवीं
वो भी क्या दिन थे जब हम ऐसे गांव में थे रहते
जहां रिश्ता लगा कर थे सब को बुलाते
कोई बंदिश नहीं होती थी ऐसा था ज़माना
बेरोक टोक एक दूसरे के घर थे आते जाते
छोटे थे जब पड़ोसी के घर थे खाना खाते
भरी दोपहरी में कई बार वहीं थे सो जाते
टाट पर बैठते थे स्कूल में कलम दवात के साथ
दोपहर को धोते थे पट्टी धूप में थे सुखाते
त्योहार के दिन हर घर में बनते थे पकवान
घर में रौनक होती थी आते थे बहुत मेहमान
पड़ोसियों के घर भी दे आते थे अपने घर का बना
पड़ोसी भी दे जाते थे खाने का बहुत सामान
फसल बीजने से लेकर कटने तक करते थे मिलकर काम
पीछे न रह जाये कोई रखते थे एक दूसरे का ध्यान
बैलों की घण्टियों से गूंज उठते थे खेत खलिहान
आगे बैल पीछे हाली खुशी से झूमते गाते थे किसान
बिजली तो थी नहीं लैंप की रोशनी में होती थी पढ़ा
शक्कर बांटी थी जब पहली बार बिजली थी आई
पानी घड़ों में लाना पड़ता था दूर बौड़ी और कुएं से
गर्मियों में बौड़ी पर पानी के लिए हो जाती थी लड़ाई
बसंत में झूले में झूलने को लगती थी कतारें
दधोनु में जब कढ़ता था दूध बनती थी मोटी मलाई
दधोनु के नीचे लगा जला दूध होता था बहुत स्वादिष्ट
उसे खाने के लिए बच्चों में हो जाती थी लड़ाई
घरेलू पशुओं के रखे होते थे प्यार के नाम
बुलाते थे जब उनको नाम से तो खड़े हो जाते थे कान
प्यार से तो जीती जा सकती है दुनियां भी
आदमी मतलबी प्यार से जानवर भी बन जाते हैं गुलाम
कितने भोले होते थे लोग कितने भोली उनकी बातें
ऊन के कम्बल में गुजरती थी वह जाड़े की शरद रातें
सुख दुख में होता था सारा गांव एक साथ
रिश्तेदार बहुत आते थे अक्सर होती थी मुलाकातें



