संयोगवश मित्रता (संस्मरण) — रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह के द्वारा लिखी गई एक प्रसिद्ध कहानीरणजोध सिंह

दोस्तों अभी तक आपने अनेक कहानियां सुनी होगी, जिनमें लोग जमीन के एक-एक इंच के लिए लड़ते हैं| कभी सांझी दीवार को लेकर झगड़े होते हैं, तो कभी पड़ोसी की खिड़कियों-दरवाज़ों को लेकर| कभी शामलात अर्थात खाली पड़ी सरकारी जमीन को हड़पने को लेकर झगड़े होते हैं, तो कभी गाड़ियों की पार्किंग को लेकर| संक्षेप में हम जाने-अनजाने अपनी जिंदगी को नर्क बना देते हैं|

मगर आज जिन लोगों की कहानी मैं यहाँ बयाँ कर रहा हूँ, वे न तो कोई घनिष्ट मित्र थे और न ही उनका बिज़नस या प्रोफेशन एक था| उनमें यदि कुछ कॉमन था तो वह था उनकी जमीन तथा उसमें एक सुंदर सा घर बनाने की चाहत| संयोगवश उन दस लोगों की जमीन साथ-साथ थी और एक ही साइज़ की थी|

जैसे ही वे लोग अपने-अपने मकान की चार दिवारी करने लगे तो एक वरिष्ठ मित्र ने सलाह दी, “दोस्तों अगर जिंदगी को स्वर्ग बनाना चाहते हो तो घर में कुछ जगह बगीचे के लिए अवश्य रखना| क्योंकि ईंट-पत्थरों के घरों से कहीं ज्यादा अच्छा है कि आपके आंगन में हरी घास हो, फूल हो, सदाबहार पौधे हो तथा इस बगीचे के साथ-साथ आपकी गाड़ी खड़ी करने के लिए पर्याप्त जगह भी हो|” सभी दोस्तों को यह सुझाव पसंद आया, मगर इतना सब कुछ करने के लिए बहुत सी जमीन चाहिए थी जो सबके बस की बात नहीं थी| इन सभी लोगों ने जो अब तक मित्र बन चुके थे, आपसी समझ, सहमती और गहन मंथन के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि वे सभी लोग थोड़ी-थोड़ी जमीन पार्क के लिए छोड़ दें और फिर सभी लोग इस पार्क का प्रयोग सामूहिक रूप से करें| प्रत्येक मित्र ने अपनी भूमि का कुछ भाग इस पार्क के लिए छोड़ दिया तथा भूमि की रजिस्ट्री करवाते समय बकायदा इस बात को दर्ज किया गया कि इस जमीन का प्रयोग केवल पार्क के लिए ही किया जायेगा और इसमें किसी भी प्रकार का निर्माण नहीं किया जायेगा|

सभी लोगों ने सहर्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया| सभी मित्रों के घर भी बन गए और उनके घर के आगे खुला-डुला सुंदर पार्क भी बन गया| इस पार्क में हरी घास लगाई गई, सुंदर फूल लगाये गए, सदाबहार फूलों के पौधे लगाये गए और कोई 10-12 गाड़ियों की पार्किंग के लिए स्थान रखा गया| इन मित्रों ने अपनी कॉलोनी का नाम रखा ‘फ्रेंड्स कॉलोनी नालागढ़’|

आज की तिथि में सभी मित्र सुबह-शाम इस पार्क में सैर करते हैं, बच्चे खेलते हैं तथा घर की महिलाएं बेफिक्र होकर सुबह शाम इस पार्क में धूप सेकती हैं, गप्प-गोष्ठी करती हैं| इन मित्रों के घरों में चाहे कोई जगराता हो, रामायण पाठ हो, जन्मदिन की पार्टी हो, किसी बन्धु-बांधव की रिटायरमेंट पार्टी हो या मह्लिओं की किट्टी पार्टी हो, इसी पार्क में हो जाती है| यानि हर छोटा-बड़ा समारोह इसी पार्क में हो जाता हैं| उन्हें अलग से किसी महंगे हाल की बुकिंग नहीं करवानी पड़ती| क्योंकि प्रत्येक घर के आगे पार्क का खुला क्षेत्र है, जहाँ पर कभी कोई निर्माण नहीं होगा, अत: प्रत्येक घर में सुबह से लेकर शाम तक धूप रहना लाज़िम है|

दूसरी तरफ भूमि के एक-एक इंच के लिए लड़ने वाले लोग इनसे रश्क करते हुए कहते हैं, “काश हम लोग भी समय पर इस तरह का कोई सही निर्णय ले लेते तो आज हम भी स्वर्ग में रह रहे होते!”

भेडू- एक संस्मरण

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