लाहौल स्पीति जहां कि बौद्ध धर्म की बहुलता है और इधर बौद्ध मठों (गोम्पओं) में अधिकतर मृण्मय (मिट्टी )की बड़ी बड़ी मूर्तियां बनी देखी जा सकती हैं। इन्हीं मृण्मय मूर्तियों में कहीं कहीं अभिलेख भी देखने को मिल जाते हैं, जिनका विवरण आगे दिया गया है।
लाहौल स्पीति के धातु अधातु अभिलेख:
1.मृकुला देवी धातु प्रतिमा अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : धातु प्रतिमा अभिलेख।
अभिलेख काल : 16वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : शारदा ।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : मृकुला देवी मंदिर, उदयपुर, लाहौल व स्पीति।
अभिलेख विवरण : उदयपुर लाहौल के, मृकुला देवी मंदिर की मृकुला देवी अष्ट धातु निर्मित, अष्ट भुजा (महिषासुरमर्दिनी) प्रतिमा, जिसकी स्थापना चंबा के ठाकुर हिंपाल द्वारा की गई थी, के आधार पीठ पर शारदा लिपि में लिखे अभिलेख से प्रतिमा के शिल्पी व निर्माता के नामों की संवत सहित जानकारी हो जाती है। वैसे मंदिर का निर्माण 11वीं -12वीं शताब्दी का बताया जाता है।
2.मारीची वज्रवराही मृण्मय प्रतिमा अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी :अधातु (मृण्मय)।
अभिलेख प्रकार :अधातु (मृण्मय) प्रतिमा अभिलेख।
अभिलेख काल : 11वीं -12वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : तिब्बती (भोटी)।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : ताबो मठ स्पीति, लाहौल।
अभिलेख विवरण : लाहौल स्पीति के ताबो मठ के त्सुगलगरवांग (मुख्य हॉल) में स्थापित वज्रवराही(दर्जे फागमो) की मृण्मय प्रतिमा जो कि इंडो तिब्बती शैली की में है और प्रतिमा में भारतीय कश्मीरी कला स्पष्ट दिखाई देती है। देवी के एक हाथ में वज्र व दूसरे में घंटी दिखाई गई है। इसी प्रतिमा का तिब्बती लिपि के अभिलेख में प्रतिमा संस्थापक रिनचेन जंगपो व गुगे साम्राज्य का उल्लेख किया गया है।क्योंकि मठ की स्थापना रिनचेन जंगपो द्वारा 998ईस्वी में की गई थी और फिर इसी मठ का जीर्णोद्वार 11वीं शताब्दी में तिब्बत के पुरंग गुगे वंश के राजाओं द्वारा ही किया गया था। यह समस्त ऐतिहासिक वृतांत, दान पुण्य व धार्मिक गतिविधियों की चर्चा इसी अभिलेख में की गई है और से सभी कुछ अब भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।
3.वैरोचन बुद्ध, धातु प्रतिमा अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : धातु।
अभिलेख प्रकार : धातु प्रतिमा अभिलेख।
अभिलेख काल : 8वीं – शताब्दी।
अभिलेख लिपि : तिब्बती (भोटी)।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : धनकर मठ, नजदीक ताबो, लाहौल स्पीति।
अभिलेख विवरण : स्पीति का धनकर मठ, काजा व ताबो के मध्य स्पीति व पिन नदियों के संगम स्थल से ऊपर की ओर बड़ी से चट्टान पर स्थित है। मठ 11वीं – 12 वीं शताब्दी का बताया जाता है। इसी मठ में भगवान बुद्ध की (चहूं दिशा मुखधारी ), पीठ से पीठ लगा के बैठी अष्ट धातु की 8वीं शताब्दी की प्रतिमा स्थापित है। प्रतिमा गिलगित की बनी बतायी जाती है, जिसे शाही भिक्षु ल्हा लामा जिवाओ ,को किसी ने भेट में दी थी। प्रतिमा के आधार पीठ पर, अभिलेख में बौद्धि सत्वों के नाम, पवित्र मंत्र “ॐ मणि पद्में हूं ” आदि उत्कीर्ण किया देखा जा सकता है।
4.मैत्रेय बुद्ध, मृण्मय प्रतिमा अभिलेख।
अभिलेख श्रेणी : अधातु (मृण्मय)।
अभिलेख प्रकार : अधातु (मृण्मय) प्रतिमा अभिलेख।
अभिलेख काल : 11वीं – 12वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि : तिब्बती (भोटी)।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : की गोंपा, काजा, लाहुल स्पीति।
अभिलेख विवरण : लाहौल स्पीति का की गोंपा जिसमें कई एक भगवान बुद्ध (मैत्रेय) मृण्मय प्रतिमाएं देखी जा सकती हैं, उन्हीं में से एक 14 मीटर ऊंची, मिट्टी (Stucco) प्रतिमा, की गोंपा के हाल देखी जा सकती है। प्रतिमा के आधार पीठ पर तिब्बती लिपि में उत्कीर्ण अभिलेख में पवित्र मंत्र “ॐ मणि पद्में हूं”, कई एक अन्य धार्मिक श्लोक, धर्म प्रचारक रिनचेन जांगपो द्वारा किए गए कार्य व प्रतिमा का निर्माण, क्यों, किस द्वारा और कब करवाया गया का सारा ब्यौरा देख जा सकता है।




