डॉ. कमल के. प्यासा की कलम से ‘शक्कर खोरा’ का अद्वितीय परिप्रेक्ष्य

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प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा 108 / 6 समखेतर . मण्डी 175001 हिमाचल प्रदेश

उसकी दाढ़ी के बाल लम्बे लम्बे व उलझे हुवे हैं। शकल सूरत व बोलचाल से वह यू पी बिहार का लगता है। वह जहां भी जाता है उसका लटका हुआ कंबल जमीन के साथ गिसकता ही चला जाता है। दिन के समय जब भी उसे पैसों की जरूरत पड़ती है तो वह शहर के प्रसिद्ध मंदिर भूतनाथ के द्वार के आगे बैठ जाता है। 100, 50 रुपए का जुगाड़ हो जाने पर वह सीधा चला आता है उस खाली और बंद पड़ी दुकान की पटड़ी पर। उसका कंबल नाली और पटड़ी पर गिरा रहता है और वह अपनी मस्ती में मस्त रहता है।

वह जुगाड़ से इकठ्ठे किए पैसों में से 20-30 रुपए निकल कर सामने ठेके से पऊआ ले कर, फिर पटड़ी पर आराम से बैठ कर जल्दी से गटक जाता है। कुछ समय वहीं बैठे बैठे गुनगुनाता रहता है जब कुछ सरूर उतरता है तो वह फिर अपने कंबल को घसीटते हुवे मंदिर के द्वार के सामने पहुंच कर हाथ फैलाए बैठ जाता है। उसका दिन भर यही सिलसिला चलता है अर्थात मंदिर के आगे हाथ फैलाए या फिर ठेके के सामने उस बंद दुकान वाली खाली पटड़ी पर जहां की उसकी निगाहें ठेके की बोतलों पर होती हैं। एक दिन तो उस पटड़ी वाले दुकान के साथ वाले दुकानदार ने उसे वहां से उठाने का बहुत प्रयास किया लेकिन वह नहीं उठा। दुकानदार ने उस पर ठंडे पानी की बाल्टी ही उड़ा दी मुझे सर्दी में यह देख कर उस बेचारे पर तरस भी आया और दुख भी।

ठेका वहां से उठ चुका था और शटर बंद हो गया था लेकिन वह अब भी उसी जगह अपनी पटड़ी पर बैठे ठेके के खुलने का इंतजार कर रहा था। जब ठेके का शटर नहीं खुला तो कुछ दिन वह इधर उधर भटकता रहा। पिछले ही कल मैंने उसे चौक के नुकड़ वाली बार के बाहर वाली नाली के पत्थर पर बैठे कुछ पीते देखा और शक होने पर मैंने अपने मित्र (बार मालिक) से उसके संबंध में बात की तो पता चला कि वह तो कुछ दिनों से यहीं बैठता है और 50 रुपए का पैग लगा कर फिर जुगाड़ में निकल पड़ता है और दिन में 3-4 पैग गटक जाता है। किसी ने ठीक ही कहा है जहां चाह है वहां राह है! शक्कर खोरे को शक्कर मिल ही जाती है।

नेपाल के जनकपुर धाम में हिमाचल के साहित्यकारों का सम्मान: संस्कृति और साहित्य का आदान-प्रदान

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