डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

झील सी गहरी प्यारी आंखें
नीली पीली कजरारी आंखें
लाल गुलाबी काली आंखें
गहराई में ले जाती आंखें
बचना,
ये सब ठगती हैं आंखें !

देखती ,सब समझती आंखें
परखती भालती हैं येआंखें
जुबान तो नहीं रखती आंखें
केवल तरसती हैं ये आंखें
बचना,
ये सब ठगती हैं आंखें !

कहीं भटकती हैं येआंखें
टपटप करती रहती आंखें
कभी बरसती हैं ये आंखें
जवाब नहीं इनआंखों का
देखी , रोती हंसती ये आंखें !
बचना,
ये सब ठगती हैं आंखें !

मूक भाषा में, माहिर आंखें
सांठ गांठ जाने ये आंखें
कभी लगें बड़ी डरावनी
मार से मारी जाएं जो आंखें !
बचना,
ये सब ठगती हैं आंखें !

न मिलाना, न दिखाना आंखें
पछताओ गे ,कट जाओ गे
आंखों से आंखे जब टकराओ गे
और किरकिरी आंखों की बन
आंखों में ही उलझ जाओ गे !
बचना, ये बस ठगती हैं आंखें !

आंखें: डॉo कमल केo प्यासा

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