पति-परमेश्वर (कहानी) – रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह – नालागढ़

उस दिन होली का दिन था, महाविद्यालय के सभी प्राध्यापक व विद्यार्थी मिलकर महाविद्यालय परिसर में रंगों से सरोवार थे| अचानक कुछ प्राध्यापकों को ख्याल आया कि इस त्यौहार के मोके पर सत्यव्रत शास्त्री जी तो उनकी टोली में है ही नहीं, सबने एक साथ निर्णय लिया कि उनके घर चला जाए और उनको भी रंग लगाया जाये| थोड़ी ही देर में होली के रंगों से सरोवार ये मदमस्त टोली शास्त्री जी के घर के आगे थी| दरवाजा उनके छोटे बेटे ने खोला, इतने सारे लोगों को एक साथ देख कर वह कुछ घबरा सा गया तुरंत बोला, “पिताजी ऊपर कोठे पर हैं|” सारी मित्र-मण्डली उन्हें सरप्राइस देने के लिए कोठे पर चली गई| लेकिन वे सभी, वहां यह देखकर दंग रह गए कि शास्त्री जी आराम से एक चारपाई पर लेटे हुए धूप का आनंद ले रहे है और उनकी धर्मपत्नी फर्श पर बैठकर उनके पैर दबा रही है| प्राध्यापकों को देखते ही उसने तुरंत अपने सिर पर दुपट्टा लिया और चाय बनाने के लिए रसोई में चली गई| दोस्तों ने चुटकी ली, “शास्त्री जी बड़े भाग्यवान हो, अपनी खूब सेवा करवा रहे हो| शास्त्री जी ने जोर से ठहाका लगाया और उंचे स्वर में बोले, “अरे जोरू के गुलामों तुम्हें क्या मालूम पति क्या होता है, हमारे यहां तो पति को परमेश्वर समझा जाता है इसीलिए तो तुम्हारी भाभी मेरी इतनी सेवा करती है|” सारे खिलखिला कर हंस पड़े मगर मन ही मन शास्त्री जी के भाग्य पर इर्ष्या भी कर रहे थे|

शास्त्री जी का भागवत कथा करने का तरीका बहुत ही प्रभावशाली था| अपनी छुट्टियों का उपयोग वे भागवत करने में ही करते| वे अक्क्सर भगवे रंग के कपड़े पहन, माथे पर चंदन का बड़ा सा तिलक लगाकर अपने भक्तों पर धुआंधार वचनों का वार करते| उनके प्रवचनों के वार से भक्तगण पूर्ण रूप से ध्वस्त हो जाते| उनके भक्त उनसे इस कद्र सम्मोहित थे जैसे शास्त्री जी ही उनकी नैया पार लगाने वाले थे| उनके भक्तों की भीड़ में पचानवे प्रतिशत महिलाएं थी, एक दम अपने जीवन से दुखी.. जिन्होंने अपनी सास और ससुर के लिए कभी चाय की प्याली तक नहीं बनाई थी….जिन्हें अक्सर अपने पतिओं से ये शिकायत रहती थी कि वे घर-गृहस्थी चलाने में उनकी मदद नहीं करते, वो सब औरतें शास्त्री जी की परम-भक्त थीं| शास्त्री जी की वाणी में गज़व का सम्मोहन था| भागवत सुनाते वक्त वे नारी के प्रति बहुत ही उदार हो जाते थे| वे अक्सर वेद, पुराणों, और उपनिषदों से श्लोक उद्धत कर नारी को देवी की संज्ञा दे डालते| औरत को ईश्वर की सर्वोत्तम कृति बताकर अपने भक्तों की तालियां बटोरने में वे सिध्हस्त थे, लेकिन घर आते ही अपनी पत्नी को सावित्री-सत्यवान की कहानी सुनाते ताकि वक्त पड़ने पर वह भी शास्त्री जी की रक्षा करने हेतु यमराज से भिड़ जाये|

एक दिन शास्त्री जी इत्र से सरोवार झक सफेद रंग का साफ-सुथरा कुर्ता पहने गर्व से सीना तान कर किसी कार्यवश बाजार जा रहे थे| उनके संग उनकी धर्मपत्नी व दो बच्चे भी थे जो उनसे चार कदम पीछे चल थे| एक बच्चे को उनकी धर्म-पत्नी ने गोद में उठाया हुआ था तथा दूसरे को उसने उंगली लगाया हुआ था| सड़क पर गाड़ियां तेज रफ्तार से चल रही थी| जो बच्चा मां का हाथ पकड़े था, वह लगातार मां का हाथ छुड़ाकर इधर-उधर भागने की कोशिश कर रहा था| मां को उस बच्चे को काबू करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ रही थी| घर से बाजार का रास्ता कोई एक किलोमीटर लंबा था वह बेचारी बुरी तरह थक गई थी, मगर शास्त्री जी इन सबसे बेखबर चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कुराहट लिए लोगों का अभिनंदन स्वीकार करते हुए चले जा रहे थे| अचानक उनका सामना उनके ही कार्यालय में काम करने वाले एक अभिन्न मित्र से हुआ जिसका नाम अमित था | अमित ने शास्त्री जी का जोर शोर से अभिवादन किया| शास्त्री जी ने भी अमित का गर्मजोशी से स्वागत करते हुए अपनी धर्म-पत्नी व बच्चों से मिलवाया | यद्यपि अमित अभी उम्र में शास्त्री जी से बहुत छोटा था मगर इंसानी चेहरों को पढ़ने का हुनर उसके पास था| उसने पहली ही दृष्टि में उसकी पत्नी की लाचारी को भांप लिया| उसने उस समय तो शास्त्री जी को कुछ नहीं कहा मगर अगले ही रोज स्टाफ-रूम में एकांत पाकर उसने कह ही दिया, “कल आप खुद तो सज धज कर किसी राजकुमार की तरह घूम रहे थे मगर पत्नी को दासी की भांति चार कदम पीछे रखा हुआ था वह भी दो बच्चों की जिम्मेदारी के साथ, ऐसा क्यों ?” शास्त्री जी ने अमित से ऐसी अपेक्षा कभी नहीं की थी, तुनक कर बोले, “तुम अपनी पश्चिमी सभ्यता अपने पास रखो जब तुम्हारा विवाह होगा तो तुम अपनी धर्म-पत्नी को अपने साथ चिपका कर चलना, मैं भारतीय संस्कृति में पूर्ण रुप से विश्वास रखता हूं और अच्छी तरह से जानता हूं कि भारतीय नारी के लिए उसका पति परमेश्वर होता है मेरी धर्मपत्नी अपने कर्तव्य का निर्वाह कर रही है, और मैं उसके कर्तव्य-पालन में उसकी सहायता… समझे|”  अमित बेचारा अपना सा मुहँ लेकर चुप हो गया|

इस घटना से लगभग एक सप्ताह बाद, शास्त्री जी जैसे ही घर पहुंचे, घर में दो नहीं चार बच्चे थे जिन्होंने पूरे घर को आसमान पर उठा रखा था| घर में खूब गहमागहमी थी, उन्हें को यह समझते देर न लगी कि घर में उनकी छोटी बहन सुनंदा आई हुई है, उनकी प्रसन्नता का परावार न रहा क्योंकि वह अपनी छोटी बहन से बहुत प्रेम करते थे और प्यार से उसे छुटकी कह कर पुकारते थे| पांच साल पहले जब उसका विवाह हुआ था तो शास्त्री जी बहुत उदास हो गए थे अपनी छुटकी को लेकर, मगर उन्हें प्रसन्नता इस बात की थी कि छुटकी को बहुत अच्छा घर परिवार मिल गया था| उन्हें पूरा विश्वास था कि उनकी छुटकी अपने घर-संसार में बहुत सुखी रहेगी| वह अक्सर अपने भाई यानि शास्त्री जी से मिलने के लिए आ जाती थी मगर इस बार सुनंदा कुछ सहज नहीं थी| दो-चार दिन के बाद ही उन्होंने यह महसूस किया कि उनकी छुटकी पहले की तरह हंसमुख नहीं रह गई है, वह सदैव उदास व कुछ खोई-खोई सी रहती है| उन्होंने हिम्मत करके सुनंदा से पूछ ही लिया, “छुटकी आजकल तुम कुछ-कुछ उदास रहती हो, क्या दामाद जी जयादा याद आ रहे हैं?” सुनंदा ने कोई जवाब नहीं दिया, बस उदास आंखों से भैया-भाभी को देखती रही| उसकी चुप्पी शास्त्री जी के लिए असहनीय थी| उन्होंने एक बार फिर मुस्कुराते हुए पूछा, “इस बार दमाद जी भी साथ नहीं आए ! उनकी तबीयत तो ठीक है?” इस बात से सुनंदा बिफर गई, गुस्से से बोली, “दमाद जी को क्या होगा वे पुरुष हैं मज़े में हैं|” सुनंदा एक क्षण के लिए रूकी और फिर कहने लगी, “ मैं एक स्त्री हूँ और इसी स्त्रीत्व के कारण मेरी जिंदगी खराब हो रही है आपके दामाद जी स्त्री को तो कुछ समझते ही नहीं, बस अपने को पति परमेश्वर और मुझे अपनी दासी समझते हैं| अब आप ही बताएं कि आपने मेरा विवाह मुझे दासी बनने के लिए किया था?” ये कहकर सुनंदा सिसकियां भरने लगी| यह सुनते ही शास्त्री जी क्रोध से उबलने लगे| “मेरी छुटकी के साथ ऐसा व्यवहार! मैं अभी दामाद जी से बात करता हूं|” शास्त्री जी कहना चाहते थे मगर इससे पहले ही शास्त्री जी की पत्नी जो सदैव चुप रहती थी, बोल उठी, “कोई बात नहीं सुनंदा, ये पुरष होते ही ऐसे हैं, तुम्हारे भैया भी तो खुद को परमेश्वर और मुझे दासी ही समझते हैं|” शास्त्री जी का मस्तषिक सुन्न हो गया मानो उनके सिर पर किसी ने भारी हथोड़ा मार दिया हो|

शायद उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ था कि पति को पति-परमेश्वर बनाने की नीव में नारी की समस्त आशाओं, आकांक्षाओं और सपनों को दफन कर दिया जाता है|

जड़ों का दर्द – (कविता) – रणजोध सिंह

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