रणजोध सिंह

सुंदर आज अत्यंत प्रसन्न था| क्योंकि चालीस वर्ष की अल्पायु में ही उसने अपने लिए निजी घर का निर्माण कर लिया था और आज उसी सपने के साकार होने का दिन यानि गृह प्रवेश था| इस अवसर पर, शहर के अनेक गणमान्य व्यक्तियों को निमन्त्रण भेजा गया था| सभी लोग उसके गृह-निर्माण में आधुनिक व परंपरागत शैली के सुव्यवस्थित मिश्रण के कायल हो गए और दिल की गहराईयों से बधाइयाँ देने लगे|

तभी उसके घर को बनाने वाले ठेकेदार ने दस-पंद्रह लोगों के साथ घर में प्रवेश किया| सुंदर लगभग भागते हुए घर के गेट पर जा पहुँचा| उन्हें वहीँ रोक, घर के सदस्यों ने रोली टीका लगाकर उनका स्वागत किया| उनके साथ अनेक छायाचित्र लिए, बड़े स्नेह से भोजन करवाया और अंत में सबको नये कपड़ों के साथ एक-एक मिठाई का डिब्बा देकर विदा किया| सुंदर के सभी रिश्तेदार उन लोगों के विशेष स्वागत से काफी हैरान थे, मगर कोई भी उन्हें पहचानने में कामयाब नहीं हो पाया|

आखिरकार एक रिश्तेदार ने तो पूछ ही लिया, “ये कौन लोग थे जिनका इतना भव्य स्वागत किया गया, इससे पहले तो इन्हें कभी नहीं देखा?” सुंदर ने हँसते हुए कहा, “ये वो लोग हैं, जिन्होंने इस घर का निर्माण किया है| मैंने तो सिर्फ पैसे खर्च किए हैं मगर इन लोगों ने मेरे घर को आकार देने के लिए ईट, पत्थर, सीमेंट और सरिया अपने कंधों पर उठाया है| ये न होते तो मेरा यह सपनों का घर कभी पूरा न होता| इसलिए इस घर में इनका इतना सा स्वागत तो बनता ही है|”

भव्य स्वागत: रणजोध सिंह की दिलचस्प लघुकथा

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