जब भी मैं देश भक्ति पर
कुछ लिखना चाहता हूं,
मेरी आत्मा बीच में आ जाती है।
खूब हंसती है मुझ पर
कहती है
हे कलमवीर
अब तुम शब्दों की ईंटों से
देशभक्ति का दुर्ग बनाओगे।
फिर सारी दुनिया को
ये अद्भुत कृति दिखाओगे।
इससे बेहतर है
जरा अपनी मां के पास बैठ जाओ।
कोशिश करना
उसके चेहरे पर पड़ी हुई अनगिनत
झुर्रियों को पढ़ने की,
तुम अपना तमाम भूगोल-इतिहास
समझ जाओगे।
ग़र ये मुश्किल लगे
तो ठहर जाना दो घड़ी उसके पास,
पूछ लेना उसका हाल
यकीन मानो,
तुम भी देशभक्त कहलाओगे।



