एडजस्टमेंट, लघुकथा – रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह – नालागढ़

मृदुल को ठीक 10 बजे स्नेहा से मिलने जाना था| वैसे तो वह पढ़ा लिखा ऊँचे कद का सुन्दर नौजवान था और अपनी अपूर्व मेहनत के बल पर उच्च सरकारी नौकरी भी प्राप्त कर चुका था| मगर आज भी उसकी पहली प्राथमिकता उसका परिवार था और इन पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए घर में आये हर विवाह-प्रस्ताव को नज़र-अंदाज़ करता रहा था।

लेकिन वक्त तो किसी का इंतजार नहीं करता| वह तो चलता रहता है अनवरत, बिना रुके, बिना थके| जब उम्र रेत की तरह हाथ से निकलने लगी तब परिवार को चिंता हुई| सबने मिल कर मृदुल  पर दवाब डाला और तब कही जा कर वह शादी के लिये राजी हुआ| इसी सिलसिले में स्नेहा से आज उसकी पहली मुलाकात थी| स्नेहा भी ऍम.एस.सी. तक की शिक्षा ग्रहण कर किसी प्राइवेट कम्पनी में उच्च पद पर आसीन थी| मृदुल के पास आने-जाने के लिये एक छोटी सी पुरानी कार थी जो कई बार बिना सूचना दिए ही बंद हो जाती थी|

आज भी उसी कार के माध्यम से वह कॉफ़ी-हाउस में अपने स्वभावानुसार निर्धारित समय से ठीक 15 मिनट पहले पहुँच गया था| क्योंकि पूरा कॉफ़ी-हाउस खाली था इसलिए वह कॉफ़ी हाउस के गेट के पास ही स्नेहा का इंतजार करने लगा| स्नेहा से उसकी जान पहचान एक अखबार के माध्यम से हुई थी और यदा-कदा फ़ोन पर उनकी बातचीत होती रहती थी| स्नेहा के व्यक्तिव में वह अपनी जीवन साथी की तस्वीर देखने लगा था| यूं तो स्नेहा भी जीवन के 35 बसंत देख चुकी थी और मृदुल भी 38 वर्ष का आंकड़ा पार कर चुका था| दोनों ही सुशिक्षित व आत्म-निर्भर थे| अतः उन दोनों का परिणय-सूत्र  में बंध जाना हर दृष्टि से न्यायसंगत था| लेकिन फिर भी मृदुल का ह्रदय जोर- जोर से धड़क रहा था| शायद अब तक वे फ़ोन पर ही मिले थे मगर रू-ब-रू होने का मौका आज पहली बार आया था। यही कारण था कि मृदुल के दिल के किसी कोने में एक अजीब सी हलचल व अनजाना सा डर सिर उठा रहा था|

स्नेहा भी शायद एकांकी जीवन व्यतीत करते-करते थक चुकी थी इसलिए वह भी मृदुल से मिलने को बेकरार थी| ठीक 10 बजे उसकी चमचमाती हुई बड़ी सी कार कॉफ़ी-हाउस की पार्किंग में थी| स्नेहा का वस्त्र-विनयास उसकी शालीनता, सौम्यता व प्रोड़ता का परिचायक था| स्नेहा से फ़ोन पर बातचीत करके वह इतना तो समझ गया था कि वह एक मृदु-भाषी, सरल एवं स्पष्ट स्वभाव की लडकी है| मगर वो बला की खूबसूरत होगी, इसकी कल्पना उसने नहीं की थी| स्नेहा भी मृदुल के व्यक्तित्व से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकी| दोनों ने काफी का आर्डर दिया और फिर एक दूसरे को जानने का प्रयत्न करने लगे| मृदुल ने छूटते ही पूछा, ”तुम इतनी सुन्दर हो, पढ़ी-लिखी हो, आत्म-निर्भर हो, तुमने आज तक शादी क्यों नहीं की?” “शायद मुझे तुम्हारे जैसे साथी की तलाश थी।” स्नेहा ने हँसते हुए उत्तर दिया। मृदुल इसके आगे कुछ न पूछ पाया। हाँ, उसने अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों की चर्चा अवश्य की। “डोंट वरी, आज से तुम अकेले नहीं हो, हम दोनों मिल कर इन जिम्मेदारियों को निभाएंगे।” स्नेहा ने पूरे आत्मविश्वास से कहा था।

जहाँ स्नेहा अत्यन्त सहज व बिंदास थी वहीं मृदुल कुछ असहजता महसूस कर रहा था| स्नेहा मृदुल को लेकर आश्वस्त थी मगर मृदुल सोच रहा था जो लड़की शादी से पहले इतनी बड़ी गाड़ी चलाने का शौक रखती है वो अपने जीवन साथी से इतनी आशा तो अवश्य करेगी कि वो उसे कोई बड़ी गाड़ी नहीं तो कम से कम ढंग की गाड़ी में तो घुमाये| मगर उसके पास तो छोटी सी पुरानी कार है ………. एक बड़ा परिवार है……….. परिवार की जिम्मेदारीयाँ हैं ……… आदि-इत्यादि| जुदा होने से पहले उसने पूरी हिम्मत जुटाकर कह ही दिया, “तुम्हारी गाड़ी को देखकर नहीं लगता कि मैं तुम्हरे साथ एडजस्ट कर पाउगा, मेरा मतलब कि मैं तुम्हारे योग्य हूँ|” “चलो कोशिश करते है” स्नेहा ने खिलखिला कर कहा| कोई मुश्किल से 20 मिनट उन्होंने साथ- साथ गुजारे और फिर ‘शीघ्र मिलने का वादा करके जुदा हो गये |

एक सप्ताह बाद वे फिर उसी कॉफ़ी-हाउस में मिले मगर इस बार स्नेहा ऑटो-रिक्शा से आई थी| मृदुल ने आते ही पूछा, ”तुम्हारी कार का क्या हुआ?” “वो मैंने बेच दी ताकि मैं तुम्हारे साथ एडजस्ट कर पाऊ” स्नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा| “अरे हाँ! मेरे साथ जिन्दगी भर के लिए एक एडजस्टमेंट तो तुम्हेँ भी करनी पड़ेगी, बल्कि आज से ही करनी पड़ेगी, अपनी कार से मुझे घर तक छोड़ने जाना पड़ेगा|” दोनों मासूम बच्चों की तरह खिलखिला उठे और बड़े सहज हो कर चाय का आनंद लेने लगे|

गर्माइश प्यार की (लघुकथा) – रणजोध सिंह

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