ग़ज़ल: मानवता पर डॉo कमल केo प्यासा के विचार

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डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

आदमी को आदमी ही खाने लगा है ?
लहू अपना ही खुद शर्माने लगा है !
महज़ के नाम पर उठती हैं लाठियां !
ईमान इतना डगमगाने लगा है !
आदमी को आदमी

रौशनी में अंधेरा पसरने लगा है
खामोश मंदिर मस्जिद
गुरुद्वारे हुवे हैं !
खौफ इनको भी सताने लगा है !
जमाने को न जाने क्या हो गया है !
आदमी को आदमी

सरे आम खून खराबा होने लगा है !
सिंदूर मांग का बिखरने लगा है !
सीना राहगीरों का भी धड़कने लगा है !
इंसान इतना कमीना हुआ है !
आदमी को आदमी

भाई भाई आज दुश्मन हुआ है !
गीता कुरान गुरुग्रंथ सब पूछे
खुदा के बंदों तुम्हें क्या हुआ है !
आज रिश्ता ही अपना बेगाना हुआ है
आदमी को आदमी ही खाने लगा है ?

ग़ज़ल: मानवता पर डॉo कमल केo प्यासा के विचार

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