डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

रुख बदला
कैसा हवा का ?
बाजार दाम
आसमान छूने लगे !

इंसानियत की कीमत
हुई जीरो
कोई भी छू इसे
मसलने लगे ।
जैसे फूल खुद ही
फूलों से उलझने लगें !

रुख बदला
कैसे हवा का ?
मायने जिदगी के
बदलने लगे,
देखोआदमी के हाथों
आदमी कैसे कैसे
सारे आम आज बिकने लगे !

रुख बदला
कैसे हवा का ?
भाव जुबान के भी
पल पल फिसलने लगे !

क्या बने गा,
मुल्क का यारो ?
रहनुमा खुद ही
दलाल बनने लगे !
रुख बदला
कैसे हवा का ?
बाजार दाम
आसमान छूने लगे !

हवा का रुख: डॉo कमल केo प्यासा

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