डॉ. कमल के.प्यासा – जीरकपुर, (मोहाली)
पिछली बार कुल्लू क्षेत्र के पाषाण अभिलेखों से आपका परिचय करवाया था, अब की बार कांगड़ा की ऒर चलते हैँ। कागड़ा जिसे त्रिगर्त के नाम से भी जाना जाता था, क्योंकि इधर से सतलुज, व्यास व रावी नदियां बहती हैँ तथा इसका सम्बन्ध महाभारत से भी रहा बताया जाता है। कांगड़ा राज्य की स्थापना महाभारत काल के राजपूत कटोच राजा सुशर्मा चंद द्वारा की गई थी। प्राचीन व विशाल रियासत होने के कारण ही इसकी माली हालत किसी से छिपी नहीं थी। आर्थिक स्थिति अच्छी होने के कारण ही इस क्षेत्र में लूट पाट के साथ आक्रमण भी होते रहे। दूसरे यहाँ के प्रसिद्ध मंदिरों (बृजेश्वरी देवी व माता ज्वाला जी) में भी भारी धन दौलत व सोना चांदी अथा में था। 1009 ईस्वी में महमूद गजनी द्वारा आक्रमण करके लूट पाट की गई, फिर 1360 ईस्वी में फ़िरोज़ शाह तुगलक और 1540 ईस्वी में शेर शाह सूरी ने चढ़ाई करके भारी धन दौलत यहाँ से लूट कर ले गया। क्योंकि यहाँ का कागड़ा किला, जिसे नगर कोट के नाम से भी जाना जाता है, बहुत ही मज़बूत और उस समय का सबसे विशाल व धन दौलत का असली गढ़ था, इसी लिए सबकी नज़रे इधर ही टिकी व इसे पाने के लिए लालियत रहती थीं। आखिर 1620 ईस्वी में अकबर का बेटा जहांगीर किसी तरह किले को जीतने में सफल हो गया और उसने कांगड़ा पर अपना अधिकार कर लिया। बाद में 1789 ईस्वी में राजा संसार चंद ने मुग़ल शासक को पछाड़ कर फिर से किले पर अपना अधिकार कर लिया था। संसार चंद ने अपने शासन काल में कला और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए कलाकारों को कई प्रकार की सुविधाएँ प्रदान कर रखी थीं, फलस्वरूप चित्र कला, जो कि कागड़ा कलम के नाम से आज विश्व भर में प्रसिद्ध है, सब उन्हीं की ही देन बताई जाती है। इस समस्त विकास व धन दौलत को देखते हुए 1806 ईस्वी में गोरखों ने भी कांगड़ा पर आक्रमण कर दिया था और उन्होंने बुरी तरह से क्षति पंहुचाई थी, जिससे तंग आकर राजा संसार चंद को सिख शासक राजा रणजीत सिंह से सन्धि करनी पड़ी और 1809 को सन्धि के अनुसार राजा संसार चंद को रणजीत सिंह के अधीन रहना पड़ा व रणजीत सिंह ने बाद (1828ईस्वी) में किले पर अपना अधिकार जमा लिया था। बाद में अंग्रेज़ सिख युद्ध होने पर 1846 ईस्वी में कांगड़ा ब्रिटिश शासन के अधीन हो गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात जब 1966 में पंजाब का पुनर्गठान किया गया तो कागड़ा हिमाचल में आ गया। वर्ष 1973 में विशाल कागड़ा क्षेत्र के तीन जिले बना दिए गए और हमीरपुर व ऊना इससे अलग हो गए।
आज कांगड़ा का मुख्यालय धर्मशाला है, जो कि हिमाचल का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है, इसके अतिरिक्त पालमपुर, बैजनाथ, अंद्रेटा, पोंगा डैम, ज्वाला जी, मसरूर व किला नूरपुर आदि अन्य पर्यटन स्थल हैँ। कांगड़ा क्षेत्र से मिलने वाले कुछ प्रसिद्ध पाषाण अभिलेख :
1.कनिहारा अभिलेख
अभिलेख श्रेणी :पाषाण। अभिलेख प्रकार : चट्टान अभिलेख।
अभिलेख काल : पहली या दूसरी शताब्दी ई. पू .
अभिलेख लिपि :ब्राह्मी व खरोष्ठी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान :
गांव कनिहारा, निकट धर्मशाला, कांगड़ा।
अभिलेख विवरण : कागड़ा के गांव कनिहारा का यह दो पंक्तियों का अभिलेख एक चट्टान पर उकेरा हुआ है। इस द्विलिपि अभिलेख की पहली पंक्ति खरोष्ठी लिपि में है और दूसरी ब्राह्मी लिपि में, वैसे दोनों पंक्तियों में एक ही बात लिखी मिलती है अर्थात ” कृषभ्यसस आराम” जिसका अर्थ कृषभ्यसस का उद्यान या सामुदायिक स्थल होता है, जब की विद्वान कनिघन्म ने उद्यान व सामुदायिक स्थल को मठ कहा है। दूसरे नीचे ब्राह्मी लिपि वाली पंक्ति में एक अतिरिक्त शब्द “मेदंगिस्य” भी मिलता है, जिसका अर्थ मोटा शरीर होता है, पता नहीं इसको साथ क्यों लिखा गया है, अभी इस सम्बन्ध में कुछ स्पष्ट जानकारी नहीं है। लिखित दोनों पंक्तिओं के साथ शुभ संकेत अर्थात प्रथम पंक्ति के साथ स्वस्तिक देखा जा सकता है और दूसरी के साथ पद चिन्ह देखने को मिलते हैँ।
2.पथियार अभिलेख:
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार :चट्टान अभिलेख।
अभिलेख काल : पहली या दूसरी शताब्दी ई. पू .
अभिलेख लिपि :ब्राह्मी व खरोष्ठी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान: गांव पथियार, कांगड़ा।
अभिलेख विवरण : पथियार का यह अभिलेख भी उपर्युक्त कनिहारा अभिलेख जैसे ही दो पंक्तियों का ही है। पहली पंक्ति जो की ब्राह्मी लिपि में है के शुरू में शुभ चिन्ह, (पद चिन्ह) व स्वस्तिक चिन्ह बने देखे जा सकते हैँ, अभिलेख में लिखा है “वायलस पुकरिणी” जिसका अर्थ कमल तालाब रहता है। दूसरी नीचे वाली खरोष्ठी लिपि की पंक्ति में भी यही लिखा है, जो एक अतिरिक्त शब्द को जोड़ा गया है, वह रथीन पढ़ा जाता हैl रथीन शब्द, पी एल वोगल के अनुसार उपनाम हो सकता है, जैसे रथ वाला या रथ का मालिक आदि। यह शिलालेख भी कनिहारा शिलालेख जैसा ही है और उसके निकट ही पड़ता है, दोनों शिलालेखों से सामूहिक तालाब व उद्यान की जानकारी मिलती है भी, जिनका सामूहिक रूप में जल व सैर गाह के लिए प्रयोग किया जाता रहा होगा l
3.जैन भगवान ऋषभ नाथ अभिलेख
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार : पाषाण प्रतिमा अभिलेख।
अभिलेख काल :9 वीं शताब्दी (854ईस्वी)
अभिलेख लिपि : शारदा।
अभिलेख प्राप्ति स्थान: इंदेश्वर मंदिर कांगड़ा किला, कांगड़ा।
अभिलेख विवरण :भगवान ऋषभ नाथ अभिलेख जो कि ग्रेनाइड पत्थर की, भगवान ऋषभ नाथ की (खंडित) प्रतिमा के आधार पर उकेरा हुआ है, में कुल मिला कर शारदा लिपि की आठ पंक्तियाँ हैँ। भगवान ऋषभ देव को पदमासन( ध्यान) मुद्रा में बैठे दिखया गया, जिसमें बाल उनके कंधों पर लटके दिखते हैँ और एक बैल आकृति को बैठे नीचे देखा जा सकता है। इस प्रतिमा की स्थपना आचार्य अभय चन्द्र के शिष्य, भिक्षु अमल चन्द्र द्वारा की गयी थी।
4.बैजनाथ मंदिर अभिलेख (प्रथम)
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेखप्रकार :शिलालेख।
अभिलेख काल: 13वीं शताब्दी के मध्य।
अभिलेख लिपि :शारदा, भाषा संस्कृत।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : शिव मंदिर बैजनाथ, कांगड़ा।
अभिलेख विवरण : 1204 ईस्वी के शिखर शैली में बने इस प्राचीन मंदिर के सभा मंडप की दीवार पर दो लेख शिलालेख देखे जा सकते हैँ। पहले प्राचीन शिलालेख की लिपि शारदा व भाषा संस्कृत है। इस शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण 13 शताब्दी में ईस्वी सन 1204 (सं 1126) में यहाँ के दो व्यापारी भाईयों अहुका व मन्युका द्वारा, राजा जय चन्द्र के काल में करवाया गया था। शिलालेख में वैद्यनाथ (भगवान शिव) की स्तुति के साथ राजा जय चन्द्र का भी उल्लेख मिलता है।
5.बैजनाथ मंदिर अभिलेख (द्वितीय)
अभिलेख श्रेणी : पाषाण।
अभिलेख प्रकार :शिलालेख।
अभिलेख काल :18 वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि :टांकारी, बोली कागड़ी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान :वैद्यनाथ (शिव मंदिर), बैजनाथ, कांगड़ा।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : सभा मंडप दीवार, शिव मंदिर बैजनाथ।
अभिलेख विवरण :बैजनाथ के शिखर शैली के इसी मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष 1786 ईस्वी में कागड़ा के राजा संसार चंद द्वारा करवाया था जिसका प्रमाण मंदिर में लगा दूसरा शिलालेख है, जो टांकरी लिपि व कागड़ी बोली में लिखा है। इस टांकारी वाले अभिलेख से ही 1204 ईस्वी के बने प्राचीन मंदिर की जानकारी के साथ यह भी बताया गया है कि इससे पूर्व यहाँ प्राचीन मंदिर था, जिसमें शिव लिंग (स्वयंभू शिवलिंग) स्थापित था और इसको किरा ग्राम के नाम से जाना जाता था। शिलालेख के अंत में वास्तुकार व कई एक स्थानीय दान करता व्यपारियों के नाम भी पढ़ने को मिलते हैँ।
- जहांगीर दरवाजा अभिलेख
अभिलेख श्रेणी :पाषाण।
अभिलेख प्रकार: शिलालेख।
अभिलेख काल: 17 वीं शताब्दी।
अभिलेख लिपि:फारसी।
अभिलेख प्राप्ति स्थान : कांगड़ा किला (नगरकोट गढ़), जहांगीर दरवाज़ा, कांगड़ा।
अभिलेख विवरण :1620 ईस्वी में अकबर के बेटे द्वारा नगर कोट के किले को जीत कर अपने अधिकार में करने की खुशी में, अपने नाम से (जहांगीर द्वार) का निर्माण करवाया था और इसी द्वार पर अपनी जीत की खुशी (चर्चा) को, इस अभिलेख में व्यक्त किया गया है। जहांगीर द्वार मुग़ल वास्तु कला का एक प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिससे उस समय की मुग़ल नीति के साथ सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक जानकारी का आभास भी हो जाता है। यह दरवाजा किले के अंदर की ऒर अहाणी और अमीरी दरवाजों के बाद आता है।



