हिमाचल : पाषाण अभिलेख, सन्दर्भ कुल्लू – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉ. कमल के. प्यासा – जीरकपुर, (मोहाली )

पाषाण अभिलेखों के अंतर्गत वे सभी अभिलेख आ जाते हैं जो कि पत्थरों की कठोर सतह (पत्थर के विभिन्न स्वरूपों या आकृतियों) पर उत्कीर्ण किए होते हैं। इन विभिन्न पाषाण अभिलेखों का आगे फिर से वर्गीकरण किया जा सकता है, जिसके अंतर्गत आ जाते हैं, हमारे शिलालेख, पाषाण चट्टान अभिलेख, पाषाण प्रतिमा अभिलेख, पाषाण दीवार अभिलेख ,पाषाण स्तंभ अभिलेख, फुव्वाराअभिलेख व बरसेला (स्मृति शिलालेख) आदि।

प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों से मिलने वाले पाषाण अभिलेखों के वर्णन के अंतर्गत जो कुछ यहां प्रस्तुत किया जा रहा है, उसमें निम्न मुद्दों को लिया गया है : अर्थात अभिलेख का प्रकार, अभिलेख का नाम, अभिलेख का कालखंड, अभिलेख की लिपि/भाषा, अभिलेख प्राप्ति स्थान व उस अभिलेख का विषय विवरण आदि। मिलने वाले अभिलेखों की संख्या के हिसाब चंबा, मंडी और कांगड़ा के क्षेत्र कुछ आगे ही प्रतीत होते हैं।

जिलों के अनुसार देखे, सुने व पढ़े गए अभिलेख कुछ इस प्रकार से हैं। सबसे पहले कुल्लू क्षेत्र को ले लेते हैं क्योंकि इधर पाषाण अभिलेखों की संख्या में कुछ कम देखी गई है जिससे यह आलेख भी सीमा में रहेगा।

ऐतिहासिक क्षेत्र कुल्लू, महाभारत काल से ही पाण्डवों का एक परिचित स्थल रहा है, इस सम्बन्ध में कई पौराणिक दृष्टांत मिलते हैं। वहीं कुलूत नामक क्षेत्र का वर्णन महाभारत व पुराणों से भी तो मिलता है। इसी क्षेत्र से प्राप्त एक ताम्बे (प्रथम शताब्दी) के सिक्के से भी यह जानकारी मिलती है, कि यहाँ किसी विरयासा नामक शासक का राज्य था। सिक्के में लिखें अभिलेख से इस बात कि पुष्ठी हो जाती है तथा वह आलेख इस तरह से पढ़ा गया है :

“राजना कोलुत्स्य विरायसस्य”। ऐसा भी बताया जाता है कि इस क्षेत्र में पहले छोटे छोटे राणों व ठाकुरों का ही अधिकार रहता था, जिन्हें पहली शताब्दी के आस पास राजा विहंगामणि पाल ने पछाड़ कर, अपने अधिकार में कर लिया था, और उसका शासन लम्बे समय तक चलता रहा। उस समय कुल्लू की राजधानी नगर थी, जो बाद में नगर से बदल कर जगत सुख को स्थानात्रित कर दी गयी थी। पाल शासकों का शासन लगभग 1500 वर्षों तक चलता रहा। पाल वंश के पश्चात सिंह वंश का आरम्भ हुआ। 1660 ईस्वी में राजा जगत सिंह ने सुल्तानपुर, कुल्लू को अपनी राजधानी बना कर महल भी बना लिया। यही महल एक ऒर सरवरी नदी के सिरे पर व दूसरी ऒर पहाड़ी से नीचे सामने बहती ब्यास नदी के सामने स्थित है। यहीं पर राजा जगत सिंह ने रघुनाथ जी का मंदिर बनवाकर, अयोध्या से भगवान राम कि प्रतिमा मंगवा कर स्थापित करवाई थी। 1846 ईस्वी में अंग्रेज़ों और सिखों के युद्ध के परिणाम स्वरूप कुल्लू अंग्रेज़ों के अधिकार में चला गया और इसे पंजाब के कांगड़ा में शामिल कर दिया गया। बाद में प्रथम नवम्बर 1966 को पंजाब के पुनर्गठन पर कुल्लू को हिमाचल में शामिल कर दिया गया।

आज कुल्लू हिमाचल राज्य का एक प्रसिद्ध व समृद्ध संस्कृति वाला नगर व जिला है।

कुल्लू से प्राप्त अभिलेख :

  1. डूंगरी हिडिम्बा मंदिर अभिलेख ।

अभिलेख श्रेणी : काष्ठ ।

अभिलेख प्रकार :काष्ठ अभिलेख।

अभिलेख काल : 16 वीं शताब्दी।

अभिलेख लिपि : टांकारी।

अभिलेख प्राप्ति स्थान : डूंगरी, हिडिंम्बा मंदिर मनाली, कुल्लू।

अभिलेख विवरण : पैगोड़ा शैली के इस मंदिर का निर्माण राजा बहादुर सिंह द्वारा 1553 ईस्वी (1551 -1553) को करवाया गया था। चार छतों के इस मंदिर की सबसे ऊपर वाली छत शंकु आकर की टीन की बनी है, जब कि नीचे वाली तीनों पीरा- मिडकार देवदार लकड़ी की बनी हैँ। मंदिर का अभिलेख जो की लकड़ी पर टांकरी लिपि में उकेरा गया है, वह मंदिर प्रवेश द्वार के दाँई ऒर देखा जा सकता है। अभिलेख से राजा बहादुर सिंह द्वारा मंदिर के निर्माण व भूमि दान सम्बन्धी जानकारी मिलती है।

  1. त्रिपुरा सुंदरी माता मंदिर अभिलेख

अभिलेख श्रेणी :काष्ठ।

अभिलेख प्रकार :

काष्ठ अभिलेख।

अभिलेख काल : 16 वीं शताब्दी।

अभिलेख लिपि :टांकारी।

अभिलेख प्राप्ति स्थान : त्रिपुरा सुंदरी मंदिर, नग्गर मनाली, कुल्लू।

अभिलेख विवरण : पैगोड़ा शैली के तीन छतों वाले इस मंदिर का निर्माण 16 शताब्दी में राजा यशोध पाल द्वारा करवाया गया था, लकड़ी के बने इस मंदिर की तीनों में से सबसे ऊपर की छत कोन की तरह शंकु आकर लिए है और नीचे वाली दोनों पिरामिड रूप की हैँ। मंदिर में किया लकड़ी नक्काशी का कार्य देखते ही बनता है। स्थापित मुख्य प्रतिमा, त्रिपुरा सुंदरी की, 30 सें.मी.लम्बी अष्ठधातु की बनी है, जिसे 21 देव मुखौटों से सजाया गया है। काष्ठ अभिलेख मंदिर के गर्भ गृह में देखा जा सकता है। अभिलेख जो की टांकारी लिपि में लिखा है, से मंदिर के निर्माण सम्बन्धी उल्लेख मिलता है।

  1. गौरी शंकर मंदिर अभिलेख

अभिलेख श्रेणी : पाषाण।

अभिलेख प्रकार :शिलालेख।

अभिलेख काल :12 वीं शताब्दी।

अभिलेख लिपि : ब्राह्मी।

अभिलेख प्राप्ति स्थान : गौरी शंकर मंदिर, नग्गर, मनाली, कुल्लू l

अभिलेख विवरण :12 वीं शताब्दी का (गुर्जर प्रतिहार वस्तुकला लिए) शिखर शैली का छोटा सा गौरी शंकर मंदिर जो कि नग्गर कैसल के पास नीचे की ऒर देखा जा सकता है, में भगवान शिव व शक्ति को दिखाया गया है, मंदिर का जीर्णोद्धार वर्ष1959 में किसी जयपुरी द्वारा करवाया बताया जाता है। मंदिर का शिलालेख जो कि 12 वीं शताब्दी से सम्बंधित है व गर्भ गृह में स्थापित है, से मंदिर के निर्माण काल, भगवान शिव की स्तुति, उस समय की अन्य धार्मिक गतिविधियों के साथ अन्य धार्मिक विचारों की भी जानकारी मिलती है। नग्गर का यह गौरी शंकर मंदिर, भरतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है।

  1. राम मंदिर अभिलेख, मणिकर्ण।

अभिलेख श्रेणी : पाषाण।

अभिलेख प्रकार :शिलालेख।

अभिलेख काल : 17 वीं शताब्दी।

अभिलेख लिपि : टांकरी,

बोली कुल्लूवी।

अभिलेख प्राप्ति स्थान :राम मंदिर, मणिकर्ण, कुल्लू।

अभिलेख विवरण : मणिकर्ण का शिखर शैली में बना, 17 शताब्दी का यह राम मंदिर जिसका निर्माण कुल्लू के राजा जगत सिंह द्वारा 1550 -1560 ईस्वी में करवाया था, में अयोध्या से लाई भगवान रामचंद्र की प्रतिमा को स्थापित किया गया था। मंदिर से सम्बंधित शिलालेख को, मंदिर के ही गर्भ गृह में भगवान राम जी की प्रतिमा के निकट स्थापित किया देखा जा सकता है। शिलालेख को टांकारी लिपि के साथ कुल्ल्वी बोली में लिखा गया है। जिसमें भगगवान रामचंद्र जी से जुड़े स्थान व उन विभिन्न स्थानों की यात्रा की जानकारी दी गई है। इसी में राजा जगत के बारे में भी बताया गया है कि उन्होंने कैसे कैसे और कहाँ कहाँ, भगवान रघुनाथ की मूर्तियों की स्थापना की थी।

  1. अभिलेख विश्वेश्वर (बशेश्वर )मंदिर, बजौरा।

अभिलेख श्रेणी :पाषाण।

अभिलेख प्रकार :पाषाण स्तम्भ लेख।

अभिलेख काल :17वीं शताब्दी।

अभिलेख लिपि :टांकारी, भाषा संस्कृत।

अभिलेख प्राप्ति स्थान : विश्वेश्वर मंदिर बजौरा, कुल्लू।

अभिलेख विवरण : 8 वीं – 9 वीं शताब्दी (प्राचीन शिखर शैली) के विश्वेश्वर महादेव मंदिर में टांकारी लिपि का संस्कृत लिखा अभिलेख जो कि 1673 ईस्वी में मण्डी के शासक राजा श्याम सेन द्वारा स्थापित करवाया गया था, में उसके द्वारा भगवान शिव को मंदिर परिसर के लिए दी गई भूमि व वर्णन किया गया है,जो कि टांकारी लिपि में संस्कृत भाषा के लिखा है, को पढ़ने से पता चलता है।

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