जल्लाद बुढ़िया — जयवन्ती डिमरी

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जयवन्ती डिमरी

आज सुबह शोरगुल से फिर उसकी नींद खुल गयी। खिड़की खोलकर बाहर झांका। बिल्कुल घुप्प अंधेरा था। उसने जी-भर कर इस मोहल्ले को कोसा। चार पैसे बचाने के चक्कर में वह न जाने कैसे जाहिल गँवारों की बस्ती में रहने चला आया। ठीक ही कहते हैं – बड़ों की बात का अर्थ और आँवले का स्वाद बाद में ही पता चलता है। उसके पिताजी ने उसे हिदायत दी थी। ” बेटा कमरा पास पड़ोस देख कर लेना। दो पैसे ज्यादा देने पड़े कोई बात नहीं लेकिन संगत सोहबत अच्छी होनी चाहिये। “ उसी की अकल मारी गयी थी जो सौ दो सौ रुपये बचाने के चक्कर में इन गँवारों की बस्ती में रहने चला आया। फैक्टरी की उसकी नौकरी है, सुबह से शाम तक का समय तो कमरे से बाहर ही निकलता है। रात को सिर्फ सोने के लिये वह कमरे में आता है पर ये भागवान पास पड़ोस वाले सोने दे तभी – न। ईंट की चार दीवारें खड़ी कर देने भर से इंसान बड़ा नहीं हो जाता, सभ्यता, तहजीब, आचार विचार इंसान को बड़ा बनाते हैं। जेब में चार पैसे आ गये, चार दीवारें खड़ी कर दी और हो गये मकान मालिक। कमरों के ऊपर कमरों की मंजिले चढ़ गयी और उसके जैसे जरूरतमंद किरायेदार आ गये। अब इनके रात दिन के मच्छी बाजार से किरायेदारों की नींद टूटती है तो टूटे। वह आज कमरा छोड़ दे, कल कोई दूसरा जरूरतमंद किरायेदार आ जायेगा।

शोरगुल बढ़ता ही जा रहा था। नींद तो अब उसे आयेगी नहीं। वह कमरे से बाहर आ गया। बाजू के कमरे का किरायेदार भी शोरगुल सुनकर बाहर आ गया था।

” आज सुबह सुबह कौन सी नयी मुसीबत आ गयी ? “

” सामने के मकान में झगड़ा हो रहा है “ औरतों के झगड़ने की आवाज अब साफ सुनायी दे रही थी।

” इन औरतों को झगड़ने के लिये क्या सारा दिन कम था ? थोड़ी देर से कार्यक्रम शुरू करती तो बेचारे मोहल्लेवालों को कुछ देर और सोने के लिये मिल जाता। “ उसने अपनी झल्लाहट पड़ोसी से साझा की।

” बहुत ही जल्लाद बुढ़िया है। बेटे के मरने के बाद तो और भी बेलगाम हो गयी है। पहले थोड़ा बहुत बेटे का डर था अब तो कोई बोलनेवाला नहीं। बेचारी बहू की दुर्गत है। “ पड़ोसी बोला। बुढ़िया के बारे में उससे ज्यादा कौन जानता होगा ? इस कमरे में आने से पहले वह बुढ़िया के मकान में ही किरायेदार था। बुढ़िया के जवान बेटे की मौत का वह हादसा याद कर आज भी उसके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। ऐसा हट्टा कट्टा छह फुटा गबरू नौजवान। डी॰टी॰सी॰ की बस में कंडक्टर था। जब भी वह ड्यूटी पर होता, उससे टिकट के पैसे न लेता।

उस दिन उसकी बस में सुबह की ड्यूटी थी। एक ट्रक और बस की टक्कर हुयी तो कंडक्टर और ड्राइवर के अलावा बोनट पर बैठे दो लोगों की घटनास्थल पर ही मौत हो गयी थी। बुढ़िया के बेटे की लाश घर लाने लायक भी नहीं रह गयी थी। पल भर में हँसता खेलता परिवार उजड़ गया।

इस हादसे की उदासी से उबरने में उसे काफी समय लगा। लेकिन बुढ़िया की हरकतों से धीरे धीरे आस पड़ोस के लोगों की हमदर्दी गुस्से में तब्दील हो रही थी।

उस दिन सीढ़ियों से नीचे उतरते हुये उसने बुढ़िया और मातमपुर्सी के लिए आयी हुयी एक महिला की बात चीत सुनी।

” जवान बहू की तो बड़ी जिम्मेदारी से। थारी कोठरियों में तो जवान लौंडे दिक्खें। “ महिला ने उसकी ओर देखते हुये कहा।

” जवान लौंडों की क्या बात से? कोई आँख उठा के तो देखे म्हारी बहू पे। आँखे नी फोड़ दूँ तो ना बात रही। “

उन दोनों औरतों की बातचीत का उस पर यह असर हुआ कि अगले महिने ही उसने कमरा बदल लिया। लेकिन आते जाते कभीकभार बुढ़िया के दर्शन कभी गली में तो कभी परचून की दुकान पर हो ही जाते। वह कितना भी बचकर निकलने की कोशिश क्यों न करे, बुढ़िया उसे रोक ही लेती। बुढ़िया के बड़े पोते की उम्र मुश्किल से तेरह-चौदह साल की रही होगी। उसकी नौकरी लगाना बुढ़िया का नंबर एक एजेंडा था।

” बेटा म्हारे पिरथीराज की नौकरी लगा दे से। तू तो फैक्टरी में बड़ा चाकर से। म्हारे पिरथी का भी भला कर दे से।“

बुढ़िया को उसने एक दो बार समझाने की कोशिश की। चौदह साल के नाबालिग लड़के को फैक्टरी में नौकरी पर नहीं लगा सकते। यह गैरकानूनी है। फिर आठवीं फेल को क्या नौकरी मिलेगी? वह खुद भी फैक्टरी में एक मामूली मुलाजिम है। अभी उसके पोते की पढ़ने की उम्र है। एक बार आठवीं मे फेल हो गया,, कोई बात नहीं। दुबारा इम्तहान दे देगा। “

” अरे बेटा सकूल से तो पिरथी का नाम कट गया से।“

” अम्मा आजकल ओपन बोर्ड से भी इम्तहान दे सकते हैं। आप कहें तो मैं पता करूं ?’’ लेकिन बुढ़िया की सूई तो पिरथीराज की नौकरी पर अटकी हुयी थी। बुढ़िया पर उसकी नसीहत का कोई असर न होता। ऐसा नहीं कि कम उम्र का पेंच बुढ़िया को पता नहीं था। डी॰टी॰सी॰ में उसके पोते पिरथीराज को बालिग होने पर नौकरी मिलने का आश्वासन मिला था। बहू को नौकरी शायद मिल जाती लेकिन जवान बहू को घर से बाहर भेजना ऐसा-अनर्थ भला बुढ़िया कैसे कर सकती थी।

अब वह भी होशियार हो गया है। कह देता है पिरथी की नौकरी के लिए कोशिश कर रहा है। इससे कम से कम उसे फैक्टरी के लिये देर तो नहीं होती वरना दो बार तो बुढ़िया ने उसकी बस ही छुड़वा दी थी।

छह बज गये थे। अब तक दुकान में दूध आ गया होगा। दूध लेने वाले ग्राहकों की लाइन में बुढ़िया का एक किरायेदार लड़का भी खड़ा था। उसने यौं ही उससे पूछ लिया।

” आज सुबह सुबह तुम्हारी बिल्डिंग में क्या महाभारत हो रही थी? इन्होंने तो नींद हराम कर दी है। “

” बुढ़िया की मत मारी गयी है। कंजूस तो यह थी ही लेकिन जब से इसके बेटे की मौत हुयी है बिल्कुल पगला गयी है। सुबह से शाम इसकी चक चक खतम होने का नाम ही नहीं लेती। सुना है बच्चों को पेटभर खाना तक नहीं देती। बेचारी बहू ने कल बुढ़िया से छिपकर एक पैकेट दूध मँगवा लिया। बुढ़िया ने कूड़े में दूध का पैकेट देख लिया। बस फिर क्या था ? हो गयी शुरू। किरायेदारों की अलग आफत है। तुम्हारे मकान में कोई कमरा खाली हो तो बताना। होटल में काम करता हूं तो क्या वहाँ से रोज माचिस ही लाता रहूँगा? रोज मुझ से माचिस माँगने आ जाती है पैसे के ऊपर साँप बनकर बैठी है।“

दुकानदार ने हांमी भरी। इस गली में उसकी सबसे पुरानी दुकान है, बुढ़िया को उससे ज्यादा अच्छी तरह कौन जानता होगा। कहने लगा:

” धरमराज के मुआवजे में इन्हे पूरे चार लाख रूपये मिले हैं। बहू को पेंशन मिल रही है सो अलग। आठ दस हजार रूपया मकान का किराया है। लेकिन बहू बच्चे पेटभर खाने को तरस रहे हैं। ”

सुबह जल्दी उठने का यह फायदा हुआ कि वह जल्दी तैयार हो गया। दस मिनट पहले ही वह फैक्टरी के लिए निकल गया। सोचा बस स्टाप पर अखबार भी खरीद लेगा। सात बजे की बस में ज्यादा भीड़ भी नहीं होती, बैठने के लिए सीट भी मिल जायेगी।

गेट से बाहर निकलते ही बुढ़िया के दर्शन हो गये। सुबह की उसकी सारी झल्लाहट बुढ़िया पर निकल पड़ी।

” क्यों ताई आज तो बड़े तड़के जग ली। हवाखोरी भी कर आयी। जरा पास पड़ोस का भी खयाल कर लिया करो। “

” क्या करूँ बेटा मैं तो बड़ी परेसान से। म्हारी बहू को तो जरा बित्ते भर की अकल ना से। बस हवा में उड़ी जाये। जमीन ना देखे है।“

” जमीन तो तब ना देखेगी ताई जब तुम उसे जमीन देखने दोगी। खाने पीने को कुछ न दोगी तो हवा में ही उड़ेगी। बहू क्या, कल को तुम्हारे पोते पोती भी हवा में उड़ेंगे।“

” तुझसे या किसने कही मैं अपनी बहू को खाने को ना दूं ? “ बुढ़िया जैसे इस इल्जाम से तिलमिला गयी थी। अपने बहू, पोते पोती का दरद मैं ना जानू दुनियां जाने है क्या ? मन्ने तू ये बता।“ उसकी आँखांे की कोर गीली हो गयी थी।

” दुनिया तो ताई यही जाने है कि तुम्हारे पास पैसे की कमी नहीं पर पैसे का ताई तुझे कुछ ज्यादा ही मोह हो गया दीखता है। अपने बुढ़ापे का सोच धरम करम में मन लगाओ, अपने परलोक की सोचो। “

” ऐसा न बोल बेटे, परलोक की न बोल। “ बुढ़िया उसकी बात बीच में ही काट बिलबिलाती सी बोली।

” जे मैं भी परलोक सिधार गयी तो म्हारी बहू और बालकूँ का क्या होगा से। म्हारी बहू तो निरी गऊ है गऊ। धरा पैसा क्या होये है तू ही बोल। आज है तो कल नी। इब जो कमाने वाला था सो तो चला गया। अब तू मैं बस ये ही सोचू हूँ कुछ पैसा जमा नी को कर लूँ जो म्हारे बाद मेरी बहू और उसके बालकों के काम जो आ सके। तू करे म्हारे से धरम करम की बात। जिसका जवान पूत लील हो गया से वाकी पीर क्या होये सेे ये तू नी जाणेगा। म्हारे आगे तो रात दिन म्हारे बिन बाप के पोते पोती की सूरत चमके से। कच्ची उमर में बेबाप के हो लिये। आगे पीछे कोई मददगार कू नी को से। तू तो फैक्टरी में बड़ा चाकर से। “ वह दीन हीन स्वर में बोली, ” म्हारे पिरथी कू नौकर लगा दे से। सारा दिन मारो मारो फिरे है। सोहबत बिगड़ ली छोरे की। आज सुबह भी झगड़ा इसी बात पर हुआ से। मन्ने वाकी महतारी को बोलो वा को छुप छुप के पैसे ना को दे। जीभ चटोरी हो गयी है छोरे की। कहीं काम धन्धे पर लग गया ते इधर उधर मारो मारो नी फिरेगा से। इसका ध्यान रखना से बेटा। थारी बड़ी मेहरबानी होगी से। “ बुढ़िया ने उसके आगे दोनों हाथ जोड़ दिये।

” ताई हाथ न जोड़ो। हाथ जोड़कर मुझ पर पाप न चढ़ाओ। हाथ तो तुम्हें हम जोड़ेगे। मैं आज ही साहब से बात करूँगा। “

जरूर करिये बेटा। थारो अहसान जिन्दगी भर ना भूलूं से। “ बुढ़िया के स्वर का वह कातर भाव। उसके गले में फांस सी अटक गयी।

उसने बुढ़िया को गौर से देखा। उसकी कमर काफी झुक गयी थी। पहले की तुलना में दुबली भी हो गयी थी। उसने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की।

” हे ईश्वर ताई को लम्बी उमर देना। अभी उस पर अपनी बहू और बिन बाप के बच्चों की बड़ी जिम्मेदारी है। “ आज ही वह सिंह साहब से पिरथीराज की नौकरी के लिये बात करेगा। आजकल डेली वेज पर लड़के रखे जा रहे हैं। हो सकता है पिरथीराज की भरती डेलीवेजर में हो जाये।

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