कागज़ की नांव — डॉ उषा बन्दे

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डॉ उषा बन्दे

बाहर मुसलाधार बारिश हो रही थी। लंच ब्रेक की घंटी बजी। बच्चों को ताकीद मिली कि लंच ब्रेक में कोई भी बाहर नहीं जाएगा। कक्षा में बैठकर ही खाना खाएं। कुछ देर तक तो कक्षाओं में चुप्पी रही जब तक बच्चे खाना खा रहे थे। फिर शोर, शरारत, उछल-कूद शुरू हुई। इतना शोर मानों कमरे की छत उड़ जाएगी । छटी कक्षा स्टाफ रूम के नज़दीक थी। शोर सुनकर एक अध्यापक आए। डांटकर सबको चुपचाप बिठाया और चले गए। चुप बैठना क्या बच्चों के लिए संभव होता है?

“बोर हो गए यार,” करण बोला । धीरे से उसने कॉपी का एक पन्ना फाड़ा। हवाई जहाज़ बनाया और ऊपर उड़ाया। बच्चों ने अपने सिर पर मंडराता कागज का हवाई जहाज़ देखा और एक बारगी कक्षा में फिर “ओ…” का शोर गूंजा। देखते-देखते अन्य बच्चों ने भी कॉपी के पृष्ठ फाड़े। कुछ ने हेलीकॉप्टर, कुछ ने हवाई जहाज़ और कुछ ने बाण बनाए और पूरे कमरे में सिर पर सफेद कागज़ उड़ते दिखे। जयराज ने छोटी-सी नांव बनाई, अपने लंच-बॉक्स में वर्षा का पानी भरा और उस पर नांव तैराई। संजू ने कागज़ को तोड़-मरोड़ कर गोल किया, गेंद बनाई और किसी को निशाना बनाया।

लंच ब्रेक के बाद मैडम कक्षा में आईं तो देखती क्या है कि कुछ एरोप्लेन हवा में तैर रहे हैं, पानी में भीगी जयराज की नांव कोने में पड़ी है और पूरी कक्षा में सफेद कागज़ बिखरे पड़े हैं। इतने में एक हेलीकॉप्टर आया और हल्के से मैडम के सिर पर बैठ गया। कक्षा में दबी-दबी-सी हंसी।

कमल कक्षा का मॉनिटर था। मैडम ने उसे बुलाया। कमल सकपका गया। चुपचाप सिर झुकाए खड़ा रहा।

“कमल, ये क्या चल रहा है?” मैडम ने पूछा। कमल ने कुछ नहीं कहा। क्या कहता?

“चलो, अपने साथ संजू और करण को लो और सारे कागज़ उठाकर मेरे टेबल पर रखो।”

मेज पर कागजों का ढेर लग गया। “अब किशन और सुरेश यहां आओ। इन कागजों को खोलकर सीधा करो।” दोनों ने सारे कागज़ सीधे किए और मैडम ने एक-एक पन्ना सब बच्चों को दिया। बच्चे गुमसुम बैठे थे। ये क्या? उन्हें तो लगा था कि मैडम डांटेगी। पर उन्होंने कुछ नहीं कहा।

“बच्चों, अब आप लोगों को सज़ा। पनिशमेंट,”मैडम ने कहा। बच्चे डर गए थे… न जाने कैसी सज़ा है यह। “अब आप सब इन्हीं कागज़ों के टुकड़ों पर निबंध लिखेंगे। हमारा विषय है ‘लंच ब्रेक में वर्षा ‘।”

बच्चे लिखने लगे। किसी ने लिखा, कोई लिख न पाया। घंटी बज गई। मैडम ने कहा, “कल सुबह प्रार्थना के बाद छठी कक्षा के विद्यार्थी छोटा-सा निबंध पढ़ेंगे । शीर्षक है, ‘कागज़ क्यों और कैसे बचाएं।’ आप में से किसी को भी पूरे स्कूल के सामने इस विषय पर बोलना पड़ सकता है। अतः सब तैयार होकर आना।”

मैडम तो चली गईं पर बच्चे बेचैन हो गए। सब आपस में एक-दूसरे से पूछ रहे थे… कागज़ क्यों बचाना, यार? कैसे बचाना? शाम को करण आशा दीदी के घर पढ़ने के लिए गया। उस समय आशा दीदी मेज की दराज से छोटे-छोटे कागज़ निकालकर उन्हें इकट्ठा करके स्टेपल कर रहीं थीं। करण बड़ी लगन से उन्हें देख रहा था।

“आ गए, करण?” उसे देखते ही आशा दीदी बोलीं। “चलो कॉपी निकालो। पर हाँ, पहले पड़ोस की आंटी को ये फोन नम्बर दे आओ,”कहकर आशा दीदी ने स्टेपल किए कागजों में से एक टुकड़ा निकाला, उस पर फोन नम्बर लिखा और करण को पकड़ाया। करण सोचने लगा, इतनी अमीर दीदी, कागज को लेकर इतनी कंजूसी क्यों करती है?

“दीदी, ये छोटे-छोटे कागज़ क्यों रखे हैं?” वह पूछ ही बैठा।

“ये रसीदें हैं। जब हम कुछ खरीदते हैं तो दुकानदार रसीद देते हैं या एटीएम से अकाऊंट स्टेटमेंट निकलती हैं। इन रसीदों के पीछे कागज़ खाली होते हैं। इनको इकट्ठा करके छोटी-छोटी लिस्ट बनाना या टेलीफोन नम्बर लिखना आदि काम किए जा सकते हैं। इससे कागज़ बचता है।”

“दीदी, कागज़ बचाने के और क्या तरीके हैं?” करण ने पूछा।

“चलो, अपनी रफ-कॉपी निकालो,”दीदी बोलीं, करण ने कॉपी उनके सामने रखी।

“देखो, करण, तुमने एक-दो पंक्तियाँ लिखकर पूरा पृष्ठ खाली छोड़ा है।“

करण सकपकाकर बोला, “जी, दीदी।”

“ऐसा करने से कितना कागज़ बर्बाद हुआ, है न?”

“अच्छा यही होता है कि पूरे पेज पर लिखो, करीने से लिखो।”

“जी।”

“अब अपनी दूसरी कॉपियां दिखाओ। ये देखो, तुमने एक-एक लाइन छोड़ के लिखा है। इससे दो पन्ने का काम चार पन्नों में लिखा गया है।” करण चुपचाप खड़ा था।

“देखो करण, कागज़ बचाना हमारा फर्ज है। कागज़ पेड़ों के गुदे से बनता है। जितना ज्यादा उपयोग होगा उतनी ज्यादा पैदावार करनी पड़ेगी। ज्यादा कागज़ बनाना हो तो ज्यादा पेड़ कटेंगे और हमारे पर्यावरण के लिए यह हानिकारक है।”

करण खुश हो गया क्योंकि उसके सारे प्रश्नों के उत्तर उसे मिल गए थे।

“अब याद रखो, कागज़ का सही उपयोग करना चाहिए, रसीदों के पीछे, प्रिंटेड कागज़ों के कोरे हिस्सों पर लिखा जाए, होम वर्क के लिए रिसाइकल कागज़ से बनी कॉपी लो, कॉपी के पन्ने फाडो नहीं। कागजों से पेपरममैशी की चीजें बनाई जा सकती हैं, ये चीजें पर्यावरण-मित्र होती हैं।”

“दीदी, यह सारे प्वाइंट मैं लिख लूं?”

“हां, लिखो। और लिखो, कागज़ बचाने से पर्यावरण बचता है, परिसर स्वच्छ रहता है, पेड़ बचते हैं।”

“दीदी, पेड़ों से वायु और वायु से आयु,” करण उत्साह से बोला।

“और कल से तुम गणित की प्रैक्टिस के सारे सवाल इस बोर्ड पर करोगे”, कहते हुए आशा दीदी ने करण को सफेद बोर्ड और काला पेन दिया।

करण की बांछे खिल गईं। उसने निश्चय कर लिया कि अब से वह कागज़ बचाएगा।

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