प्रकृति के सुंदर दृश्यों, झीलों, झरनों व ऊँची-ऊँची पर्वत चोटियों के साथ ही साथ प्राचीन ऐतिहासिक रियासत चम्बा अपनी अमूल्य निधि, कला कृतियों व प्राचीन मंदिरों के लिए मात्र देश-प्रदेश में ही नहीं, बल्कि विश्व भर में अपनी पहचान बनाए हुए है। फलस्वरूप देश-विदेश के पर्यटक वर्ष भर चम्बा की वादियों में घूमते देखे जा सकते हैं। देखा जाए तो यहाँ की संस्कृति ही आने वाले पर्यटकों को मोह लेती है और उन्हें बार-बार इधर आने के लिए प्रेरित करती है। देश-विदेश के न जाने कितने ही पर्यटक अब तक यहाँ पधार चुके हैं, जिनमें से कुछ तो चम्बा को ही अपनी कर्मभूमि के रूप में अपनाकर यहीं रच-बस गए हैं। यही तो इस संस्कृति की अपनी विशेषता है।
चम्बा के भटियात विकास खंड के अंतर्गत ककीरा नामक स्थान भी अपनी प्राकृतिक सुंदरता व यहीं पर बने अपने सफेद व सुंदर संगमरमर के हरिगिरी मंदिर व आश्रम के लिए विशेष पहचान रखता है। सुंदर निर्मित इस भव्य संगमरमर मंदिर के अपने तीन सुंदर मंडप हैं, जो कि राजस्थानी शिखर शैली से प्रभावित प्रतीत होते हैं। इस मंदिर के निर्माण कार्य में स्वामी भरत जी का विशेष हाथ बताया जाता है। तीनों मंडपों के आगे खुला संगमरमर का सभा मंडप बना है और इसी के आगे बड़ा सा खुला लॉन रूपी मंदिर परिसर है, जिसका विकास कार्य समय के अनुसार चलता ही रहता है।
मंदिर के मंडपों में स्थापित प्रतिमाओं का विवरण कुछ इस प्रकार से है—मंदिर के बायीं ओर के प्रथम मंडप के गर्भ गृह में भगवान श्री राधा-कृष्ण की संगमरमर की प्रतिमा स्थापित है। मध्य वाले मंडप के गर्भ गृह में सुंदर शिवलिंग तथा अंतिम दाएं वाले मंडप के गर्भ गृह में भगवान राम व माता सीता जी की संगमरमर की प्रतिमा स्थापित है।
मंदिर के पीछे की ओर बने कमरों (प्रवेश करते ही) में सामने वाले एक कक्ष में स्वामी हरिगिरी जी महाराज की आदमकद प्रतिमा बैठी मुद्रा में (शीशे के शोकेस में) देखने को मिलती है। दूसरे दाएं साथ वाले कमरे में भरत जी महाराज की अति सुंदर, कांतियुक्त प्रतिमा देखने को मिलती है। इस प्रतिमा को देखने से ऐसा आभास होने लगता है कि स्वामी जी साक्षात् दर्शकों से जैसे बातचीत कर रहे हैं। उनके चेहरे की आभा व तेज से उनके व्यक्तित्व व विद्वत्ता का अपने आप ही परिचय हो जाता है और आंतरिक सुकून सा अनुभव होने लगता है।
कहते हैं कि भरत जी महाराज गौ, यज्ञ, वेदों और विद्वानों के प्रति विशेष आदर भाव रखते थे और सभी को धार्मिक कार्यों के प्रति समर्पित रहने को कहते थे। ऐसा भी बताया जाता है कि भरत महाराज जी अपने घर की सभी सुख-सुविधाओं को त्याग कर घूमते-घूमते इधर स्वामी हरिगिरी जी के यहाँ पहुँच गए थे और फिर यहीं रहकर गौशाला में पशुओं की देखभाल करने लगे थे। भरत के सेवा भाव व विचारों से ही प्रभावित होकर हरिगिरी महाराज ने इन्हें अपना प्रिय शिष्य बना लिया था।
राजस्थान के सिरोही राजघराने से संबंध रखने वाले भरत को शुरू से ही दीन-दुखियों के प्रति विशेष स्नेह रहता था। अपने उसी सेवा भाव, मधुर वाणी तथा स्नेह की भावना के फलस्वरूप ही भरत महाराज शीघ्र ही लोकप्रिय बन गए थे।
कुछ समय के पश्चात जब हरिगिरी महाराज जी स्वर्ग सिधार गए तो आश्रम की गद्दी को लेकर विचार होने लगे, जिसके लिए आश्रम के सभी स्वामी जी के चेले अपने आप को दावेदार कहने लगे। कहते हैं कि उसी मध्य एक ऐसा चमत्कार हुआ, जिसमें स्वामी हरिगिरी जी की फोटो से फूलों का हार उड़कर सीधा भरत महाराज जी के गले में पड़ गया। जिस पर सभी ने भरत जी को स्वामी हरिगिरी का उत्तराधिकारी स्वीकार कर लिया। इसके पश्चात ही भरत जी को 1008 राजेश्वरानंद भारती की उपाधि से सम्मानित किया गया।
इसके पश्चात भरत जी द्वारा ही आश्रम के सभी विकास कार्यों को यथारूप जारी रखा गया। गरीब व दीन-दुखियों के लिए एक अस्पताल का भी निर्माण करवाया गया, जिसमें कई तरह के शोध कार्य भी किए जाने लगे। राजराजेश्वरानंद द्वारा भारती हरिगिरी संन्यास आश्रम का निर्माण भी करवाया गया, जो आज की तारीख में कहाँ से कहाँ पहुँच गया है। स्वामी जी द्वारा चलाया गया नर्सिंग प्रशिक्षण विद्यालय आज भी उनकी याद दिलाता है, जिसमें आज भी सैकड़ों नर्सें प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं। ऐसे ही स्वामी जी द्वारा एक आश्रम काँखल (हरिद्वार) में स्वामी हरिगिरी जी की याद में चल रहा है।
ककीरा के इसी मंदिर वाले स्थान पर किसी समय (बहुत पहले) एक छोटा सा शिव मंदिर हुआ करता था, जिसकी बहुत ही मान्यता थी। कहते हैं कि उन्हीं दिनों हरियाणा से कुछ साधु-संत मणि महेश की यात्रा के दौरान इसी मंदिर के साथ बनी सराय में ठहरे थे और उन्हीं साधु-संतों के मुखिया स्वामी हरिगिरी द्वारा ही ककीरा के इसी स्थान पर आश्रम का निर्माण करवाया गया था, जिसमें ककीरा के स्थानीय लोगों ने भी अपना सहयोग दिया था। ऐसे ही फिर कुछ दिनों के बाद मंदिर व आश्रम का निर्माण कार्य भी शुरू हो गया था।
महाराज भरत ने गद्दी पर बैठते ही अपने गुरु के स्वप्न को मूर्त रूप देकर उनकी परंपरा को आगे बढ़ाया और विकास का वही कार्य आज भी जारी है। महाराज भरत स्वामी 18 जनवरी, 2007 के दिन स्वर्ग सिधार गए, लेकिन उनकी याद आज भी ककीरा के लोगों में वैसी ही बनी हुई है।




