सुयोग्य वर प्राप्ति की मनोकामना से जुड़ा है सुकेत का लाहौल मेला

Date:

Share post:

डा. हिमेन्द्र बाली, नारकण्डा, शिमला, हि.प्र.

सुकेत क्षेत्र की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वैदिक परम्पराओं एवम् धर्मनिष्ठ उत्सवों का सम्पुट रूप है l यहां के लोकमानस का प्रत्येक उपक्रम देव संस्कृति से सांस्कारित होकर देव अनुष्ठान ही बन जाता है l सुकेत की धरा वैदिक ऋषि वशिष्ठ, कश्यप, जमदग्नि और विष्णु के छठे अवतार भार्गव परशुराम व महाभारत के वार यौद्धा पाण्डवों और नाग समुदाय के देवार्चन से सांस्कृतिक माधुर्य से आवेष्ठित है l भागवत मूर्ति शुकदेव मुनि की तपोभूमि सुकेत में शैव, शाक्त, नाग, वैष्णव, बौद्ध मत के साथ-साथ तंत्र परम्परा का बाहुल्य आर्य व अनार्य संस्कतियों के सहज समायोजन का परिचायक है l सुकेत में नव वर्ष  विक्रम सम्वत् चैत्र मास से आरम्भ होता है और मंगल मुखी नव वर्ष के आगमन का स्वागत घर-घर ढोलरू गीत गाकर मंगल कामनाओं को ज्ञापित कर करते हैं l वास्तव में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नव वर्ष के शुभारम्भ के साथ ही सुकेत के देव समुदाय के देवालयों में मंगल ध्वनियों के साथ मेले-त्योहारों का क्रम आरम्भ हो जाता है l

सुकेत की सांस्कृतिक परम्परा का समारोहपूर्ण आरम्भ ही चैत्र मास में लाहोल पूजा के साथ होता है l लाहौल पूजा मण्डी जनपद के केवल सुकेत क्षेत्र में ही आज तक पारम्परिक ढंग से मनाने की परम्परा चली आ रही है l लाहोल पूजा का पर्व माता पार्वती व भगवान शिव का प्रतीकात्मक विवाहोत्सव है जिसके माध्यम से कन्याएं अभीष्ट वर प्राप्ति की कामना को पूर्ण करतीं है l हालांकि लाहौल पूजा की पृष्ठभूमि में प्राचीन कथानक वही है जो कांगड़ा की रली पूजन अनुष्ठान से जुड़ा है l कांगड़ा में रली पूजन के अनुष्ठान के पीछे यह घटनाक्रम जुड़ा है कि रली नामक लड़की का विवाह शंकर नामक एक छोटे लड़के से सम्पन्न होता है l रली का भाई वासतु भी इस घटनाक्रम का तीसरा पात्र है l इन तीनों पात्रों की स्मृति में कन्याएं उपवास रखकर तीनों पात्रों के गीत गाकर रली पूजन परम्परा का वहन करतीं हैं l

विद्वान रली पूजन की परम्परा को इसी तरह के कथानक के राजस्थान में प्रचलित रूप के आधार पर मनाने की परम्परा की एकरूपता से जोड़ते हैं l सम्भव है कि रली पूजन की परम्परा राजस्थान व कांगड़ा के जातीय समूहों की  स्थान विशेष सम्बंधों को इंगित करती हो l बहरहाल लाहौल पूजा सुकेत की एक विशिष्ठ सांस्कृतिक परम्परा है जहां कन्याएं अभीष्ट वर प्राप्ति के निमित इस पर्व को मनाती आ रही है l हालांकि मण्डी में लाहोल व रली पूजन की पृष्ठभूमि पर बरिणा पूजा का विधान प्रचलित है l बरिणा का शाब्दिक अर्थ ही इच्छित वर की अभिलाषा से अभिप्रेत है l सुकेत की आदि राजधानी पांगणा सुकेत की वैदिक व लोक परम्परा का केन्द्र रहा है l यहीं लाहोल मेले का आयोजन पूर्ववत् परम्परा के अनुरूप मनाने की परिपाटी आज भी विद्यमान है l पांगणा को यदि सुकेत संस्कति का गर्भ स्थल कहा जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी l

स्वाभाविक है कि आधुनिकता के आलोक में लाहोल पूजा का मौलिक स्वरूप थोड़ा धूमिल हुआ है पर अभी विस्मृत नही हुआ है l पांगणा में चैत्र मास के दूसरे पखवाड़े में नव वर्ष के साथ ही लाहोल मेले का आरम्भ हो जाता है l गांव की कन्याएं सुकेत की अधिष्ठात्री सेन वंश की देवी महामाया पांगण के प्रांगण में पुंगी फल (सुपारी) को गणेश रूप में प्रतिष्ठित कर लाहोल पूजा का आरम्भ करती हैं l  पांगणा के लोक संस्कृति मर्मज्ञ व सुकेत संस्कृति जनकल्याण मंच के संयोजक डा. जगदीश का कहना है कि पांगणा में आयोजित लाहौल मेला सेन वंश के शासक द्वारा स्थापित परम्परा का परिणाम है l सुकेत के इतिहास में राजा राम सेन (1650 ई) के काल में पुरोहित द्वारा राजा की कन्या राजकुमारी चन्द्रावती के चरित्र को बदनाम करने के षडयंत्र के कारण राजकुमारी ने पांगणा के राजभवन में देह त्याग किया l राजकुमारी के निर्दोष चरित्र व शुचिता की शक्ति से वह कालांतर में देवी रूप में प्रतिष्ठित हुईं l देवी चंद्रावती को पांगण में महामाया पांगणा के दुर्ग मंदिर में दायीं ओर धरातल कक्ष में प्रतिष्ठित किया गया l राजा ने राजकुमारी के उच्च चरित्र व पवित्रता का शाश्वत रूप में स्थापित करने के लिये श्रद्धांजलि स्वरूप लाहोल मेले का आरम्भ किया l

लाहौल पूजा के अनुष्ठान में गणपति की स्थापना के साथ एक सप्ताह तक पूजा क्रम चलता रहता है l लड़कियां प्रात:गांव से फूल एकत्रित कर गणपति पर अर्पित करतीं हैं l बैशाख संक्रांति से एक सप्ताह पूर्व लड़कियां माता पार्वती और शिव की मिट्टी की मूर्तियां बनाती हैं और उन्हें विविध रंगों, वस्त्र व आभूषणों से सुसज्जित कर मण्डप पर प्रतिष्ठित करतीं हैं l पार्वती-शिव की पूजा का क्रम पूरे सप्ताह तक चलता है l कन्याएं प्रात: पुष्प एकत्रित कर माता पार्वती व शिव पर लाहोल गीत गाकर अर्पित करतीं हैं —
काहे दा हुन्दा भई गमर गडुआ,
काहे दा हुन्दा ओ गले हार सईंयो,
कुने जो दित्ता भई गमर गडुआ,
कुने जो दित्ता ओ गले हार सईंयो….

लाहौल मेले से एक दिन पूर्व बैशाख संक्रांति को शिव व पार्वती के विवाह का मार्मिक आयोजन होता है l भगवान शिव की बारात पांगणा के प्राचीन शिव मंदिर अम्बरनाथ से जुलूस के रूप में महामाया मंदिर की ओर प्रस्थान करती है l उधर  दुल्हन माता पार्वती के पक्ष के लोग बारात का पारम्परिक स्वागत करते हैं l गांव का एक परिवार दुल्हन के लग्न के अनुष्ठान की पूरी व्यवस्था का प्रबंध करता है l इस तरह शिव-पार्वती के दैवीय विवाहोत्सव की सारी रस्मों को पूर्ण किया जाता है.संक्रांति के दिन ही चुराग पंचायत के ब्रह्मर्षि रूप देव थला फरास रथारूढ़ होकर पांगणा पधारते हैं l ग्राम वधुएं देवता का पग पग पर स्वागत करतीं हैं l देव थला रात्रि में महामाया पांगणा के मंदिर में विराजते हैं l रात्रि पर्यंत भजन-कीर्तन का आयोजन होता है. दो बैशाख को छण्डियारा की देवी महामाया पांगणा प्रस्थान करती है l इस दिन दोपहर बाद सबसे पहले देव थला की शोभा यात्रा देवता के स्थल भु्ठा सौह की ओर निकलती है l यहीं लाहौल के मेले का आयोजन होता है l

तदोपरांत महामाया पांगणा के प्रांगण से शिकारी देवी पर्वत से निकलने वाली पांगणा सरिता के किनारे स्थित पार्वती कुण्ड के लिए लाहौल (लाहोला) की शोभायात्रा निकलती है l अत में महामाया पांगणा और देवी छण्डियारा के रथों की शोभयात्रा लाहौल मेला स्थल की ओर निकलती है l जब दोनों आदि शक्ति के रथ पार्वती के पृष्ठभाग में टेकरी पर पहुंचते हैं तो वाद्य यंत्रों पर होफरा अर्थात् विशेष धुन का घोष होता है l ठीक उसी समय अपने सिर पार्वती-शिव की पार्थिव प्रतिमाओं को टोकरी में लिये नाथ जाति का व्यक्ति पार्वती कुण्ड मे छलांग लगाता है l

इस प्रकार शिव-पार्वती की मूर्तियों का तीनों देव विभूतियों की दिव्य उपस्थिति में विसर्जन किया जाता है l मूर्तियों का विसर्जन लाहोल के बलिदान का प्रतीक है l लाहोल के कथानक में जब कन्या का विवाह अपनी उम्र में बहुत छोटे लड़के से हुआ तो उसने अपनी पीड़ा को अपने आत्मोत्सर्ग से व्यक्त किया l लाहौल ने ससुराल जाते हुए जल समाधि लेकर अपने भाई वासतु को कहा कि ऐसा बेमेल विवाह पुन: किसी कन्या का न हो l अत: लाहोल का यह पर्व कन्या की सुकोमल संवेदनाओं को सम्मान देने का ही सांस्कृतिक उपक्रम है l लगभग चार घण्टे तक पांगणा के समीप देव थला के क्षेत्र भुट्टा सौह में लाहौल मेले का देवी-देवता की विद्यामानता में आयोजन होता है l नि:संदेह लाहौल मेला नारी के सम्मान को प्रतिष्ठित करने का सांस्कृतिक प्रयास रहा है जो शताब्दियों से सुकेत की सांस्कृतिक परम्परा में विशिष्ठ स्थान बनाए हुए है l

Sponsored

Daily News Bulletin

Nurturing Creativity – Keekli Charitable Trust, Shimla

Keekli Bureau
Keekli Bureau
Dear Reader, we are dedicated to delivering unbiased, in-depth journalism that seeks the truth and amplifies voices often left unheard. To continue our mission, we need your support. Every contribution, no matter the amount, helps sustain our research, reporting and the impact we strive to make. Join us in safeguarding the integrity and transparency of independent journalism. Your support fosters a free press, diverse viewpoints and an informed democracy. Thank you for supporting independent journalism.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Related articles

Eco-Friendly Nanofiber Breakthrough for Treating Dye-Contaminated Wastewater

Researchers at the Institute of Nano Science and Technology (INST) Mohali, an autonomous institution under the Department of...

Preserving the Himalayas is a Shared National Responsibility

Stressing that every citizen has a stake in protecting the Himalayan ecosystem, Union Minister Dr. Jitendra Singh stated...

पीएम श्री जेएनवी ठियोग आधारभूत सुविधाएं और छात्र कल्याण समीक्षा

पीएम श्री जवाहर नवोदय विद्यालय, ठियोग की विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठक उपायुक्त अनुपम कश्यप की अध्यक्षता में...

Governor Gupta Leads Navratri Prayers At Lok Bhavan

Marking the third day of Sharad Navratri, Governor Kavinder Gupta led a traditional yajna at Lok Bhavan,...