नदी: डॉo कमल केo प्यासा

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डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

शांत गहर गंभीर
समाई सी गहराई लिए
शीतल निर्मल जल के संग
उद्गम से निकल
बह जाती है
मंद मंद गति से !

नदी
पहाड़ों से उतरती
चीरती सीना चट्टानों का
डरावनी (रौद्र) लगती
भागे जाती दहाड़ती
समेटे जाती साथ सब कुछ
अपनी विनाशकारी तबाही में !

नदी
गिरती हांफती पहुंचती
पसार जाती मैदानों तक
दूर तक फैलाई बाहों में
चंचल सी मतवाली लगती
बलखाती मिट्टी धूल चूमती
ओछी छलकती गगरिया जैसी !

नदी
खेलती रही सदियों से
मानव और सभ्यताओं से,
कितनी सिमटी मिट गई
कितनी समा गई ,
इसके अंतरजल में !

नदी
हो गई मानव
मानव की तरह
मुखौटे धारण करती
रंग रूप बदलती,
कभी शांत गंभीर भयंकर
कभी मारती दहाड़े तबाही मचाती
आततायियों की तरह !

नदी
में समाते नाले झरने,
पत्थर रेत बजरी कंकर
मिट्टी राख नश्वर शरीर मिलता,
खो देते अस्तित्व अपना
ठीक वैसे ही जैसे समुद्र मिल
खो देती नदी
नामों निशानअपना !

नदी: डॉo कमल केo प्यासा

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