सावन माह का रुद्राभिषेक– मिटेंगे कष्ट बढ़ेगा विवेक

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डॉ. जय महलवाल (अनजान)  

भारतवर्ष में शिव भगवान के भक्तों के लिए सावन का महीना एक विशेष महत्व रखता है। इस महीने में भगवान शिव की भक्ति का एक विशेष महत्व माना जाता है। जो लोग भगवान भोलेनाथ में अपनी आस्था रखते हैं वह सावन महीने में सच्चे श्रद्धा भाव से भगवान शिव की पूजा अर्चना करते हैं। ऐसी मान्यता है कि इस महीने भगवान शिव की पूजा अर्चना एवं रुद्राभिषेक करने से मनुष्य के सारे कष्ट दूर होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसके साथ-साथ ही मनुष्य का विवेक भी बढ़ता है।

इस वर्ष 22 जुलाई को सावन का महीना शुरू हो चुका है और और इस बार महीने का पहला दिन ही सोमवार था। वैसे तो भगवान शिव के मंदिरों में भक्तों की भीड़ पूरा वर्ष देखी जा सकती है और रुद्राभिषेक सभी वक्त करते रहते हैं लेकिन सावन के महीने में किए गए रुद्राभिषेक का अपने आप में एक विशेष महत्व होता है। शिव भक्त पूरे विधि विधान से मंदिर में पूजा अर्चना के साथ भगवान भोलेनाथ का रुद्राभिषेक करते हैं। गौरतलब है कि रुद्राभिषेक में भगवान भोलेनाथ के रुद्र अवतार की पूजा पूरे विधि विधान से की जाती है। ऐसी मान्यता है कि यह भोलेनाथ का प्रचंड रूप होता है जो कि मनुष्य की सारी बाधाओं और समस्याओं का समाधान करता है। जैसे कि रुद्राभिषेक शब्द से विदित होता है कि यह भगवान रुद्र के अभिषेक से संबंधित है तो इसमें भगवान शिव के शिवलिंग को पवित्र स्नान करने के बाद विधिपूर्वक उसकी पूजा अर्चना की जाती है।

ऐसा कहा जाता है कि सावन के महीने में रुद्र ही सारी सृष्टि का कामकाज संभालते हैं अतः इस महीने में किए गए रुद्राभिषेक से मनुष्य को मनचाहा फल मिलता है। अगर भारतीय परिदृश्य की बात की जाए तो सावन का महीना एक विशेष महत्व रखता है। हिंदू पंचांग के अनुसार यह वर्ष का पांचवा महीना होता है। इस महीने में भगवान भोलेनाथ के भक्तों में जो भक्ति भाव होता है वह अपनी चरम सीमा पर होता है। इस महीने में पड़ने वाले सोमवार को स्त्रियां, पुरुष और कुमारी युवतियां व्रत रखते हैं। सावन के महीने में किए गए रुद्राभिषेक से मनुष्य के पाप एवं बुरे कर्मों का नाश होता है और अच्छे फल की प्राप्ति होती है।

कहा जाता है कि ब्रह्मा की उत्पत्ति भगवान विष्णु कि नाभि से हुई है। जब ब्रह्मा जी को यह पता लगा तो वह इस रहस्य का पता करने के लिए भगवान विष्णु के पास गए और उनके कहने पर ब्रह्मा जी यकीन करने के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं थे कि उनकी उत्पत्ति इस तरह से हुई है इस कारण उनके बीच बहुत जोरदार युद्ध भी हुआ। इस युद्ध के परिणाम स्वरूप भगवान रुद्र अपने लिंग रूप में प्रकट हुए थे और इसी लिंग का जब कोई आदि और अंत का पता ना लगा तो उन दोनों ने अपनी अपनी हार मान ली और इसके परिणाम स्वरूप उन्होंने लिंग का अभिषेक किया। ऐसी मान्यता है कि इसी परंपरा से रुद्राभिषेक का आरंभ हुआ था। जो भी मनुष्य सावन के महीने में रुद्राभिषेक करता है उसके परिवार में सुख और शांति का आगमन होता है और सफलता उसके कदम चूमती है।

ऐसी भी मानता है कि जो भक्तगण भगवान भोलेनाथ का रुद्राभिषेक दूध से करते हैं उनकी संतान प्राप्ति की इच्छा भी पूरी होती है और अगर शिवलिंग का रुद्राभिषेक दही के साथ किया जाता है तो इससे मनुष्य के समस्त कामों में आ रही सारी अड़चने दूर होती हैं। कुछ लोग रुद्राभिषेक करने के लिए पंचामृत दूध, दहीं, घी, गंगाजल और शहद का प्रयोग भी करते हैं जिससे कि भगवान शिव की विशेष कृपा की प्राप्ति होती है। सावन महीने में भगवान भोलेनाथ के मंदिरों में भक्तों की भीड़ लगी रहती है एवं सारे महीने में माहौल भक्तिमय होता है। इसी महीने पवित्र अमरनाथ यात्रा भी शुरू होती है। इसके साथ-साथ ही रक्षाबंधन, नाग पंचमी, हरियाली तीज इत्यादि त्योहार भी सावन महीने में ही मनाया जाते हैं ।

कई मंदिरों में उनके भक्त शिवलिंग के ऊपर गंगाजल के साथ-साथ बिल्व पत्र और भांग घोटकर भी चढ़ाते हैं । इसके अलावा आक, चंदन, कलावा, रोली, चावल ,फल, फूल, नावेद, धतूरा, पान, सुपारी, लौंग, इलायची, धूप इत्यादि का इस्तेमाल रुद्राभिषेक करने में करते हैं। ऐसी मान्यता है कि सावन के महीने में शिवलिंग के ऊपर बिल्वपत्र चढ़ाने से तीन जन्मों तक के पापों का विनाश होता है और एक अखंड बिल्वपत्र चढ़ाने से हजार बिल्वपत्र के बराबर फल की प्राप्ति होती है। सावन महीने में कांवड़िए विभिन्न नदियों से इकट्ठे किए गए जल से शिवलिंग का अभिषेक करते हैं जिससे कि भगवान शिव विशेष रूप से प्रसन्न होते हैं।

अगर बात शिव पुराण की की जाए तो उसमें हमको यह उल्लेख मिलता है कि भगवान भोलेनाथ ही स्वयं जल है इसलिए इस महीने में शिवलिंग पर जलाभिषेक करने का अपना एक विशेष महत्व रहता है। एक कथा के अनुसार जब देवताओं और असुरों में जबरदस्त युद्ध हुआ और समुद्र मंथन हुआ तो वहां पर विष निकला उसे विष को भगवान शंकर ने पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए अपने कंठ में समाहित कर लिया था जिसके कारण भगवान भोलेनाथ का कंठ नीला हो गया था इसी कारण भगवान भोलेनाथ को नीलकंठ महादेव भी कहा जाता है। भगवान शंकर के कंठ का रंग नीला देखकर सारे देवी देवता भय के मारे डर गए थे और उन्होंने इस विष के प्रभाव को कम करने के लिए जल का अर्पण किया था। इसी मान्यता के कारण आज भी जो भक्त भगवान शिव को सावन के महीने में जल अर्पित करते हैं उनको एक विशेष फल प्राप्त होता है और सब कष्टों से मुक्ति मिलती है। इसलिए ही कहते हैं कि सावन महीने में किए गए रुद्राभिषेक का अपने आप में एक विशेष महत्व होता है।

रुद्राभिषेक करते समय सबसे पहले जल हरि के दाहिनी तरफ जल चढ़ाया जाता है जिसको की गणेश भगवान का प्रतीक माना जाता है और उसके बाद बाईं तरफ जल चढ़ाया जाता है जिन्हें की भगवान कार्तिकेय का रूप माना जाता है। ऐसा कहा जाता है की शिवलिंग के ऊपर हमेशा बैठकर ही जलाभिषेक करना चाहिए और जहां तक संभव हो सके तो तांबे के बर्तन का उपयोग करना चाहिए। विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि जब भी शिवलिंग पर जलाभिषेक करें तो जल की धारा हमेशा उत्तर की ओर ही प्रवाहित होनी चाहिए और भक्त को दक्षिण दिशा की ओर रहना चाहिए और मुख उत्तर की ओर होना चाहिए।

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