सवालों की गठरी – डॉ. कमल के. प्यासा

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डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

मेरे सवालों को हर बार नजरअंदाज कर दिया जाता है दूर से ही इशारे के साथ “बैठ जाओ” कह कर बैठा दिया जाता है मुझे। मेरे मस्तिष्क में उठे हर सवाल को तिरस्कार करके अनसुना कर दिया जाता है तभी तो मेरे भीतर सवालों का अंबार लग चुका है। अपने दिलों दिमाग की इन उलझनों से मैं भटकन के साथ भूला बिसरा,ऐसा लगता है जैसे कि मुझे गहरी अंधेरी खाई में धकेल दिया गया है।

किसी को क्या मासिक बैठक तो हर माह ठीक वैसे ही सजती है,सभी समय पर पहुंच जाते हैं।एजेंडा पढ़ा जाता है। पहले पिछली बैठक की समीक्षा के साथ सभी द्वारा सिर हिला कर तस्दीक की जाती है। फिर अगले एजेंडे पर पहुंचते हैं इतना बजट इतनी इनकम हुई इतना खर्चा हुआ इतना चाय पान और टहल सेवा पर हुआ !

किनारे की कुर्सी से मेरा हाथ फिर उठ जाता है,”अरे कोविड में तो खान पान सब बंद था ?” सभी का ध्यान आगे पहुंची कोल्ड ड्रिंक की ठंडी बोतल,बर्फी, गरमा गर्म समोसे चाय की ओर होता है और जल्दी से सभी चट हजम हो जाता है। उसी के साथ फिर हस्ताक्षर करने की होड़ लग जाती है,मीटिंग यहीं खत्म हो जाती है। सभी धीरे धीरे बातें करते बाहर निकलने लगते हैं। मैं भी एजेंडे को लपेट कर पॉकेट में डाल पीछे पीछे चल पड़ता हूं ,अपने भूले बिसरे सवालों की गठरी उठाए, अगली बैठक की इंतजार में !

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Nurturing Creativity – Keekli Charitable Trust, Shimla

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