वांग चुक, वांग चुक,,,,,
क्या है,,,,? कौन है,,,,?
ये वांग चुक,,,,?
क्या लद्दाख है,,,,,
पर्यावरणविद है,,,,,
वैज्ञानिक है,,,,,
जागरूक नागरिक है,,,,,
दार्शनिक है,,,,,
हितैषी है या
कोई चौकस इंसान,,,,?
या वांग चुक
दुश्मन है,
अंधेरों का,
अत्याचारों का,
चोर-लुटेरों का,
बातूनी चापलूसों का,
या हाँ जी-हाँ जी करते
किस्से-कहानियाँ गढ़ते
अंधभक्तों का,
अर्थात जुमलों से
पेट भरने वालों का,,,,?
वांग चुक को
समझो,
जानो, पहचानो,
अपने अधिकारों को
यूँ ही न जाने दो।
कौन कैसा है,,,,?
किस्से-कहानियों के बहकावे सब जाने दो।
वरना,
सब कुछ मिट जाएगा,
मिट जाएगा,
बिक जाएगा।
आँखें खोलो, जागो तो
और बचा लो कल को,,,,!
वांग चुक कहता है,
पहचानो,
इन दर्द भरी आवाज़ों को।
भूखे-प्यासे बैठे कब से,
इधर-उधर खुले में,
तपती गर्मी, लू से लड़ते
ये नादान चिराग किसी के,
अंधे, गूंगे, बहरे
शासन के इंतज़ार में,,,,!
वांग चुक,
मार्गदर्शक,
दिशा-निर्देशक,
पथ-प्रदर्शक,
निस्वार्थ भाव से कहता है—
जागो, जागो देशवासियों,
खोलो आँखें,
कुछ तो बोलो,
मुँह खोलो,
आवाज़ निकालो।
लूट व अत्याचारों से
खुद ही तुम खुद को बचा लो,,,,!,,,,!




