डॉ. कमल के.प्यासा – जीरकपुर, मोहाली
कितने उजड़े,
कितने बिखरे,
कितने बेमौत मरे
नशे के चक्कर में!
पर अभी भी ये नहीं शर्माते,
सर-ए-आम ज़हर (नशा) बेचते
मौत के सौदागर ये!
होगी नीलामी खुले में
नशीले ज़हर भरे इस दारू की!
आएंगे फिर सज-धज के सौदागर,
बंद बोतल के महकते सुरूर और नशे को
खुली मौत बेचने वाले!
खूब उठेगी बोली ठेकों की,
ठेकेदारों की,
मात देंगे इक-दूसरे को!
लाखों और करोड़ों में चलेगी आपसी लड़ाई
नशे और मौत के सौदागरों की!
पेमेंट तो चलती रहेगी
किस्तों में पूरे साल,
ज़हर बिकेगा अमृत बन मधुशाला में
दारू के नाम,
सर-ए-आम, बेरोक-टोक,
नगद और ठसक से…
मनमाने ही दाम में!
हाथों-हाथ उड़ेगी
दारू-ज़हर की बोतल,
मरेंगे बेमौत न जाने कितने
गुलाम नशे के,
वह भी ज़हर गटक के!
पीछे रहते रोते-बिलखते,
दाने-दाने को तरसते
लाचार बूढ़े, बीवी और बच्चे…
कैसे जीवन बसर करते?
कितने हुए अनाथ,
कहाँ, किधर और कितने?
कैसी विडंबना, कैसा विधान!
फलते-फूलते,
ऐश-ओ-आराम से जीते
अपने परिवार-बच्चों संग…
मौत के सौदागर,
बंद बोतल में
दारू (अमृत) नाम का ज़हर बेचते!



