सूरज तो आज भी चमकता है : कविता

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रणजोध सिंह – नालागढ़

हमने तमाम रौशनी को ढक दिया कंक्रीट के जंगल से

वगरना दोस्त, सूरज तो सूरज है आज भी चमकता है|

ये जो हर तरफ अफ़रा-तफ़री है अपनी ही करनी का फल है

झूठ की बैसाखियों पर चलने वाला दिन में कई बार मरता है|

उसने अपनी जवानी लगा दी अपने घर को घर बनाने में

अब रिटायरमेंट के बाद, अपनी बीबी-बच्चों से डरता है|

तालियाँ बजती हैं बुलंदी पर पहुँचे हर शख्स के लिए

मगर बुलंदी पर पहुँचा शख्स, हर वक्त खौफ़ में रहता है|

रणजोध क्यों खामखां अपनी नज्मों की फ़िक्र करता है

तेरा दुश्मन है न, हरदम ज़माने से तेरा ही ज़िक्र करता है|

पिता- एक कल्पतरु – रणजोध सिंह

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