हमने तमाम रौशनी को ढक दिया कंक्रीट के जंगल से
वगरना दोस्त, सूरज तो सूरज है आज भी चमकता है|
ये जो हर तरफ अफ़रा-तफ़री है अपनी ही करनी का फल है
झूठ की बैसाखियों पर चलने वाला दिन में कई बार मरता है|
उसने अपनी जवानी लगा दी अपने घर को घर बनाने में
अब रिटायरमेंट के बाद, अपनी बीबी-बच्चों से डरता है|
तालियाँ बजती हैं बुलंदी पर पहुँचे हर शख्स के लिए
मगर बुलंदी पर पहुँचा शख्स, हर वक्त खौफ़ में रहता है|
रणजोध क्यों खामखां अपनी नज्मों की फ़िक्र करता है
तेरा दुश्मन है न, हरदम ज़माने से तेरा ही ज़िक्र करता है|




