औदुम्बर: पश्चिमी हिमालय की प्राचीन सभ्यता

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डॉ. कमल के. प्यासा – मंडी

औदुम्बर जो की एक भारतीय जनजाति थी, की उत्पत्ति संस्कृत के शब्द उदुम्बर (गूलर पेड़) से बताई जाती है। गूलर एक फालदार (अंजीर) पेड़ को कहते हैं, जिसे अति पवित्र व पूजनीय माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु व महेश (त्रिदेव) का निवास रहता है, जिस कारण यह पेड़ पूजनीय व अति महत्वपूर्ण बताया जाता है। औदुम्बरों का क्षेत्र पश्चिमी हिमालय (व्यास, रावी व सतलुज नदियों के मध्य) बताया जाता है। मुख्य केंद्र कांगड़ा, चम्बा, सिरमौर व गुरदासपुर का पठानकोट बताया जाता है, जहां दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व से प्रथम शताब्दी ईस्वी पूर्व तक इनका शासन चलता रहा। बाद में गुप्त साम्राज्य की बढ़ती शांति के आगे औदुम्बरों को उनकी अधीनता स्वीकार करनी पड़ी थी। वैसे इनका समुदाय अत्यधिक संगठित और स्वतंत्र गणतंत्रात्मक था, राजा के वंशानुगत होने के साथ-साथ लोकतांत्रिक रूप से भी चयन किया जाता था। इनके संबंध में महाभारत, पाणिनि की अष्टाध्यायी में भी जानकारी आती है। औदुम्बर इंडो-यूनानी चांदी-तांबे के सिक्के पठानकोट, कांगड़ा, चम्बा व आसपास के क्षेत्रों से प्राप्त हो चुके हैं, जिन पर ब्राह्मी व खरोष्ठी के लेख में शासक की उपाधि “भागवत महादेव” व “राजराज” के साथ त्रिशूल, कुल्हाड़ी, बैल, हाथी, मंदिर व ऋषि आदि को देखा जा सकता है। इन सभी को देखते हुए यह प्रमाणित हो जाता है कि औदुम्बर शैव धर्म के पक्के अनुयायी थे।

औदुम्बर सिक्के आकार में गोलाकार के साथ ही आयताकार व वर्गाकार भी देखे गए हैं। तांबे के सिक्के, भार में 1.20 ग्राम से लेकर 5.00 ग्राम तक के, जबकि चांदी के 2.00 ग्राम से लेकर 4.00 ग्राम भार तक के बताए जाते हैं। इन सिक्कों की मोटाई 1.5 मि.मी. से लेकर 2.5 मि.मी. तक देखी गई है।

औदुम्बर तांबे के सिक्कों में, जिनमें शिवदास, रुद्रदास, धरघोष व महादेव आ जाते हैं, अलग-अलग लेख व चित्रण मिलता है। शिवदास के सिक्के के एक ओर वेदिका में वृक्ष, हाथी का अग्र भाग, नीचे की ओर नदी के रूप में वक्र रेखा व खरोष्ठी में लिखा लेख “महादेवस रज सिवदेवस” मिलता है। दूसरी ओर मंदिर, त्रिशूल, कुल्हाड़ी व ब्राह्मी लिपि में “औदूंबरीस सिवदासस” लिखा मिलता है।

रुद्रदास वाले सिक्के में एक ओर खरोष्ठी लिपि में “महादेव रज रुद्रदास” व ब्राह्मी लिपि में “औदुमबरिस” के साथ शेष के चिन्ह वैसे ही हैं।

धरघोष वाले में खरोष्ठी लिपि में “महादेव औदुब रिस” व “महादेवस औदुब रिस”, शेष के चिन्ह वैसे ही हैं।

औदुम्बर गोलाकार चांदी के महादेव व धरघोष के सिक्कों में से, महादेव वाले सिक्के के एक ओर कुबड़ बैल, कमल फूल व खरोष्ठी लिपि में “भगवत महदेवस रज रज” व दूसरी ओर हाथी, त्रिशूल के साथ ब्राह्मी लिपि में “भगवत महदेवस रज रज” लिखा देखा जा सकता है। महादेव सिक्के के दूसरे प्रकार में बैल, नंदी पद व खरोष्ठी लिपि में “भगवत महदेवस रज रज” लेख व दूसरी ओर वैसे ही चिन्ह व लेख मिलते हैं।

महादेव के तीसरे प्रकार के सिक्के में एक ओर तीन पत्तों की आकृति व दूसरी ओर ब्राह्मी लिपि में “भगवत महदेवस” के साथ त्रिशूल व कुल्हाड़ी के साथ मानव आकृति देखने को मिलती है। धरघोष के सिक्कों के एक ओर ऋषि विश्वामित्र दाएं हाथ को उठाए हुए व बाएं चर्म छाला लिए हुए के साथ खरोष्ठी लिपि में “विश्वामित्र महदेवस रज धरघोष” लेख लिखा मिलता है। इसी सिक्के के दूसरी ओर त्रिशूल, कुल्हाड़ी, वेदिका वृक्ष के साथ ब्राह्मी लिपि में “महदेवस रज धरघोष औदबरिस” लिखा लेख मिलता है। यह समस्त वर्णित सिक्के दूसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व से प्रथम शताब्दी ईस्वी के मध्य के बताए गए हैं।

मंडी से प्राप्त औदुम्बर सिक्का :

  1. सिक्के की धातु = तांबा
    आकार = गोलाकार
    व्यास = 1.9 से.मी.
    मोटाई = 0.15 से.मी.
    सिक्के का भार = 4.8 ग्राम
    काल = दूसरी शत. ई. पूर्व से प्रथम शत. ई.
    सिक्के की लिपि = खरोष्ठी व ब्राह्मी
    सिक्का संग्रहकर्ता = कमल के प्यासा, परुथी संग्रहालय, मंडी
    सिक्का प्राप्ति स्थान : चक्कर, मंडी (बाजार से खरीदा गया)

सिक्के का विवरण = प्राप्त सिक्के के एक ओर ऋषि विश्वामित्र को अपना दायां हाथ ऊपर की ओर किए हुए दिखाया गया है और साथ ही खरोष्ठी लिपि में “विश्वामित्र” लिखा लेख देखा जा सकता है। इसके साथ ही खरोष्ठी में “महादेवस्य : राना धरागोय स्या :” लिखा भी देखा जा सकता है। इसी सिक्के के दूसरी ओर एक त्रिशूल व वेदिका में पौधा दिखाया गया है। शेष वैसे ही ब्राह्मी लिपि में लिखा है, जो कि सिक्के की पिछली ओर लिखा है।

हिमाचल के प्राचीन कुषाण सिक्के

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