भिशती शासक निज़ाम और चमड़े के सिक्के

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डॉ. कमल के. प्यासा – मंडी

यह सच्ची कहानी मुग़ल शासक हमायूँ के समय की है और बात उस समय के 26 जून 1539 की है, जिस समय अफ़ग़ान, शासक शेर शाह सूरी ने बादशाह हमायूँ को बिहार के (दोसा बॉक्सर) युद्ध में बुरी तरह से पछाड़ दिया था और हमायूँ वहां से किसी तरह से भाग खड़ा हुआ था आगे गंगा नदी के किनारे पहुँचने पर घोड़ा नदी पार नहीं कर पाया, जिस पर हमायूँ की जान पर बन आई थी, क्योंकि अफगान सैनिक उसका पीछा कर रहे थे तभी एक निज़ाम नामक भिशती, वहां नदी किनारे अपनी मशक के साथ पानी भरने पहुंच गया और उसने बादशाह हमायूँ की स्थिति को भाँपते हुए, अपनी मशक द्वारा जल्दी से उन्हें नदी पार करवा दी. इस प्रकार हमायूँ को, मौत के मुंह से बचाने के परिणाम स्वरूप ही, भिशती को मुँह मांगा इनाम देने को बादशाह ने कह दिया, भिशती ने भी कह दिया, “मुझे एक दिन के लिए अपनी तरह बादशाह बना देना जहांपन्हा”

इसके पश्चात जब हमायूँ को दुबारा अपनी सत्ता प्राप्त हुई तो उसने अपने दिए हुए वादे के अनुसार भिशती निज़ाम को दिल्ली सल्तनत का ताज पहना व गद्दी पर बैठा कर, एक दिन का बादशाह बना दिया.निज़ाम भिशती ने भी अपने प्रतीक व प्रमाण के लिए एक ही दिन में, अपने नाम के चमड़े के सिक्के टकसाल से ज़ारी करवाकर सब कुछ बदल दिया और नया ही इतिहास रच दिया, निज़ाम भिशती का.चमड़े का यह सिक्का आज भी पटना संग्राहलय में सुरक्षित देखा जा सकता है

इंसानियत, कविता – डॉ. कमल के प्यासा

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