डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

दीवारें
छोटी बड़ी
मोटी पतली
इधर उधर
ऊंची नीची
यहां वहां
कहीं भी दिखती हों

दीवारें
बंटती हैं
काटती हैं
जुदा करती हैं
अपनों को अपनों से !

दीवारें
ऊंची नीची
नाटी हल्की
कच्ची पक्की
मिट्टी गारे
बल्लू सीमेंट की
कैसी भी हों
किधर भी हों
बस बांट के पैदा करती हैं
खलल ही खलल !

दीवारें
मुल्क बंटती है
मुल्क को छोटा करती हैं
मुल्क को बदल रखती हैं
रंग बदल बदल कर
एक दूजे से कर नफरत
नफरत ही भारती हैं !

दीवारें
पास की पड़ोस की
शहर की कस्बे की
दुकान की मकान की
बस जुदा कर
बंटती है तोड़ती हैं
दिल्लो को संबंधों को !

इस लिए कहता हूं
मिटा दो हटा तो
तोड़ दो फोड दो
उठती इन दीवारों को
क्योंकि,
दीवारें प्रतीक हैं
तन्हाई की जुदाई की
सभी तरह की बुराई की !

दीवारें: डॉo कमल केo प्यासा

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