देवभूमि कुल्लू जहाँ अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, वहीं यह समस्त क्षेत्र अपने सभी देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों व उनके प्राचीन स्थलों अर्थात प्राचीन मंदिरों व भंडारों के लिए भी विशेष पहचान बनाए हुए है। अनेकों शैलियों के मंदिर व भंडार गृह आज भी अपनी पहचान अपने में छिपाए देखे जा सकते हैं। वैसे देखा जाए तो जिला कुल्लू की समस्त प्राचीन संस्कृति से कहीं न कहीं इसके प्राचीन धरोहर होने के प्रमाण मिल ही जाते हैं और फिर यहाँ के समस्त प्राचीन धर्म स्थल व मंदिर भी तो प्राचीन धरोहरों के अंतर्गत ही आते हैं। इन्हीं प्राचीन धरोहरों (पहचान दिलाने वाले मंदिरों) के अंतर्गत ही थ्रास गांव का पहाड़ी शैली का मंदिर भी आ जाता है। ऋषि मार्कण्डेय के नाम से जाने जाने वाला यह छोटा सा मंदिर अभी तक पर्यटकों की पहुँच से दूर ही रहा है, शायद अलग-थलग गांव के एक छोर पर होने के कारण इस मंदिर का अभी इतना प्रचार नहीं देखा गया।
मार्कण्डेय ऋषि के इस मंदिर तक पहुँचने के लिए दो-तीन अलग-अलग मार्ग हैं, अर्थात भुंतर-गड़सा मार्ग से थ्रास, मंडी के पनारसा व नगवाई से व्यास नदी पार सड़क मार्ग से हुरल-थ्रास मार्ग या फिर नगवाई के अंतिम छोर के जोगानी माता स्थान (मंदिर) पर बने झूले द्वारा व्यास नदी पार करके भी पहुँचा जा सकता है। वैसे झूले वाला यह रास्ता सबसे निकट का रास्ता है, लेकिन झूले से केवल एक ही व्यक्ति बैठकर व स्वयं झूले को चलाकर जा सकता है और इस तरह स्वयं को डर भी लगता है। हुरल और थ्रास दोनों ही पास-पास के गांव हैं।
मार्कण्डेय ऋषि मंदिर थ्रास गांव में पड़ता है और मंदिर के समीप पीछे की ओर सुंदर सेब, पलम, नाशपाती, बादाम, कीवी व जापानी फल आदि के बगीचे देखे जा सकते हैं। चारों ओर हरे-भरे बगीचे व खेतों के साथ, मंदिर के दोनों ओर व्यास तथा सहायक नदी (हुरल-थ्रास) कल-कल करती बहती हुई मंदिर को निहारती नजर आती है।
पहाड़ी शैली के इस छोटे से मंदिर के बाहर की ओर किए गए काष्ठ-तराशी के कार्य को देखकर आदमी चकित रह जाता है। मैं बहुत पहले पनारसा से ही घूमते हुए यहाँ पहुँचा था। उस समय मेरे पास न तो कैमरा था और न ही मोबाइल, केवल एक डायरी थी। आज उसी डायरी के पन्ने पलटते हुए हाथ से बनी अधूरी कृतियों की ओर ध्यान चला गया और सारी पुरानी यादें ताजा हो गईं।
स्लेट की ढलवां छत वाला छोटा सा मंदिर, जिसमें छोटा सा ही गर्भगृह बना है। छोटे से गर्भगृह के अंदर ही एक 3 फुट व्यास का भगवान शिवजी का शिवलिंग, एक भगवान गणेश की सुंदर पत्थर की प्रतिमा, जो आकार में लगभग एक फुट नौ इंच की देखी गई। इनके अतिरिक्त गर्भगृह में एक डेढ़ फुट × एक फुट का पत्थर से बना अग्निकुंड भी देखा गया।
मंदिर का प्रवेश द्वार: जिसे अपनी लकड़ी तराशी के कार्य के लिए बेजोड़ व अद्भुत नमूना कहा जा सकता है। इसमें कई सुंदर देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों, योद्धाओं (राजाओं), बजंतरियों व पशु-पक्षियों की आकृतियाँ देखने को मिलती हैं। इन सभी कलाकृतियों को आगे अलग-अलग रंगों की तूलिका से सुशोभित किया गया है।
प्रवेश द्वार के ऊपर बाएँ व दाएँ ओर देवनागरी में लिखे लेख हैं, जो इस प्रकार पढ़े जाते हैं—
बाएँ ओर:
“पंडित अजित राम वालद विनायकू राम स. 1969, स (2055)”
इसी तरह दाएँ ओर लिखे लेख को इस प्रकार पढ़ा गया है—
“स. आज भाई रोत राम माता सोभू मनीफ देवलू।”
ऐसा प्रतीत होता है कि इस मंदिर के निर्माण में इन लोगों का विशेष योगदान रहा होगा और मंदिर का निर्माण अब से लगभग 113-114 वर्ष पूर्व सं. 1969 में ही किया गया होगा।
मंदिर के प्रवेश द्वार की चौखट के ऊपर की ओर तथा नीचे, दोनों तरफ जिन- जिन देवी-देवताओं और ऋषि-मुनियों की आकृतियाँ उकेरी गई हैं, उनका विवरण इस प्रकार किया जा सकता है—
प्रवेश द्वार की चौखट के ऊपर प्रथम पंक्ति में कुल मिलाकर दस आकृतियाँ उकेरी गई हैं, जो बाएँ से दाएँ क्रमशः इस प्रकार हैं— भगवान गणेश, मयूर सवार कार्तिक स्वामी, चतुर्भुज देवी माँ, ऋषि देव, चतुर्भुज देव ऋषि और अंत में एक सुंदर शंख की आकृति दिखाई गई है।
नीचे की ओर द्वितीय पंक्ति में सात देव आकृतियाँ इस क्रम से हैं— त्रिमुखी मयूर सवार कार्तिक स्वामी, चौमुखी देव ब्रह्मा, चौभुजी देवी माँ, भगवान शिव, शेषनाग के साथ भगवान विष्णु, पंचमुखी देवी और चौमुखी देवी माँ दुर्गा।
नीचे वाली तीसरी पंक्ति में नौ उकेरी गई आकृतियाँ इस क्रम से देखी गई हैं— परी आकृति, भगवान श्रीकृष्ण, देव गणेश, परी आकृति, ऋषि देव और अंत में फिर एक परी की आकृति दिखाई गई है।
नीचे वाली चतुर्थ पंक्ति में बाएँ से दाएँ दस ऋषि आकृतियों को दर्शाया गया है। अंतिम अर्थात पंचम पंक्ति में बाएँ से दाएँ क्रमशः भगवान शिव, ऋषि देव, देव गणेश और अंत में एक ऋषि की आकृति दिखाई गई है।
ऊपर वाली चौखट की पंक्तियों के नीचे के प्रथम थाम पर (प्रवेश द्वार के बाएँ ओर से) ऊपर से नीचे की ओर जो आकृतियाँ उकेरी गई हैं, वे कुछ इस प्रकार से देखी गई हैं— राजा, शेषनाग, ऋषि देव और आखिर में एक योद्धा की आकृति दिखाई गई है।
द्वितीय थाम पर ऊपर से नीचे की ओर देवी माता लक्ष्मी, चौमुखी देव ब्रह्मा, ऋषि देव, आराधक, राजा और अंत में एक योद्धा को दिखाया गया है।
तृतीय थाम पर ऊपर से नीचे की ओर आराधक, ऋषि देव, योद्धा, फिर योद्धा और अंत में सबसे नीचे भगवान परशुराम जी को दिखाया गया है।
चतुर्थ थाम में ऊपर से नीचे की ओर क्रमशः दिखाई गई आकृतियों में शामिल हैं— भगवान राम, भक्त प्रह्लाद, एक नर्तक, चतुर्भुज देवी और सबसे नीचे देव ब्रह्मा को बैठी मुद्रा में दिखाया गया है।
प्रवेश द्वार के दाईं ओर के पाँचों थामों पर ऊपर से नीचे की ओर उकेरी गई आकृतियाँ कुछ इस प्रकार देखी गई हैं—
प्रथम थाम (स्तंभ) में इस क्रम से भगवान विष्णु, ऋषि ब्रह्मा या मत्स्य अवतार तथा भगवान विष्णु को दिखाया गया है।
दूसरे थाम में ऊपर से नीचे की ओर देवी माता, देव नारद मुनि, देवी माता लक्ष्मी, देव ऋषि को बैठी मुद्रा में तथा अंत में किसी अन्य ऋषि को बैठे हुए दिखाया गया है।
चौखट के तृतीय थाम पर ऊपर से नीचे की ओर राजा को स्तुति करते हुए, देव ऋषि को बैठे हुए, देवी माँ को वरद हस्त मुद्रा में, देव ऋषि वाल्मीकि और सबसे नीचे बालक ध्रुव व प्रह्लाद को भक्ति करते हुए दिखाया गया है।
दाएँ ओर के चतुर्थ थाम पर सबसे ऊपर देवी माँ सरस्वती को खड़ी मुद्रा में, फिर देव ऋषि नारद, भगवान शिव को बैठी मुद्रा में, बाबा बालक नाथ, देव ऋषि और अंत में किसी राजा की छवि दिखाई गई है।
इसी प्रकार अंतिम दाएँ ओर के पाँचवें थाम पर सबसे ऊपर भगवान विष्णु, फिर दो महिलाओं को खड़ी मुद्रा में, पंडित को घंटी के साथ, आगे पंडित को पूजा-अर्चना करते हुए और अंत में सबसे नीचे राम भक्त हनुमान को बैठे हुए दिखाया गया है।
इस तरह कुल मिलाकर एक सौ से अधिक देवी-देवताओं व ऋषि-मुनियों की सुंदर उकेरी गई आकृतियाँ मंदिर की चौखट व द्वार पर देखी गई हैं, जो काष्ठ कला की बेजोड़ व उत्कृष्ट मिसाल कही जा सकती हैं।
यहीं प्रत्येक वर्ष अप्रैल माह में (वैशाखी के दिन) व्यास व हुरल-थ्रास नदियों के संगम स्थल पर देव ऋषि मार्कण्डेय का रथ अपने देवलुओं व भारी जनसमूह के साथ शाही स्नान के लिए पधारता है और इस दिन को ऋषि प्रकट दिवस के रूप में मनाया जाता है।
शाही स्नान में देव ऋषि के रथ के साथ सभी लोग पवित्र स्नान में शामिल होते हैं और धरती माँ को दूध भी अर्पित किया जाता है। देव रथ (ऋषि मार्कण्डेय) द्वारा भी धरती से दूध पीने की रस्म अदा की जाती है और यह समस्त समारोह देखते ही बनता है।
देखा जाए तो प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ हमारी देव संस्कृति और इससे जुड़े असंख्य लोक देवी-देवताओं के रथ आदि हमारी अमूल्य धरोहर ही तो हैं, जो देश-विदेश के पर्यटकों, शोधार्थियों, विद्वानों, श्रद्धालुओं और कला प्रेमियों के लिए अमूल्य निधि कहलाती हैं।




