मण्डी की सांस्कृतिक धरोहर : लोक गीतों से जीवन तक

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डॉ. कमल के. प्यासा – मण्डी

लोक गीत, लोक नृत्य और लोक लिबास जैसे शब्द अपने नाम से ही स्पष्ट कर देते हैं कि प्रत्येक स्थान, प्रदेश और क्षेत्र की अपनी विशिष्ट लोक संस्कृति होती है। लोक गीतों, लोक नृत्यों और लोक परिधानों को देखकर तथा सुनकर हम सहज ही यह अनुमान लगा सकते हैं कि उस स्थान, क्षेत्र अथवा इलाके की संस्कृति और भौगोलिक स्थिति कैसी होगी।

हिमाचल प्रदेश के मण्डी क्षेत्र की सांस्कृतिक झलक का आभास भी इसके लोक गीतों, लोक नृत्यों तथा पारंपरिक परिधानों से सहज ही हो जाता है। यहाँ के प्रचलित लोक गीतों में देशभक्ति, धार्मिक आस्था, तीज-त्योहारों और ऋतुओं से जुड़े गीतों के साथ-साथ विरह तथा मधुर मिलन के भावों से ओत-प्रोत गीत भी सुनने को मिलते हैं।

उदाहरण के लिए, निम्न प्रेमगीत में एक प्रेमिका अपने प्रिय को अपने पास ठहरने का आग्रह करती है। गीत के बोल इस प्रकार हैं—

तेरी तेरी खातिर खाणा बणाया,
खाणा खाई के जायाँ सांजणा….!

तेरी तेरी खातिर सेज सजाई,
जरा बैठी ता जायाँ साजणा….!

तेरी तेरी खातिर पाणी मंगाया,
पाणी पीके जायाँ साजणा….!

अर्थात—

इस गीत में प्रेमिका (पत्नी) अपने प्रेमी (पति) से आग्रह करती है कि मैंने तुम्हारे लिए भोजन बनाया है, बैठने के लिए सेज सजाई है और पानी भी लाकर रखा है। इसलिए कृपया इन सबका आनंद लेकर ही जाना।

जहाँ इन पंक्तियों में प्रेम और आत्मीय आग्रह की झलक मिलती है, वहीं एक अन्य लोकगीत प्रेमिका की विरह-वेदना का मार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है—

सिंजदी मैं मरूवे जो पाणी, मेरे हाकमा हो…..
ऐस मरुवे री लम्बी-लम्बी लरजा,
मुखा ने तोड़ी भी नी जाणी।
सिंजदी मैं मरुवे जो पाणी।

मारुवा ता मेरा हरा-भरा रैहदा,
एह ता किसी री निशाणी।
सिंजदी मैं मरुवे जो पाणी।

कियाँ करी काटणी जिंदड़ी निमाणी,
सिंजदी मैं मरुवे जो पाणी।

इन पंक्तियों से स्पष्ट होता है कि प्रेमिका (पत्नी), जिसका पति दूर कहीं रहता है, उसके द्वारा लगाए गए निशानी स्वरूप मरुवे के पौधे की सिंचाई करती रहती है। उसी पौधे से अपने पति की स्मृतियों को जोड़ते हुए वह व्यथित मन से पूछती है— “अब मैं तेरे बिना अपना जीवन कैसे बिताऊँ?”

खुशी और विरह के इन गीतों के अतिरिक्त ऐसे अनेक लोकगीत भी मिलते हैं, जिनमें अपने घर, गाँव और क्षेत्र से जुड़ी स्मृतियों तथा अपनत्व का गहरा भाव दिखाई देता है। इन गीतों से अपने क्षेत्र के प्रति लोगों के विशेष लगाव और आत्मीयता का सहज आभास होता है।

धार्मिक लोकगीतों के अंतर्गत देवी-देवताओं की स्तुति, माता की भेंटें, भजन तथा विभिन्न प्रकार की आराधनात्मक रचनाएँ आती हैं। मण्डी क्षेत्र में प्रचलित एक लोकप्रिय भेंट इस प्रकार है—

घंणे-घंणे जंगला ते रैंदी माता मेरिये,
देखणे रा सुन्दर नज़ारा हो….

नंगी-नंगी पैरी माता अकबर आया,
सोने रा छतर चढ़ाया हो…..

माता के इस भेंट गीत में माता देवी दुर्गा के निवास स्थान के विवरण के साथ-साथ मुगल सम्राट अकबर की देवी माता के प्रति आस्था और उसके नंगे पाँव मंदिर में आकर सोने का छत्र चढ़ाने की बात कही गई है। इस प्रकार इस लोक (भेंट) गीत से मुगल इतिहास की भी जानकारी प्राप्त होती है।

धार्मिक लोक गीतों के पश्चात हमारे तीज-त्योहारों और पर्वों से संबंधित गीत आते हैं। इनसे हमें अपने पवित्र त्योहारों के साथ-साथ सामाजिक गतिविधियों, आपसी मेल-मिलाप और ऋतुओं आदि की जानकारी भी मिलती है। इन्हीं लोक गीतों के अंतर्गत हमारे चौमासा, बारमासा, छिंजे और छिंजोटियाँ गीत आदि भी आते हैं।

मण्डी क्षेत्र में छिंजे महिलाओं द्वारा चैत्र मास (अप्रैल-मई) में गाई जाती हैं, क्योंकि चैत्र मास के बाद इन्हें गाना अशुभ माना जाता है। इन्हीं छिंजों से हमें बीते समय में नारी की दयनीय स्थिति का आभास होता है कि किस प्रकार बेटियाँ अपने माता-पिता से दूर रहकर ससुराल में अत्याचार सहते हुए मायके आने के लिए तरसती रहती थीं। जब भी कोई तीज-त्योहार आता था, तो उनकी अपने मायके के प्रति उत्सुकता बढ़ जाती थी, जिसका अंदाजा निम्न पंक्तियों से लगाया जा सकता है—

आया बरसोआ मावे,
पांजे साते मेरे बापू जो सादा भेजणा,,,,!

त्योहारों पर बेटी अपने घर आने की उत्सुकता और अपनी दुःखभरी व्यथा अपने संबंधियों तक किस प्रकार पहुँचाती थी, इसकी व्याख्या एक अन्य छिंज की निम्न पंक्तियों से स्पष्ट होती है—

द्रराणिये लिपया औबरा, औ औबरा,
जैठाणी जै गई घसराठ,
तैसा चपणी रा हुआ चकणा चूर,
कि बहुवा जो दिता बनवास।

ऊपर की इन पंक्तियों में बताया गया है कि एक मामूली-सी चपणी के टूट जाने पर सास अपनी बहू को ही घर से निकाल देती है। इससे परेशान होकर वही बहू (बेटी) अपने पिता, चाचा, मामा और मामी को किस प्रकार अपनी व्यथा बताती है, इसकी जानकारी निम्न लोक गीत की पंक्तियों से मिलती है—

सुरगा जो जांदिए सूरगणिये,
मेरे बापू जो देणा संदेश,
कि तुध आई जाणा,
तेरी धिया जो हुआ बनवास।

पिता जब बेटी की दर्दभरी स्थिति के बारे में सुनता है तो वह बेटी की सास के घर पहुँचकर अपनी संबंधन से इस प्रकार प्रार्थना करता है—

लै लै कुड़मणिये सियुना चांदी,
मेरी धिया जो दे घर बार।
कुड़मा मेरे किथी पाणा,
सियुना चांदी,
मेरी चपटी कने सौ काम।

उपरोक्त गीत की पंक्तियों में बताया गया है कि लड़की (बहू) किसी प्रकार अपना संदेश पिता तक पहुँचाती है और पिता उस मामूली-सी मिट्टी की चपणी के बदले अपनी संबंधन को सोना-चाँदी देने की बात कहकर बेटी को घर में रखने का आग्रह करता है। इसके बावजूद संबंधन अपनी मामूली चपणी के टूटने का ही बहाना बनाती है।

लोक गीतों में न जाने कितनी ही ऐसी छिंजें और छिंजोटियाँ हैं, जिनसे हमें सास, ननद और पति के दुर्व्यवहार की जानकारी मिलती है। तो क्या इन छिंजों और छिंजोटियों जैसे लोक गीतों से हमें उस समय की सामाजिक स्थिति की जानकारी नहीं मिलती?

हमारे ये लोक गीत केवल यहीं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि जन्म से लेकर विवाह, तीज-त्योहारों और मृत्यु संस्कारों तक से जुड़े अनेक प्रकार के लोक गीत सुनने को मिलते हैं, जिनसे कई प्रकार की नई जानकारियाँ प्राप्त होती हैं।

यदि विवाह गीतों की बात करें तो ये भी कई प्रकार के होते हैं, जैसे— लग्न गीत, बेदी गीत, सेहरा गीत, तेल गीत, मेहंदी गीत, जानेतर गीत, धाम गीत, बाटना गीत, घोड़ी गीत, फेरा गीत और विदाई गीत आदि। विवाह गीतों में सिठणियों के मनोरंजनपूर्ण अंश सुनने का आनंद ही अलग होता है।

जन्म के अवसर पर गाए जाने वाले लोक गीतों को बधाई गीत के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इन गीतों के माध्यम से खुशियों और शुभकामनाओं की अभिव्यक्ति की जाती है। जन्म गीत भी कई प्रकार के होते हैं, जैसे— मुँह दिखाई गीत और अन्न चखाई गीत आदि।

नाटी गीत (नृत्य गीत) वे गीत हैं, जिनका गायन समूह रूप में नाटी करते हुए किया जाता है। इस प्रकार जहाँ ये लोक गीत हमें समाज की प्राचीन परंपराओं और गतिविधियों की जानकारी प्रदान करते हैं, वहीं समूह नृत्य नाटी के माध्यम से हमें मण्डी क्षेत्र के पारंपरिक लिबास, श्रृंगार और आभूषणों की भी जानकारी मिलती है।

मण्डी क्षेत्र की नाटी की अपनी कुछ विशेषताएँ हैं। यहाँ की नाटी में कोई भी व्यक्ति (कुछ विशेष नाटियों को छोड़कर) किसी भी लिबास में शामिल होकर मनोरंजन कर सकता है। महिला और पुरुष बिना किसी भेदभाव के इसमें भाग लेते हैं। नाटी में शामिल होते ही सभी लोग वाद्य यंत्रों की धुन पर स्वतः ही थिरकने लगते हैं।

नाटियों में बजाए जाने वाले वाद्य यंत्र सरल प्रकार के होते हैं और इन सभी को देओ रा बाजा के नाम से जाना जाता है। इन्हें बजाने वालों को बजंत्री कहा जाता है। इनके प्रमुख वाद्य यंत्रों में करनाले, नरसिंघे, ढोल, नगाड़े, थालियाँ और शहनाइयाँ आदि शामिल हैं।

मनोरंजन के लिए नाटी नृत्य विवाह-शादियों, मेलों, तीज-त्योहारों और अन्य खुशी के अवसरों पर किया जाता है। यहाँ के त्योहारों की भी अपनी विशेष नाटियाँ होती हैं। जैसे खरीफ की फसल आने पर वैशाख मास में बिरसु नाटी और रबी की फसल आने पर सैरी नाटी का आयोजन किया जाता है।

कई बार किसी विशेष उद्देश्य से आयोजित नाटी में विशेष लिबास निर्धारित होता है और आमजन उसमें शामिल नहीं होते। ऐसी नाटी में पुरुषों के लिए लंबी सफेद कमीज होती है, जिसे चोलू कहा जाता है। नीचे सफेद रंग का चुड़ीदार पाजामा पहना जाता है। इसके साथ दो पटके होते हैं, जिनमें से एक कमर और दूसरा कंधे पर डाला जाता है। पैरों में भांग के रेशों से बनी पुल्ले पहनी जाती हैं, जिन्हें रंगीन ऊनी धागों से सजाया जाता है। सिर पर फूलों और कलगी से सजी गोलाकार पहाड़ी टोपी होती है। हाथों में तलवार या रुमाल रखा जाता है।

महिलाओं के लिए सिर ढकने के लिए काले रंग का कपड़ा होता है, जिसे ढाठू कहा जाता है। इसे सिर पर बाँधा जाता है। शरीर पर झगी और नीचे सलवार, जिसे सुथन कहा जाता है, पहनी जाती है। पूरे परिधान के ऊपर काले पट्टू को साड़ी की तरह लपेटा जाता है और पैरों में पुल्ले पहनी जाती हैं।

इस प्रकार नाटी में पहने जाने वाले लिबास से ही पता चलता है कि यही यहाँ का पारंपरिक पहनावा हुआ करता था। सामान्य महिलाएँ भी लंबी ऊनी झगी पहनती थीं। इसी प्रकार घुटनों तक लंबा चोलू और कुर्ता भी पहना जाता था, जिसके नीचे सलवार या सुथन पहनी जाती थी। कहीं-कहीं सुथन के स्थान पर चौली के नीचे बड़ा घाघरा भी पहना जाता था। आज के समय में ये परंपरागत परिधान धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं।

आभूषण

श्रृंगार में आभूषणों का चलन प्राचीन समय से रहा है। यहाँ प्राकृतिक फूलों के साथ-साथ सोने-चाँदी के आभूषण पहनने की परंपरा भी रही है, जो आज भी विवाह-शादियों, तीज-त्योहारों और नाटियों में देखने को मिलती है।

प्रमुख आभूषणों में नाक की तिल्ली, लौंग, नथ और नथनी, माथे का टीका, सिर का चाक, पैरों की पाजेब और झाँझर, बाजुओं की चूड़ियाँ तथा गले के विभिन्न प्रकार के हार शामिल हैं, जो आज भी श्रृंगार में अपना विशेष स्थान रखते हैं।

हमारी संस्कृति लोक गीतों में एक आईने की तरह दिखाई देती है। वहीं हमारा लिबास, आभूषण और तीज-त्योहार भी संस्कृति को उजागर करने में पीछे नहीं हैं। यही कारण है कि आज भी मण्डी क्षेत्र में जब महिलाएँ किसी के घर मातम में जाती हैं तो सजती-सँवरती नहीं हैं, बल्कि सादे लिबास के साथ बिंदी, तिल्ली आदि हटाकर शोक वाले घर जाती हैं। रिश्तेदारी में भी भोजन पूरी तरह सादा और बिना तड़के के बनाया जाता है।यही हमारी संस्कृति है और यही हमारी पहचान भी है।

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एकह पहचान – डॉ. कमल के. प्यासा

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