पाप मोचनी एकादशी- डॉ० कमल के० प्यासा

Date:

Share post:

डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एकादशी के व्रत का अति महत्व बताया जाता है और यह पर्व अन्य सभी पर्वों व व्रतों में सबसे अधिक फलदाई व सभी तरह के कष्टों के निवारण,इच्छाओं की पूर्ति के साथ ही साथ सभी तरह के पापों से भी मुक्ति दिलाता है। एकादशी का शाब्दिक अर्थ ,1+10 अर्थात ग्यारहवां दिन या ग्यारहवीं तिथि से लिया जाता है। हमारे पंचांग में हर माह दो पक्ष आते हैं,जो कि शुक्ल व कृष्ण पक्ष के नाम से जाने जाते हैं। इन दोनों पक्षों मे चंद्रमा का चक्र 11 -11 दिन का रहता है। शुक्ल पक्ष में चंद्रमा का क्रम बढ़ने लगता है ,वहीं कृष्ण पक्ष में क्रम घटता चला जाता है।इसी लिए हमारे हर हिंदू माह में पूर्णिमा के पश्चात आने वाली एकादशी कृष्ण कक्ष की तथा अमावस के बाद आने वाली एकादशी को शुक्ल पक्ष की एकादशी कहते हैं।

इन दोनों ही एकादशियों का हमारे हिन्दू धर्म में बहुत ही महत्व बताया जाता है।और एकादशी में अन्न का खाना वर्जित रहता है,चावल तो एकादशी के दिन बिल्कुल ही नहीं खाए जाते।वर्ष में कुल मिला कर 24 एकादशियां बनती हैं ,अधिमास की स्थिति में ये संख्या बढ़ कर 26 हो जाती है। एकादशीयां भी दो प्रकार की होती हैं ,अर्थात 1.संपूर्ण एकादशी जिसमें केवल एकादशी में की ही तिथि रहती है।2.वृद्धा एकादशी ,इसमें दूसरी तिथि भी शामिल रहती है।वृद्धा एकादशी आगे फिर दो प्रकार की होती है अर्थात 1.पूर्व वृद्धा एकादशी: इसमें दशमी भी शामिल रहती है। और 2.प्रवृद्धा एकादशी :इसमें द्वादशी शामिल रहती है। . एकादशी की उत्पति: एक पौराणिक कथा के अनुसार बताया जाता है कि जिस समय भगवान विष्णु अपने ध्यान मग्न आँखें मूंदे थे तो उसी समय राक्षस मुर्दानव ने उन पर हमला बोल दिया,फलस्वरूप भगवान विष्णु की ग्यारह इंद्रियों से एक सुन्दर कन्या प्रकट हो गई जिसे देख कर वह राक्षस उस पर मंत्रमुग्ध हो गया और उसे पाने की कोशिश करने लगा।

जिस पर उस कन्या ने मुर्दानव से कहा कि यदि वह उससे युद्ध करके हरा दे तो वह उसके साथ चल पड़े गी।और फिर उस कन्या ने उसे वहीं पछाड़ कर मर दिया।भगवान विष्णु की आंखें तभी खुल गईं और उन्होंने आशीर्वाद देते हुवे उस कन्या को एकादशी नाम दे कर संबोधित किया।कहते हैं कि तभी से उस कन्या के नाम से एकादशी व्रत की परम्परा शुरू हुई है।एकादशी के इस व्रत से समस्त इंद्रियों पर नियंत्रण बनता है,स्वास्थ्य लाभ मिलता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।यह व्रत 3 दिन चलता है जिसमें पहले दिन(दशमी को)एक बार भोजन किया जाता है,एकादशी के दिन बिना भोजन के या बिना पानी के ही रहना होता है।अगले अर्थात तीसरे दिन द्वादशी को सूर्योदय के पश्चात उपवास तोड़ा जाता है। एकादशी का उपवास निर्जला, जलाहार,क्षीरभोजी,फलाहारी और नक्तभोजी(दिन में एक बार )का प्रचलन रहता है।

आहार में (जो कि उत्तरार्ध में रहता है) साबूदाना,सिंघाड़ा,शकरकंदी,आलू वा मूंगफली शामिल रहती है। पाप मोचनी एकदशी के संबंध में जो पौराणिक कथा सुनने में मिलती है,के अनुसार प्राचीन काल में चैत्ररथ नामक एक सुन्दर प्राकृतिक जंगल हुआ करता था,जिसमें ऋषि मुनि अपनी पूजा पाठ व तपस्या में लीन रहते थे।सुन्दर व रमणीय जंगल होने के कारण ही उधर कई एक देवी देवता ,देवराज इंद्र उनके गंधर्व कन्याएं व अप्सराएं आदि सभी विचरण करते रहते थे। एक बार वहीं उसी जंगल में थोड़े हटकर ऋषि च्यवन का पुत्र ऋषि मेधावी भी भगवान शिव की तपस्या में लीन था।लेकिन कामदेव जो कि भगवान शिव की तपस्या को नहीं देखना चाहते थे ,ने (वहीं उन्होंने मेधावी की तपस्या को भंग करने के लिए) अपनी मंजु घोष नामक अप्सरा को भेज दिया,जो कि अपनी सुंदरता के साथ ही साथ नृत्य व गायन में भी बड़ी पारंगत थी।

मंजु ने अपनी सुंदरता, नृत्य व मधुर गायन से मेधावी को मंत्र मुग्ध कर व उसकी सारी तपस्या को भंग करके उसे अपने मोह जाल में फंसा लिया।मेधावी उसके मोह जाल में वर्षों फंसा रहा।एक दिन मंजु ने मेधावी से वापिस जाने के लिए कहा,जिस पर मेधावी को अपनी तपस्या भंग होने की भूल का आत्मज्ञान हो गया और वह क्रोधित हो कर उस पर टूट पड़ा तथा इसी दोष के लिए उसने मंजु को पिशाचिनी होने का शाप दे दिया।मंजु तब रोने लगी थी और उसने फिर शाप से मुक्ति के लिए कहा और मेधावी से हाथ जोड़ कर प्रार्थना की।तब कहीं जा कर मेधावी ने उसे मुक्ति के लिए पाप मोचनी एकादशी का व्रत करने को कहा।इसके पश्चात जब मेधावी ने वापिस आश्रम पहुंच कर अपने पिता ऋषि च्यवन से सारी बात कही ,तो पिता(च्यवन ऋषि) बहुत नाराज हुवे और कहने लगे कि ये तो सारा दोष तुम्हारा ही है और इसका पाप तुम्हे लगे गा,पाप मोचनी का व्रत तुम्हे भी रखना पड़े गा तभी तुम इस दोष से मुक्ति पा सकते हो।

इस तरह दोनों (मेधावी व मंजु घोष) द्वारा पाप मोचनी एकदशी का व्रत करने से ही अपने पापों से छुटकारा पाने में सफल रहे थे। चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पाप मोचनी एकदशी के इस व्रत को करने के लिए भगवान विष्णु जी को पीले वस्त्रों से ही सजाना चाहिए और इनको पीले आसान पर ही स्थापित करना चाहिए।विष्णु पूजन के लिए 11 पीले फूल,11 पीले फल व11ही पीले रंग की मिठाईयों के साथ पीले चंदन व पीले जनेऊ का उपयोग करना चाहिए। कथा में बैठने के लिए भी पीले आसन का ही प्रयोग करना चाहिए। पाठ विष्णु शास्त्रनामा का व व्रत निर्जला या फलाहारी कोई भी किया जा सकता है। पाप मोचनी एकदशी व्रत से संतान प्राप्ति, मोक्ष प्राप्ति,दुखों का नाश,1000 गऊ दान फल व सभी तरह के पापों से मुक्ति प्राप्त होती है।

Daily News Bulletin

Nurturing Creativity – Keekli Charitable Trust, Shimla

Keekli Bureau
Keekli Bureau
Dear Reader, we are dedicated to delivering unbiased, in-depth journalism that seeks the truth and amplifies voices often left unheard. To continue our mission, we need your support. Every contribution, no matter the amount, helps sustain our research, reporting and the impact we strive to make. Join us in safeguarding the integrity and transparency of independent journalism. Your support fosters a free press, diverse viewpoints and an informed democracy. Thank you for supporting independent journalism.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Related articles

BCS Alumnus Vishwesh Negi Appointed India’s Ambassador to Iran

Bishop Cotton School, Shimla, proudly congratulates its esteemed alumnus, Vishwesh Negi (IFS: 2002), on his appointment by the...

This Day in History

1492 Christopher Columbus began his first voyage from Palos de la Frontera, Spain, with three ships — Santa María,...

India’s Lifting Legends Shine After Glasgow Triumph

Union Minister for Youth Affairs and Sports Dr. Mansukh Mandaviya felicitated India’s Commonwealth Games 2026 weightlifting medallists for...

Nari Shakti Shines at Commonwealth Games

Union Minister of Women and Child Development  Annpurna Devi has lauded the exceptional performance of India’s women athletes...