रंगमंच और नाट्य संस्कृति पर गेयटी थियेटर में वरिष्ठ कलाकारों की अभिव्यक्ति

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प्लेटफॉर्म शिमला एवं भाषा कला संस्कृत विभाग के संयुक्त तत्वावधान मैं रंग निर्देशक स्वर्गीय देवेन जोशी की स्मृति में गेयटी थियेटर के सम्मेलन कक्ष में ” मुझे थियेटर क्यों पसंद है ” रंग प्रसंग संगोष्ठी का आयोजन किया। सचिव भाषा एवं संस्कृति, शिक्षा व सूचना एवं जनसंपर्क विभाग राकेश कंवर ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन मैं आयोजकों को बधाई दी । उन्होंने आशा व्यक्त की कि ये आयोजन भविष्य में और अधिक विस्तार कायम करते हुए निरंतर जारी रहेगा। रंगमंच में अभिव्यकी का गजब का स्पंदन रहता है जो मुझे नाटक या थियेटर की और आकर्षित करता है।

लेखक, अभिनेता और दर्शकों मैं बनने वाले परस्पर संबंध की प्रतिपूर्ति केवल रंगमंच के माध्यम से ही संभव हो सकती है। एस एन जोशी ने अपने स्वागत संबोधन मैं देवेन जोशी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपने विचार प्रकट किया। अपने वक्तव्य मैं उन्होंने सभी के विचारों की अभिव्यक्ति को अपने शब्दों मैं व्यक्त किया। वरिष्ठ रंग निर्देशक एवं रंग संगीतज्ञ सुशील शर्मा ने मुझे थियेटर क्यों पसंद है पर बोलते हुई कहा कि थियेटर ने मुझे चुन लिया इस लिए थियेटर पसंद है ।घर का माहौल संगीतमय था । जो प्यार थियेटर या संगीत से मिलता था वो शिक्षा से नहीं । पहला नुक्कड़ नाटक किया सदाचार का ताबीज मैं कुता का किरदार किया लोगों की प्रशंसा और पैसे मिले। ईपटा के साथ काम किया।

उन्होंने कहा कि रंग संगीत जैसी कोई विद्या नहीं है ।कुछ नाटकीयता की लाइन होती है जिससे संगीत निकलता है। रंग संगीत पौराणिक किवदंतियों पर ही आधारित था । बी वी कारांत से मिलकर रंग संगीत की बारीकियों का पता चला । रंग संगीत प्रत्येक व्यक्ति हर नाटक के हिसाब से करता है न लेखक ने इसका कोई स्क्रिप्ट मैं उल्लेख होता है। नाटक सम्मान देता है। चंडीगढ़ संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष सुदेश शर्मा ने इस विषय पर बोलते हुए कहा कि सतत कला साधक या प्रेमी के लिए रंगमंच आत्मसंतुष्टि का माध्यम है । यही कारण है कि मेरी पहली पसंद है । पदार्थ वादी विचार से मुक्त होकर कला साधना में लिप्त होना कठिन है जिसे केवल रग़ मंच और रंग कलाकार ही इसकी पूर्ति कर सकता है।

सात्विकता ही रंगकर्म की अनुभूति है जो रंगमंच की और आकर्षित करता है।रंग साधक ही खुली आंखों से स्वप्न देखता ही और प्रतिपूर्ति के लिए सक्षम होता है। वंदना भागड़ा ने कहा कि थिएटर, सिर्फ एक कला का रूप नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली माध्यम है जो समाज में बदलाव ला सकता है। यह हमें न केवल मनोरंजन देता है, बल्कि हमें हमारे समाज, हमारी संस्कृति और हमारे आसपास की दुनिया से भी जोड़े रखता है। थिएटर हमें यह सिखाता है कि हम अपनी आवाज़ को किस तरह से प्रभावी रूप से व्यक्त कर सकते हैं, और यह हमें मानवता की साझा भावनाओं को समझने का एक अनूठा रास्ता दिखाता है। यह किसी एक संस्कृति में कैद नहीं है, बल्कि यह दुनिया भर की विविधताओं का सम्मान करता है और इन्हें एक मंच पर लाता है। वंदना ने अपने क्रिकली चारी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय और रॉयल सेंट्रल स्कूल ऑफ स्पीच एंड ड्रामा लंदन प्रशिक्षित दानिश इकबाल ने कहा मेरी खून मैं थियेटर है, मेरी मां थियेटर पढ़ाती थी। बचपन मैं रंगमंच से दो चार हुआ और रंगमंच मेरा जीवन बन गया।

रंगमंच पैशन है । रंगमंच की चुनौतियों ने मुझे आकर्षित किया । थियेटर मैं प्रशिक्षण आवश्यक है। प्रशिक्षण की प्रक्रिया को अपनाकर ही हम रंगमंच मैं आगे बढ़ सकते है । नई शिक्षा नीति मैं थियेटर को पाठ्यक्रम मैं शामिल किया है। हम समाज मैं थियेटर की बात करें ताकि युवा पीढ़ी का रुझान सक्रिय रंगमंच की ओर हो । रंगमंच के पाठ्यक्रम पर विचार रखते हुए कहा कि अभिनय के संबंध मैं कोई भारतीयता की पुस्तक होना आवश्यक है। गुणात्मक कार्य और प्रशिक्षण प्रक्रिया रंगमंच के लिए आवश्यक है। रंगकर्मियों मैं परस्पर सहयोग आवश्यक जिससे रंग कर्म को ही फायदा होगा । केहर सिंह ठाकुर निर्देशक अभिनेता ने कहा कि मैं थियेटर से क्यों प्यार करता हूं ये मुझे भी नहीं पता किंतु रग़मंच करता हूं और करता रहूंगा।

उन्होंने हिमाचल के लोकनाट्य , लोकविधाओं और लोक संस्कृति पर प्रकाश डाला । चंडीगढ़ से पधारे वरिष्ठ रंगकर्मी रंगमंच मैं अभिनय के लिए संगीत नाटक अकादमी से उस्ताद बिस्मिल्लाह खां पुरस्कार प्राप्त हरविंदर सिंह ने कहा कि रंगमंच लोगों से मेल मिलाप जोड़ता है जिससे परिवार बढ़ाता है और बुद्धिजीवियों के संपर्क मैं आने से ज्ञानवर्धन होता। संगोष्ठी मैं वरिष्ठ रंगकर्मी प्रवीण चांदला, डॉ कमल मनोहर शर्मा , संजय सूद, भूपिंदर शर्मा , मोहन जोशी, केदार ठाकुर ,अजय शर्मा परमेश शर्मा, सुमित वशिष्ठ, अधिराज, श्रुति रोहटा, धीरज रघुवंशी , ने भी परिचर्चा मैं भाग लिया और विचार रखे। देवेन जोशी की बहन ललिता पांडेय, इंदु तिवारी जयश्री जोशी , जीजा मेधणी कुमार पाण्डेय, हेम कांत जोशी भी उपस्थित थे।

परिचर्चा का सफल संचालन अर्श ठाकुर ने किया। शाम को प्लेटफॉर्म संस्था द्वारा दिल्ली की नाट्य संस्था रंगविशारद थियेटर क्लब द्वारा का मंचन किया गया नाटक।ये नाटक कहानी रसिक संपादक मुंशी प्रेमचंद जी की शुरुआती दिनों की लेखन है । ये उनकी उन कहानियों में से है ,जो कभी मंच पर खेली नहीं गई । कहानी रसिक संपादक एक व्यंग और हास्य कहानी है , जो कि ऐसी मानसिकता को दर्शाती हैं , कि” जिनकी मानसिकता स्त्रियों को लेकर कुछ अलग ही होती, किंतु इंसान को पता ही नहीं कि खूबसूरती तन की नहीं मन अथवा विचारों की होती है । नाटक को आज हम इक्कसवीं सदी में आकर भी स्त्रियों की प्रति,उनकी खूबसूरती के प्रति अपनी मानसिकता ज्यों की त्यों बनी हुई है , पुस्र्ष के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने के बाबजूद भी स्त्री के तन की खूबसूरती ही देखी जाती है , न की मन की , कहानी हास्य ओर व्यंग के साथ साथ यही शिक्षा देती है। की खूबसूरती मन की देखो ना की तन की।

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